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'अरुणाचल में घुसपैठ नहीं कर रहा चीन': सुरक्षा सूत्रों ने दावे को किया खारिज; कहा- यह सनसनी फैलाने की कोशिश
Tue, 11 Aug 2026 08:33 PM IST
राकेश कुमार
एएनआई, नई दिल्ली।
एएनआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Tue, 11 Aug 2026 08:33 PM IST
सार
अरुणाचल प्रदेश में चीन की ‘धीमी घुसपैठ’ के सोशल मीडिया दावों को सुरक्षा सूत्रों ने खारिज कर दिया है। उन्होंने चीन के पुराने दावे, 1959 के लोंगजू कब्जे और 1962 के युद्ध का जिक्र करते हुए मौजूदा सीमा निगरानी व्यवस्था की जानकारी दी। सवाल अब सोशल मीडिया के दावों से ज्यादा इस बात का है कि सीमा पर जमीनी स्थिति वास्तव में क्या है और उसे लेकर तथ्य क्या कहते हैं?
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सीमा की रक्षा में तैनात जवान
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
अरुणाचल प्रदेश में चीन की कथित ‘धीमी घुसपैठ’ को लेकर सोशल मीडिया पर चल रहे दावों के बीच सुरक्षा सूत्रों ने स्थिति स्पष्ट की है। सूत्रों ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश में चीन की ओर से कोई धीमी घुसपैठ नहीं हो रही है। यह बिना ठोस जानकारी के सनसनी फैलाने की कोशिश है। सूत्रों के मुताबिक, चीन अरुणाचल प्रदेश पर ‘दक्षिणी तिब्बत’ के रूप में दावा करता रहा है। 1960 में हुई भारत-चीन सीमा वार्ता के दौरान चीन ने अरुणाचल प्रदेश के करीब 69,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा किया था।
साल 1959 में लोंगजू में क्या हुआ था?
सुरक्षा सूत्रों ने अरुणाचल प्रदेश से जुड़े चीन के पुराने दावों और गतिविधियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 1959 में चीन ने लोंगजू स्थित असम राइफल्स की चौकी पर हमला किया था और उसे अपने कब्जे में ले लिया था। सूत्रों के अनुसार, यह इलाका तब से चीन के प्रतिकूल कब्जे में है। यहां चीन की ओर से बुनियादी ढांचे के विकास के कारण यह क्षेत्र अक्सर खबरों में रहता है।
अरुणाचल को लेकर पांच बड़ी बातें क्या हैं?
यह भी पढे़ं: गांजा पीकर पायलट उड़ा था विमान: एअर इंडिया फ्लाइट टर्बुलेंस मामले में अहम खुलासा, दूसरा डोप टेस्ट आया पॉजिटिव
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1962 के युद्ध में किन इलाकों में बढ़ी थी चीनी सैन्य कार्रवाई?
सूत्रों ने बताया कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए ने अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों में बड़े सैन्य अभियान चलाए थे। इनमें कामेंग, सुबनसिरी, सियोम, सियांग और लोहित घाटियां शामिल थीं। हालांकि, युद्धविराम के बाद पीएलए एलएसी के उत्तर में वापस चली गई थी। अरुणाचल प्रदेश की सीमा तिब्बत के साथ ग्रेट हिमालयन रेंज के पास लगती है। सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, हाल के वर्षों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर लगातार जोर दिया गया है। इससे इस इलाके में गश्त और निगरानी की क्षमता बढ़ी है।
क्या सीमा पर भारतीय और चीनी गश्ती दल आमने-सामने आते हैं?
सूत्रों ने कहा कि सीमा का पूरी तरह सीमांकन नहीं होने के कारण कई बार दोनों देशों की गश्ती टुकड़ियों का आमना-सामना होता है। हालांकि, ऐसे मामलों को मौजूदा तंत्र और प्रचलित प्रोटोकॉल के जरिए सुलझाया जाता है। सुरक्षा सूत्रों ने यह भी दावा किया कि भारतीय सेना और आईटीबीपी सीमा पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने, निगरानी रखने और चीन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
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साल 1959 में लोंगजू में क्या हुआ था?
सुरक्षा सूत्रों ने अरुणाचल प्रदेश से जुड़े चीन के पुराने दावों और गतिविधियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 1959 में चीन ने लोंगजू स्थित असम राइफल्स की चौकी पर हमला किया था और उसे अपने कब्जे में ले लिया था। सूत्रों के अनुसार, यह इलाका तब से चीन के प्रतिकूल कब्जे में है। यहां चीन की ओर से बुनियादी ढांचे के विकास के कारण यह क्षेत्र अक्सर खबरों में रहता है।
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अरुणाचल को लेकर पांच बड़ी बातें क्या हैं?
- चीन अरुणाचल प्रदेश को ‘दक्षिणी तिब्बत’ बताता है।
- 1960 की सीमा वार्ता में चीन ने राज्य के करीब 69,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर दावा किया था।
- 1959 में चीन ने लोंगजू की असम राइफल्स चौकी पर हमला कर उसे कब्जे में लिया था।
- चीन ने कामेंग, सुबनसिरी, सियोम, सियांग और लोहित घाटियों में बड़े सैन्य अभियान चलाए थे।
- युद्धविराम के बाद पीएलए एलएसी के उत्तर में वापस चली गई थी।
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1962 के युद्ध में किन इलाकों में बढ़ी थी चीनी सैन्य कार्रवाई?
सूत्रों ने बताया कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए ने अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों में बड़े सैन्य अभियान चलाए थे। इनमें कामेंग, सुबनसिरी, सियोम, सियांग और लोहित घाटियां शामिल थीं। हालांकि, युद्धविराम के बाद पीएलए एलएसी के उत्तर में वापस चली गई थी। अरुणाचल प्रदेश की सीमा तिब्बत के साथ ग्रेट हिमालयन रेंज के पास लगती है। सुरक्षा सूत्रों के मुताबिक, हाल के वर्षों में बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर लगातार जोर दिया गया है। इससे इस इलाके में गश्त और निगरानी की क्षमता बढ़ी है।
क्या सीमा पर भारतीय और चीनी गश्ती दल आमने-सामने आते हैं?
सूत्रों ने कहा कि सीमा का पूरी तरह सीमांकन नहीं होने के कारण कई बार दोनों देशों की गश्ती टुकड़ियों का आमना-सामना होता है। हालांकि, ऐसे मामलों को मौजूदा तंत्र और प्रचलित प्रोटोकॉल के जरिए सुलझाया जाता है। सुरक्षा सूत्रों ने यह भी दावा किया कि भारतीय सेना और आईटीबीपी सीमा पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने, निगरानी रखने और चीन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।