आत्मनिर्भर भारत: एंटी-कोविड ड्रग के अलावा और भी दवाएं बन रही हैं डीआरडीओ की लैब में
डीआरडीओ और भी बहुत सी बीमारियों के बायो मार्कर और कई तरह की दवाओं के डेवलपमेंट में काम कर रहा है। डीआएडीओ से जुड़े अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने बताया कि इन रिसर्च के लिए एम्स और पीजीआई समेत देश के कई चुनिंदा मेडिकल इंस्टिट्यूट के साथ मिलकर शोध कर रहे हैं...
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कोरोना की दस्तक के बाद पूरी दुनिया में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) की तैयार दवा पहली दवा है जो एंटी-कोविड ड्रग के तौर पर डेवलप की गई है। रक्षा अनुसंधान के क्षेत्र में काम करने वाले देश के सबसे बड़े रिसर्च इंस्टीट्यूट की कोविड दवा निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है। लेकिन यह पहली दवा नहीं है जो डीआरडीओ ने डेवलप की है। इस वक्त कम से कम 15 से ज्यादा दवाएं और क्लीनिकल मेडिकल रिसर्च डीआरडीओ अलग-अलग मेडिकल यूनिवर्सिटी और एजुकेशनल यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर तैयार कर रहे हैं।
देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने सोमवार को एंटी-कोविड ड्रग 2-डीजी को लांच किया। इस दवा को लांच करने से पहले शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया था कि इसके सेवन से मरीज के शरीर में ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा बढ़ जाती है। इसके अलावा बीमारी से लड़ने में यह दवा क्लीनिकल शोध में सफल रही है। शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया कि वैज्ञानिक ठोस आधारों पर ही इस दवा का ट्रॉयल और डेवलपमेंट पिछले साल शुरू किया गया था। चूंकि पूरी दुनिया में बीमारी की दस्तक के साथ वैक्सीन बनाने का काम शुरू हुआ, वहीं डीआरडीओ ने वैक्सीन से हटकर ड्रग डेवलपमेंट की दिशा में काम करना शुरू किया। शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने बताया कि वैक्सीन के साथ ही इस दवा ने भी अपना स्वरूप लेना शुरू कर दिया था। बस जैसे ही दवा का तीसरा ह्यूमन ट्रायल शुरू हुआ, वैसे ही इसकी शुरुआत में दस हजार ड्रग के साथ लांच किया गया।
सिर्फ कोविड की दवा की नहीं बल्कि डीआरडीओ और भी बहुत सी बीमारियों के बायो मार्कर और कई तरह की दवाओं के डेवलपमेंट में काम कर रहा है। डीआएडीओ से जुड़े अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने बताया कि इन रिसर्च के लिए एम्स और पीजीआई समेत देश के कई चुनिंदा मेडिकल इंस्टिट्यूट के साथ मिलकर शोध कर रहे हैं।
निमहेन्स के साथ ब्रेन इंजरी/स्टडी पर शोध
बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड साइंसेज के साथ मिलकर डीआरडीओ शोध कर रहा है। इस शोध में दिमाग में चोट लगने के बाद होने वाले ब्रेन के बदलाव पर शोध किया जा रहा है। ताकि इसके शोध के बाद दवाएं बनाकर बीमारी से निजात दिलाई जा सके।
गर्मी की वजह से होने वाली बीमारियों पर शोध
भुवनेश्वर एम्स के डॉक्टरों के साथ मिलकर डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने रिसर्च शुरू की है। शोध करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि जिन इलाकों में बहुत गर्मी पड़ती है वहां के लोगों में कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं। चूंकि गर्मियों की वजह से सैनिकों को भी बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए इस दिशा में किये जाने वाले शोध से न सिर्फ सैनिकों बल्कि आम लोगों को भी निजात मिलेगी।
रक्त नलिकाओं की बीमारियों में एम्स के साथ मिलकर शोध
पैरों की नसों में ब्लड ब्लॉकेज होने से नसों में बहुत सूजन आ जाती है। वक्त पर इलाज न मिलने पर पैरों को काटना तक पड़ जाता है। लेकिन डीआरडीओ के वैज्ञानिक ब्लड वैसेल मार्कर तैयार कर रहे हैं। ताकि इन मार्कर के माध्यम से इसका आकलन किया जा सके कि किस वक़्त पर बीमारी का सही इलाज मिलना चाहिए। चूंकि यह बीमारी बर्फीले पहाड़ों पर तैनात सैनिकों में भी खूब होती है। ऐसे में इस मार्कर के बनने से बीमारों को बचाया जा सकेगा।
डेंगू बीमारी पर शोध
असम मेडिकल कॉलेज के साथ मिलकर डीआरडीओ के वैज्ञानिक डेंगू की बीमारी पर शोध कर रहे हैं। इस शोध से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि डेंगू को लेकर अभी भी कोई ऐसी दवा बाजार में नहीं है जो रामबाण के तौर पर इस्तेमाल की जा रही हो। उनका शोध इसी दिशा में है।
मोबाइल डेंगू डाइग्नोस्टिक टेक्नोलॉजी
आंध्र प्रदेश यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर डीआरडीओ के वैज्ञानिक ड़ेंगू की मोबाइल जांच तकनीकी विकसित कर रहे हैं। इस तकनीक के विकसित होने से रिमोट इलाकों में डेंगू की जांच में आसानी हो जाएगी।