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Arvind Kejriwal: ईडी के पास अरेस्ट वारंट जारी करने का अधिकार, पॉलिटिकल स्टंट से किसे फायदा?

Wed, 03 Jan 2024 05:17 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Wed, 03 Jan 2024 05:17 PM IST
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सार
संविधान विशेषज्ञ अश्विनी कुमार दुबे ने कहा कि प्रर्वतन निदेशालय एक अर्ध न्यायिक निकाय है। वह अपने आदेशों की अवहेलना के आरोप में अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार कर सकती है। किसी तरह की अव्यवस्था से बचने के लिए वह दिल्ली पुलिस से केजरीवाल की गिरफ्तारी में सहयोग करने के लिए कह सकती है...
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Arvind Kejriwal: enforcement directorate has the right to issue arrest warrant against him
Arvind Kejriwal - फोटो : Amar Ujala/Rahul Bisht

विस्तार

अरविंद केजरीवाल ने तीसरी बार भी तीन जनवरी को प्रवर्तन निदेशालय के सामने पेश होने से इनकार कर दिया। इसके पहले पहली बार चुनावी व्यस्तता होने और दूसरी बार विपश्यना के पूर्व निर्धारित कार्यक्रम होने के आधार पर उन्होंने एजेंसी के सामने पेश होने से इनकार कर दिया था। उन्होंने अपनी पूछताछ को राजनीति से प्रेरित बताया और इसके औचित्य पर सवाल खड़े किए। अब यह प्रश्न पूछा जा रहा है कि केजरीवाल के लगातार तीन बार जांच एजेंसी ईडी के सामने पेश न होने के बाद उसके पास क्या विकल्प हैं? एक टॉप क्लास के अफसर रह चुके केजरीवाल भी एक संवैधानिक संस्था के आदेशों का पालन न करने पर इसके संभावित परिणाम को जानते-समझते होंगे। अब एजेंसी के पास उन्हें गिरफ्तार करने का विकल्प है। यदि एजेंसी उन्हें गिरफ्तार करती तो क्या परिस्थिति बनेगी और इसका किसे लाभ मिलेगा?

संविधान विशेषज्ञ अश्विनी कुमार दुबे ने कहा कि प्रर्वतन निदेशालय एक अर्ध न्यायिक निकाय है। वह अपने आदेशों की अवहेलना के आरोप में अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार कर सकती है। किसी तरह की अव्यवस्था से बचने के लिए वह दिल्ली पुलिस से केजरीवाल की गिरफ्तारी में सहयोग करने के लिए कह सकती है। अब चूंकि यह स्पष्ट हो गया है कि अरविंद केजरीवाल जानबूझकर और समय होते हुए भी जांच एजेंसी के सामने पेश होने से बच रहे हैं, प्रवर्तन निदेशालय के लिए अब एक बार फिर से पेशी के लिए नोटिस जारी करने की आवश्यकता नहीं रह गई है।

सर्वोच्च न्यायालय के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि जांच एजेंसी उच्च न्यायालय के माध्यम से अपने आदेशों को पालन करने का दबाव भी बना सकती है, लेकिन उसके पास समय के साथ वारंट जारी करने, और उसमें भी पेश न होने पर गैर जमानती वारंट जारी करने का अधिकार है। यह एजेंसी के विवेक पर निर्भर करता है कि वह अपने आदेश की पूर्ति के लिए किस विकल्प को अपनाना उचित समझती है।

अब जिस तरह की परिस्थिति बन रही है, संविधान के जानकारों का मानना है कि प्रवर्तन निदेशालय देर-सबेर अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार कर सकती है। शराब घोटाले से अलग केवल जांच एजेंसी के आदेशों की अवहेलना भी उनकी गिरफ्तारी के लिए पर्याप्त आधार बन सकता है। ऐसी स्थिति में अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी तय है।

दरअसल, भाजपा के रणनीतिकारों का भी मानना है कि केजरीवाल अब शराब घोटाले की जांच को 'पॉलिटिकल स्टंट' बनाने की कोशिश कर सकते हैं। जिस प्रकार 2013 के पहले वे एक एक्टिविस्ट के रूप में आंदोलन कर तत्कालीन सरकारों को कटघरे में खड़ा किया करते थे, अब अपनी जांच के सहारे वे प्रवर्तन निदेशालय के कामकाज को भी एक मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकते हैं।

चूंकि विपक्ष के कई अन्य नेता भी अलग-अलग मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के जांच के घेरे में हैं, केजरीवाल को विपक्ष के कुछ नेताओं का साथ मिल सकता है। यदि ऐसा हुआ तो लोकसभा चुनाव के ठीक सामने यह बड़ा मुद्दा बन सकता है। लोकसभा चुनाव में इसका असर कितना होगा, यह कहना भले मुश्किल हो, लेकिन माना जा सकता है कि कुछ राज्यों में यह बड़ा मुद्दा बन सकता है। विशेषकर बिहार, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, पंजाब और तमिलनाडु जैसे जिन राज्यों के बड़े नेता जांच के घेरे में हैं, वहां इसके कारण भाजपा के खिलाफ आंदोलन चलाने में विपक्षी दलों को मदद मिल सकती है।

आम आदमी पार्टी नेता और दिल्ली सरकार के कैबिनेट मंत्री सौरभ भारद्वाज ने इसे राजनीतिक प्रचार से रोकने की भाजपा की रणनीति करार दिया है, लेकिन भाजपा नेताओं का मानना है कि अब केजरीवाल की यह विक्टिम पॉलिटिक्स काम नहीं आएगी। चूंकि, इसी मामले में मनीष सिसोदिया और संजय सिंह को जमानत नहीं मिल रही है, जो यह साबित करता है कि उसके पास आम आदमी पार्टी के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, केजरीवाल को इस मामले में बचना आसान नहीं होगा।

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