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पुरानी कुरीतियों पर युवा उठा रहे हैं सवाल, बदल रहा है समाज
टीम डिजिटल, अमर उजाला
Updated Tue, 12 Dec 2017 05:46 PM IST
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हमारा समाज तरह-तरह की कुरीतियों, ढोंग, पाखंड और अंधविश्वास से घिरा हुआ है। कभी समाज में जात-पात को लेकर विवाद होता है तो कभी इंटरकास्ट मैरिज तो कभी महिलाओं को मासिक धर्म को लेकर समाजिक कुरीतियों और पाखंड से घेरा जाता रहा है। ऐसा नहीं है कि इन कुरीतियों में कोई विशेष जाति या धर्म के लोग जुड़े हों बल्कि पूरा का पूरा समाज इससे ग्रसित दिखाई देता है।
धर्म और आस्था को लेकर बड़े-बड़े पढ़े लिखे लोग तक शिकार होते देखे गए हैं। चमत्कारी बाबाओं और भगवानों द्वारा महिलाओं के शोषण की बातें हमेशा से प्रकाश में आती रही हैं और धन तो इनके पास दान का इतना आता है कि जिसे यह खुद भी नहीं गिन पाते हैं। एक ढ़ोंगी बाबा को भगवान बना देने के लिए सिर्फ कोई बाबा, मुल्ला या भगवान नहीं
बल्कि हमारा पूरा समाज भटका हुआ है।
लेकिन अब ऐसा माना जाने लगा है कि हमारी युवा पीढ़ी समाज की कुरीतियों को खत्म करने के लिए आगे आ रही है। इंटरकास्ट और इंटररिलिजन मैरिज के मामलों में तेजी देखी जा रही है। अगर स्टैंप विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2013-14 में करीब 2624 शादियां रजिस्टर की गई थीं जबकि 2015-16 में करीब 10,655 शादियां अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों में बढ़ोतरी देखी गई है जो यह दिखाता है कि युवा बहुत तेजी से जात-पात के मामलों को दरकिनार कर शादियां कर रहे हैं।
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पढ़ें: बच्चों पर न लादें अपेक्षाओं का बोझ, करने दें उन्हें मन की मर्जी
वहीं लड़कियों में मासिक धर्म को लेकर भी जागरूकता बढ़ी है। पहले लड़कियां मासिक धर्म और माहवारी के दौरान घर के एक कोने में बैठा दी जाती थीं, छुआ-छूत का शिकार हो जाती थीं, तीन दिनों तक उन्हें पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि घर के काम काज से बी जूर रखा जाता था लेकिन अब समय बदल गया है। महिलाएं, लड़कियां माहवारी पर खुलकर बात कर रही हैं बल्कि मंदिरों में पूजा-पाठ करने के लिए भी तैयार हैं।
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धर्म और आस्था को लेकर बड़े-बड़े पढ़े लिखे लोग तक शिकार होते देखे गए हैं। चमत्कारी बाबाओं और भगवानों द्वारा महिलाओं के शोषण की बातें हमेशा से प्रकाश में आती रही हैं और धन तो इनके पास दान का इतना आता है कि जिसे यह खुद भी नहीं गिन पाते हैं। एक ढ़ोंगी बाबा को भगवान बना देने के लिए सिर्फ कोई बाबा, मुल्ला या भगवान नहीं
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बल्कि हमारा पूरा समाज भटका हुआ है।
लेकिन अब ऐसा माना जाने लगा है कि हमारी युवा पीढ़ी समाज की कुरीतियों को खत्म करने के लिए आगे आ रही है। इंटरकास्ट और इंटररिलिजन मैरिज के मामलों में तेजी देखी जा रही है। अगर स्टैंप विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2013-14 में करीब 2624 शादियां रजिस्टर की गई थीं जबकि 2015-16 में करीब 10,655 शादियां अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहों में बढ़ोतरी देखी गई है जो यह दिखाता है कि युवा बहुत तेजी से जात-पात के मामलों को दरकिनार कर शादियां कर रहे हैं।
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वहीं लड़कियों में मासिक धर्म को लेकर भी जागरूकता बढ़ी है। पहले लड़कियां मासिक धर्म और माहवारी के दौरान घर के एक कोने में बैठा दी जाती थीं, छुआ-छूत का शिकार हो जाती थीं, तीन दिनों तक उन्हें पूजा-पाठ ही नहीं बल्कि घर के काम काज से बी जूर रखा जाता था लेकिन अब समय बदल गया है। महिलाएं, लड़कियां माहवारी पर खुलकर बात कर रही हैं बल्कि मंदिरों में पूजा-पाठ करने के लिए भी तैयार हैं।
देश के कई मंदिरों, मजारों और मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है जिसपर काफी विवाद चल रहा है। शनि शिग्नापुर सहित कई मंदिरों में महिलाओं, लड़कियों और युवाओं ने आवाज बुलंद की है और उन्हें सफलता भी मिली है। समाज बहुत तेजी से बदल रहा है और आज के युवा पुरानी पोंगा पंथी वाली चली आ रही परंपराओं पर सवाल उठाना शुरू कर दिया है और समाज में बदलाव की बयार देखी जा रही है।