Stray Dogs: सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पशु प्रेमी खुश; आवारा कुत्तों को शेल्टर होम से छोड़ने का दिया है निर्देश
कुत्ते के पक्ष में आंदोलन करने वालों का कहना है कि कुत्ते भी हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। कहा जाता है कि सूरत में जब प्लेग आया था, उसके पहले सूरत नगर निगम ने कुत्तों को मारने का बड़ा अभियान चलाया था।
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सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पुराने आदेश में बड़ा परिवर्तन करते हुए गली के सभी कुत्तों को शेल्टर होम में भेजने का फैसला पलट दिया है। नए आदेश के अनुसार अब गली के कुत्ते लोगों के बीच ही रहेंगे। रेबीज पीड़ित या हिंसक कुत्तों को ही शेल्टर होम में रखा जाएगा। अदालत ने अब तक पकड़े गए कुत्तों को छोड़ने का भी आदेश दे दिया है। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का पशु प्रेमी स्वागत कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह मानवीय आदेश है और यह मूक पशुओं के हितों के अनुरूप है।
कुत्तों के पक्ष में आंदोलन कर रहे लोगों का कहना था कि आवारा कुत्तों के विरोध में मुहिम चलाने वाले ऐसा साबित करने की कोशिश कर रहे हैं- जैसे वे मानव समाज के दुश्मन हों, लेकिन इंसानों का पूरा इतिहास ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है जहां कुत्तों ने इंसानों की मदद की है। वे उनके घरों की रखवाली करते हैं और अकेलापन दूर करते हैं। ऐसे में उन्हें मानव समाज के दुश्मन के रूप में चित्रित नहीं किया जाना चाहिए।
कुत्तों को मारने से सूरत में आया था प्लेग!
कुत्ते के पक्ष में आंदोलन करने वालों का कहना है कि कुत्ते भी हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। कहा जाता है कि सूरत में जब प्लेग आया था, उसके पहले सूरत नगर निगम ने कुत्तों को मारने का बड़ा अभियान चलाया था। कुत्तों को मारने से सूरत में चूहों की संख्या बहुत अधिक बढ़ गई और शहर को प्लेग जैसी महामारी का सामना करना पड़ा। इस तरह के अनुभव फ्रांस सहित कुछ दूसरे देशों से भी आए हैं। पशु प्रेमियों का कहना है कि कुत्तों की इन भूमिकाओं को देखते हुए उन्हें मानव समाज से दूर रखना सही नहीं है।
शेल्टर होम में खुश न रहते कुत्ते: डॉक्टर
दिल्ली पशु चिकित्सक संघ के अध्यक्ष डॉ. विजय कुमार ने अमर उजाला से कहा कि जिस तरह बुजुर्गों को वृद्धाश्रम या बच्चों को अनाथालय में हर सुविधा देने के बाद भी उन्हें खुश नहीं रखा जा सकता, ठीक उसी तरह शेल्टर होम में रखकर कुत्तों को खुश नहीं रखा जा सकता। उन्होंने कहा कि कुत्तों के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बहुत कम है।उन्होंने कहा कि देसी कुत्ते विदेशी कुत्तों की तुलना में हमारी भावनाओं को ज्यादा बेहतर ढंग से समझते हैं। हमारे वातावरण में पले बढ़े होने के कारण वे यहां के वातावरण से ज्यादा बेहतर समायोजन करते हैं और उन्हें रखने में कम परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जबकि दूसरे देशों के कुत्तों को बहुत अधिक देखभाल की आवश्यकता पड़ती है।
डॉ. विजय कुमार ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने बेहतर निर्णय दिया है। लेकिन कुत्तों को खिलाने की जगह लोगों के घरों से ज्यादा दूर नहीं होनी चाहिए। अन्यथा व्यहार में इसका पालन नहीं हो पाएगा। बेहतर है कि कुत्ता प्रेमियों से बातचीत कर कुत्तों को भोजन खिलाने के स्थान का जगह चुना जाना चाहिए।
हर अधिकार केवल इंसानों के लिए ही क्यों?
सामाजिक कार्यकर्ता और कांग्रेस नेता प्रबल प्रताप शाही ने अमर उजाला से कहा कि क्या केवल इंसानों को ही पृथ्वी पर रहने का अधिकार है? क्या इन शहरों के स्थानों में नदी, जंगल, जानवर और चिड़ियों को जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है? उन्होंने कहा कि पर्यावरणविदों का मानना है कि हर बदलाव केवल मनुष्यों के पक्ष में करने की जिद से आज न जंगल बचे हैं, न तालाब-नदी। इससे पूरा पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है और इसका नुकसान भी इंसानों को ही उठाना पड़ रहा है। आज देश में जगह-जगह बारिश-बिजली गिरने की घटनाओं से कहर टूट रहा है। यदि समाज में पूरा तंत्र उचित तरीके से बचाकर रखा जाए तो ऐसी स्थितियों से बचा जा सकता है।
अदालत के आदेश का स्वागत: एनिमल एक्टिविस्ट
एनिमल एक्टिविस्ट प्रिया चोपड़ा ने अमर उजाला से कहा कि कुत्ते मनुष्यों के समाज का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। वे सबसे पहले पालतू पशुओं में रहे हैं जिन्होंने मानव के विकास के इतिहास में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज भी वे मानव समाज के इकोलॉजिकल बैलेंस को बनाए रखने का काम करते हैं। उन्होंने कहा कि उनके जैसे हजारों एक्टिविस्ट एमसीडी जैसी संस्थाओं से मिलजुलकर काम करेंगे और कुत्तों के स्टेरिलाइजेशन, उन्हें इंजेक्शन लगाने से लेकर उन्हें भोजन देने तक के काम में सहभागी बनेंगे।
प्रिया चोपड़ा ने कहा कि दिल्ली के पास ऐसा कोई ढांचा नहीं था जिसमें राजधानी के सात लाख से अधिक कुत्तों को रखा जाता और उनकी उचित देखभाल की जाती। ऐसे में उनके साथ बेहद क्रूर व्यवहार होने की आशंका थी। उन्होंने कहा कि कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों की बजाय केवल निर्धारित स्थानों पर ही भोजन रखने से कुत्तों के कारण लोगों को समस्या कम होगी। यह उचित कदम है जिसका पालन करना चाहिए।
एबीसी नियमों का हो सही से पालन: पशु अधिकार कार्यकर्ता
पशु अधिकार कार्यकर्ता रोजी विर्क ने अमर उजाला से कहा कि यदि कुत्तों से संबंधित एबीसी नियमों का सही से पालन किया जाता तो यह समस्या ही न खड़़ी होती। लेकिन नियमों का पालन न होने के कारण सड़कों पर रहने वाले कुत्तों की समस्या गंभीर हो गई। उन्होंने कहा कि यदि उन्हें उचित ढंग से रहने का अवसर मिलता तो वे इतने हिंसक नहीं होते।