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सुप्रीम कोर्ट से गोद लेने की प्रक्रिया सरल बनाने की गुहार, जानिए क्या है कानून
Mon, 31 Aug 2020 04:08 AM IST
संजीव कुमार झा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Mon, 31 Aug 2020 04:08 AM IST
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किसी को गोद लेने और उसका संरक्षक बनने की प्रक्रिया में शामिल विसंगतियों को दूर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई गई है। इसके लिए शीर्ष अदालत में दाखिल की गई जनहित याचिका में यह भी मांग की गई है कि गोद लेने की प्रक्रिया सभी नागरिकों के लिए एक समान की जाए।
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याचिका में शीर्ष अदालत से गुहार लगाई गई है कि गोद लेने की वर्तमान प्रक्रिया स्पष्ट रूप से भेदभाव पूर्ण है, क्योंकि हिंदुओं के लिए इस बारे में एक लिखित कानून है, जबकि मुस्लिमों, इसाइयों और पारसियों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है यानी वे अपनी मर्जी से किसी को भी गोद ले सकते हैं। याचिकाकर्ता के मुताबिक, हिंदू कानून में गोद लिए गए बच्चे को भी संपत्ति में अधिकारी बनाया गया है, लेकिन मुस्लिम, ईसाई या पारसी कानून में गोद लिए गए बच्चे को यह अधिकार नहीं मिला है।
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भाजपा नेता व वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका में शीर्ष अदालत से गोद लेने और संरक्षक बनने के भेदभावपूर्ण तरीके को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 व 21 का उल्लंघन घोषित करने की मांग की गई है। बता दें कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 में सभी नागरिकों के लिए समानता के अधिकार की बात की गई है।
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अनुच्छेद-15 में भारतीयों को धर्म, नस्ल, जाति, सेक्स या जन्म स्थल के आधार पर भेदभाव करने वालों पर रोक लगाने का प्रावधान किया गया है। अनुच्छेद-21 के तहत किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा किसी अन्य तरीके से उसके जीवन या निजी स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता ने शीर्ष अदालत की तरफ से विधि आयोग को तीन महीने के अंदर गोद लेने व संरक्षक घोषित करने की प्रक्रिया को ‘यूनिफार्म’ बनाए जाने के आधार पर तीन महीने के अंदर एक रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश देने का भी आग्रह किया गया है।