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गुमनाम नायक: 73 साल बाद मेजर खातिंग का सम्मान; तवांग को अरुणाचल का भाग बनाने वाले मेजर के नाम वीरता संग्रहालय

Mon, 04 Nov 2024 05:38 AM IST
ज्योति भास्कर न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 04 Nov 2024 05:38 AM IST
सार

देश की आजादी और अलग-अलग दुर्गम इलाकों को भारत से जोड़ने में कई गुमनाम नायकों की भूमिका रही है। ऐसे ही एक नायक हैं मजेर खातिंग। सरकार ने 73 साल बाद इनका सम्मान किया है। तवांग को अरुणाचल का भाग बनाने वाले मेजर के नाम पर वीरता संग्रहालय का नामकरण किया गया है।

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Arunachal Pradesh Major Khathing Tawang Annexation with India after 73 years honour given
मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग के नाम पर रखा अरुणाचल के वीरता संग्रहालय का नाम। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिन मेजर रालेंगनाओ बॉब खातिंग के कारण आज तवांग भारत के अरुणाचल प्रदेश का हिस्सा है, इस गुमनाम नायक को 73 साल बाद सम्मान मिल सका है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बीते सप्ताह मेजर खातिंग की याद में तवांग में वीरता संग्रहालय का वर्चुअल  लोकार्पण कर इस असाधारण शख्सियत की स्मृतियों को आकार देने का प्रयास किया।
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खातिंग मणिपुर के तंगखुल नगा समुदाय में पैदा हुए
मेजर खातिंग ने 1951 में तत्कालीन नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (नेफा) और वर्तमान अरुणाचल प्रदेश के एक सहायक राजनीतिक अधिकारी के तौर पर तवांग को भारतीय संघ के अधीन लाने के लिए साहसिक अभियान चलाया था। उनके नाम बगैर खून-खराबा तवांग को भारत में मिलाने की उपलब्धि दर्ज है। खातिंग मणिपुर के तंगखुल नगा समुदाय में पैदा हुए थे। उन्हें तत्कालीन असम के राज्यपाल जयरामदास दौलतराम ने 17 जनवरी, 1951 को तेजपुर के पास चारिदुवार से असम राइफल्स के 200 सैनिकों और 400 कुलियों के साथ तवांग कूच का आदेश दिया था।
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नेहरू से मशविरा किए बगैर ही ऑपरेशन...
दरअसल, सरदार पटेल ने अपने जीवित रहते ही राज्यपाल और मेजर खातिंग को कह दिया था कि नेहरू से मशविरा किए बगैर ही यह ऑपरेशन चलाया जाए। खातिंग के तवांग दौरे के दौरान ही पीएम नेहरू ने विदेश सचिव को लिखा था कि तवांग का नियंत्रण में लेने से अंतरराष्ट्रीय परेशानियां पेश आ सकती हैं।
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दिल जीतने के लिए कूटनीतिक हुनर का इस्तेमाल
दूसरे विश्व युद्ध से पहले तवांग तत्कालीन स्वतंत्र तिब्बती सरकार के प्रशासनिक नियंत्रण में था। कई कोशिशों के बाद भी इस क्षेत्र को अंग्रेज अपने अधीन नहीं कर पाए थे। नेफा के ऐतिहासिक दस्तावेज के मुताबिक, मेजर खातिंग ने तवांग में स्थानीय लोगों का दिल जीतने के लिए अपने कूटनीतिक हुनर का इस्तेमाल किया। उन्होंने स्थानीय लोगों को भरोसा दिलाया कि भारत उन पर कभी भी गलत कर नहीं लगाएगा। जल्द ही, असम राइफल्स के लोगों के साथ खातिंग ने तवांग पर नियंत्रण कर लिया।


दिलाया भरोसा और लहराया तवांग में तिरंगा
नियंत्रण हासिल करने के बाद तवांग और बुमला में तिरंगा फहराया गया और बगैर खून-खराबे के 17 जनवरी, 1951 को तवांग भारत का हो गया। दुर्भाग्यवश मेजर खातिंग के बारे में देश को बेहद कम जानकारी है। 70 साल तक उनका स्मारक तक देश में नहीं था। 14 फरवरी, 2021 को उनके सम्मान में इंफाल में स्मारक बनाया गया था।
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