CAPF: अर्धसैनिक बलों के जवानों का छलका दर्द, UPS में कैसे लेंगे VRS, 15 साल बाद पेंशन, तो क्या खाएगा परिवार?
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विस्तार
नई पेंशन योजना 'यूनिफाइड पेंशन स्कीम' (यूपीएस) पर केंद्र एवं राज्यों के कर्मचारी संगठनों की नाराजगी सामने आ रही है। कई संगठनों ने अपने तरीके से यूपीएस का विरोध करना प्रारंभ कर दिया है। इस कड़ी में अब केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवान भी सामने आ रहे हैं। वजह, उन्हें तो ओपीएस भी नहीं मिलती। 'पुरानी पेंशन बहाली' का केस सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने इन बलों को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' मानकर ओपीएस में शामिल करने के लिए कहा था, मगर केंद्र सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली गई। अब यूपीएस के प्रावधानों से इन बलों के जवानों का दर्द छलक उठा है। अर्धसैनिक बलों में सिपाही 'जीडी' के लिए ज्यादातर नियुक्तियां 18 से 20 वर्ष की आयु में हो जाती हैं। यूपीएस के तहत उन्हें अब 25 साल की सेवा में वीआरएस मिलेगी। अगर वे 45 साल की आयु में वीआरएस लेते हैं तो उनकी मासिक पेंशन 60 वर्ष की आयु में शुरु होगी। ऐसे में 15 वर्ष तक परिवार का गुजारा कैसे होगा।
यूपीएस में वीआरएस लेने की आयु और पेंशन मिलने की आयु को लेकर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों में रोष है। वे केंद्रीय कर्मचारी संगठनों के नेताओं से संपर्क कर रहे हैं। उनकी मांग है कि वीआरएस के लिए सेवा अवधि को बीस वर्ष किया जाए। इतना ही नहीं, बीस वर्ष की सेवा के बाद जब वे वीआरएस लें, तभी उनकी फुल पेंशन प्रारंभ हो। 'नेशनल मिशन फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम भारत' के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मंजीत सिंह पटेल ने बताया, हमारे पास केंद्रीय अर्धसैनिक बलों से रोजाना कई फोन आ रहे हैं। जवानों की गुजारिश होती है कि वीआरएस के केस में सेवा का कार्यकाल 20 साल करा दें। दूसरा, वीआरएस लेते ही फुल पेंशन शुरू हो जाए। ऐसा न हो कि जवान को अपनी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन के लिए 10-15 साल इंतजार करना पड़े। अगर पेंशन, साठ वर्ष की आयु में शुरु होगी तो उस वक्त तक परिवार का गुजारा कैसे होगा। यह गारंटी भी नहीं है कि तब तक कोई जवान, जीवित ही रहे। कब, कैसी परिस्थिति आ जाए, कोई नहीं जानता। इससे पहले अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ (एआईडीईएफ) के महासचिव सी. श्रीकुमार भी यह मुद्दा उठा चुके हैं।
'नेशनल मिशन फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम भारत' के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मंजीत सिंह पटेल कहते हैं, वीआरएस वालों को रिटायरमेंट की तय आयु पर ही पेंशन मिले, सरकार को ऐसा प्रावधान करना चाहिए। हालांकि कर्मचारियों की लड़ाई ओपीएस बहाली के लिए है। केंद्र सरकार को कम से कम, अर्धसैनिक बलों के जवानों के लिए यूपीएस के कुछ प्रावधानों को बदलना चाहिए। जवान को फुल पेंशन के लिए दस या पंद्रह वर्ष का इंतजार करना पड़े, ये ठीक नहीं है। क्या सरकार को यकीन है कि वह व्यक्ति रिटायरमेंट की आयु तक, अनिवार्य तौर पर जीवित ही रहेगा। यह गारंटी कौन देगा। डॉ. मंजीत पटेल ने इस बाबत प्रधानमंत्री मोदी को पत्र भी लिखा है।
पटेल का कहना है कि पूर्व वित्त सचिव टीवी सोमनाथन, जो अब कैबिनेट सचिव बन गए हैं, यूपीएस की प्रेसवार्ता के दौरान उनसे पूछा गया था कि वीआरएस 'स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति' लेने वालों का क्या होगा। उन्हें पेंशन कैसे मिलेगी। इस पर उन्होंने कहा था कि वीआरएस वालों को रिटायरमेंट की तय आयु पर ही पेंशन मिलेगी। अगर किसी कर्मचारी ने पचास साल की आयु में वीआरएस ले ली है, तो उसे पेंशन के लिए 60 साल तक इंतजार करना पड़ेगा। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में सिपाही पद के लिए भर्ती प्रक्रिया 18 से 20 वर्ष की आयु में पूरी हो जाती है। आरक्षण के मामले में यह प्रक्रिया 25 से तीस वर्ष की आयु तक खिंच सकती है। सिविल महकमों में यदि आरक्षण के जरिए भर्ती की सीमा 40 वर्ष तक भी चली जाती है। कई राज्यों में इसके लिए अलग अलग नियम तय किए गए हैं।
पटेल के मुताबिक, यूपीएस में 25 साल की सेवा के बाद पेंशन मिलने का नियम बताया गया है। सिविल महकमों में रिटायरमेंट की आयु सभी जगहों पर एक जैसी नहीं है। यूनिवर्सिटी में 65 वर्ष तक सेवा करने का नियम है। डॉक्टरों की रिटायरमेंट आयु भी अधिक है। केंद्र सरकार के कर्मियों की साठ वर्ष है। कहीं पर 58 साल भी संभव है। यहां पर एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या सरकार, वीआरएस लेने वाले कर्मचारी को दस वर्ष या पंद्रह वर्ष तक जीवित रहने की गारंटी भी देगी। सरकार को क्या पता है कि वह व्यक्ति पेंशन मिलने के तय समय तक जीवित रहेगा। अगर वह व्यक्ति बीच की अवधि में मर जाता है तो उसकी पेंशन का पैसा किसको जाएगा। फैमिली पेंशन तो बहुत कम होती है। मतलब यूपीएस के इस प्रावधान का नुकसान केवल संबंधित कर्मचारी या जवान के परिवार को ही उठाना है।
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में 'पुरानी पेंशन' बहाली का केस सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। अब यूपीएस के आने से इन बलों में ओपीएस लागू की उम्मीद टूट सी गई है। वजह, केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में यह बात कह सकती है कि ये बल भी अन्य कर्मचारियों की तरह यूपीएस के दायरे में आएंगे। यहां पर एक पेंच फिर भी फंसा रहेगा कि सरकार, सीएपीएफ को 'संघ के सशस्त्र बल' मानेगी या नहीं। दिल्ली हाईकोर्ट और खुद इन बलों का एक्ट यह बात मानता है कि सीएपीएफ 'संघ के सशस्त्र बल' हैं।
अगर सरकार भी सर्वोच्च अदालत में यह बात मान लेगी कि हां ये 'संघ के सशस्त्र बल' हैं तो इन्हें ओपीएस देना पड़ेगा। इस केस का आधार केवल एक ही है कि ये बल 'भारत संघ के सशस्त्र बल' हैं या नहीं। खास बात है कि मौजूदा समय में केंद्र सरकार ने आर्मी, नेवी और एयरफोर्स को ही 'संघ के सशस्त्र बल' माना है। इसी के चलते इन बलों में ओपीएस लागू है। पिछले दिनों सर्वोच्च अदालत ने इस मामले की सुनवाई की थी। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस निर्देश पर अंतरिम रोक लगाने की पुष्टि की है, जिसमें पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस), सीसीएस (पेंशन) नियम, 1972 के अनुसार, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों/केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के कर्मियों पर भी लागू होने की बात कही गई थी।
सीएपीएफ के 11 लाख जवानों/अफसरों ने गत वर्ष 'पुरानी पेंशन' बहाली के लिए दिल्ली हाई कोर्ट से अपने हक की लड़ाई जीती थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया। इस मामले में केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से स्टे ले लिया। जब केंद्र सरकार ने स्टे लिया, तभी यह बात साफ हो गई थी कि सरकार 'सीएपीएफ' को पुरानी पेंशन के दायरे में नहीं लाना चाहती। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 11 जनवरी 2023 को दिए अपने एक अहम फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' माना था। दूसरी तरफ केंद्र सरकार, सीएपीएफ को सिविलियन फोर्स बताती है। हाईकोर्ट ने इन बलों में लागू 'एनपीएस' को स्ट्राइक डाउन करने की बात कही। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, चाहे कोई आज इन बलों में भर्ती हुआ हो, पहले कभी भर्ती हुआ हो या आने वाले समय में भर्ती होगा, सभी जवान और अधिकारी, पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आएंगे। स्टे के चलते ये फैसला लागू नहीं हो सका।
सीएपीएफ पर भारतीय सेना के कानून लागू होते हैं, फोर्स के नियंत्रण का आधार भी सशस्त्र बल है। इन बलों के लिए जो सर्विस रूल्स तैयार किए गए हैं, उनका आधार भी फौज है। इन सारी बातों के होते हुए भी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को 'पुरानी पेंशन' से वंचित किया गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय भी यह मान चुका है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीएपीएफ', 'भारत संघ के सशस्त्र बल' हैं। केंद्र सरकार, कई मामलों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को सशस्त्र बल मानने को तैयार नहीं होती। सीएपीएफ में पुरानी पेंशन का मुद्दा भी इसी चक्कर में फंसा हुआ है। एक जनवरी 2004 के बाद केंद्र सरकार की नौकरियों में भर्ती हुए सभी कर्मियों को पुरानी पेंशन के दायरे से बाहर कर उन्हें 'एनपीएस' में शामिल कर दिया गया। इसी तर्ज पर सीएपीएफ जवानों को सिविल कर्मचारी मानकर उन्हें भी एनपीएस में शामिल कर दिया।
तब केंद्र सरकार का मानना था कि देश में सेना, नेवी और वायु सेना ही 'सशस्त्र बल' हैं। बीएसएफ एक्ट 1968 में कहा गया है कि इस बल का गठन 'भारत संघ के सशस्त्र बल' के रूप में हुआ है। इसी तरह सीएपीएफ के बाकी बलों का गठन भी भारत संघ के सशस्त्र बलों के रूप में हुआ है। कोर्ट ने माना है कि 'सीएपीएफ' भी भारत के सशस्त्र बलों में शामिल हैं। इस लिहाज से उन पर 'एनपीएस' लागू नहीं होता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 6 अगस्त 2004 को जारी पत्र में घोषित किया गया है कि गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत केंद्रीय बल, 'संघ के सशस्त्र बल' हैं।
केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में फौजी महकमे वाले सभी कानून लागू होते हैं। सरकार खुद मान चुकी है कि ये बल तो भारत संघ के सशस्त्र बल हैं। इन्हें अलाउंस भी सशस्त्र बलों की तर्ज पर मिलते हैं। इन बलों में कोर्ट मार्शल का भी प्रावधान है। इस मामले में सरकार दोहरा मापदंड अपना रही है। अगर इन्हें सिविलियन मानते हैं तो आर्मी की तर्ज पर बाकी प्रावधान क्यों हैं। फोर्स के नियंत्रण का आधार भी सशस्त्र बल है। जो सर्विस रूल्स हैं, वे भी सैन्य बलों की तर्ज पर बने हैं। अब सरकार इन्हें सिविलियन फोर्स बता रही है। ऐसे में ये बल अपनी सर्विस का निष्पादन कैसे करेंगे। इन बलों को शपथ दिलाई गई थी कि इन्हें जल, थल और वायु में जहां भी भेजा जाएगा, ये वहीं पर काम करेंगे। सिविल महकमे के कर्मी तो ऐसी शपथ नहीं लेते हैं।