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#WorldNoTobaccoDay ....कल तक मैं इसको पीता था, आज ये मुझको पीती है...
विजय जैन
Updated Wed, 31 May 2017 01:11 PM IST
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तलब है सिगरेट पीने की, जो हर पल में मुझे बेचैन करती है।
बिन पीए तो 'विजय' ही रहता हूं, पीते ही मुझे जैन करती है।।
सिगरेट, एक साथी जो पिछले 15 साल से मेरे साथ एक साथी की तरह है। अकेला हुआ तो ज्यादा हो गई, परिवार के साथ होता हूं तो कम हो जाती है। सिगरेट पीने के नुकसान से वाकिफ हूं, लेकिन फिर भी छोड़ नहीं पाता। हालांकि तबीयत के साथ भी इसका सीधा नाता है। तबीयत यही तो कुछ ज्यादा, तबीयत गड़बड़ तो कुछ कम। इतना जरूर है कि चैन स्मोकर नहीं हूं। हदें जानता हूं और उसे निभाता भी हूं।
'मै जिंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र तो धुएं में उड़ाता चला गया।'
अभिनेता देवानंद पर फिल्माए इस गीत में मेरे सिगरेट पीने का मकसद भी साफ तौर पर झलकता है। कोई और कुछ भी कहे, लेकिन मेरे सिगरेट पीने के कारण मेरी अपनी सोच है। शायद मैं गलत हूं, लेकिन मेरा मानना है कि सिगरेट मुझे तनाव से मुक्त करती है। शरीर में नई उर्जा का संचार करती है। नए आइडिया जेरनेट करने में सबसे करीबी साथी का काम करती है। हालांकि मेरा मकसद यही रहता है कि साथी के साथ वक्त की बर्बादी न हो। साथी का काम खत्म और अपना शरू।
कलम के संग जब साथ जुड़ा, वक्त ने करियर दिखा दिया,
समाचारों में जब दुनिया देखी तो शब्दों ने पीना सिखा दिया।
2002 में पत्रकारिता करियर की शुरुआत हुई और सिगरेट पीने की भी। समय के साथ जैसे तजुर्बा बढ़ा, वैसे ही खर्चा। हालांकि ये बात भी सच है कि कम वेतन के बावजूद कभी सिगरेट का खर्चा मुझे बोझ नहीं लगा। असूल यही बनाया कि सिगरेट कभी उधार नहीं पीउंगा और न ही कभी पी।
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दो साल पहले एक्सीडेंट हुआ। ऑपरेशन हुआ तो उस समय एक महीने सिगरेट नहीं पी। परिवार भी खुश कि शुक्र है, बला से पीछा छूटा, लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। जमीन पर पांव रखते ही लबों पर फिर से सिगरेट आ गई। सिगरेट पीता हूं, मां जानती है, दुखी भी होती है, लेकिन पर्दा कायम है, क्योंकि समय के साथ ये तलब इतनी पुरानी हो गई है कि चाहता तो हूं कि छोड़ दूं, लेकिन....
कौन कहता है कि दुनिया मैने जीती है,
कल तक मैं इसको पीता था, आज ये मुझको पीती है...
-विजय जैन
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बिन पीए तो 'विजय' ही रहता हूं, पीते ही मुझे जैन करती है।।
सिगरेट, एक साथी जो पिछले 15 साल से मेरे साथ एक साथी की तरह है। अकेला हुआ तो ज्यादा हो गई, परिवार के साथ होता हूं तो कम हो जाती है। सिगरेट पीने के नुकसान से वाकिफ हूं, लेकिन फिर भी छोड़ नहीं पाता। हालांकि तबीयत के साथ भी इसका सीधा नाता है। तबीयत यही तो कुछ ज्यादा, तबीयत गड़बड़ तो कुछ कम। इतना जरूर है कि चैन स्मोकर नहीं हूं। हदें जानता हूं और उसे निभाता भी हूं।
'मै जिंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र तो धुएं में उड़ाता चला गया।'
अभिनेता देवानंद पर फिल्माए इस गीत में मेरे सिगरेट पीने का मकसद भी साफ तौर पर झलकता है। कोई और कुछ भी कहे, लेकिन मेरे सिगरेट पीने के कारण मेरी अपनी सोच है। शायद मैं गलत हूं, लेकिन मेरा मानना है कि सिगरेट मुझे तनाव से मुक्त करती है। शरीर में नई उर्जा का संचार करती है। नए आइडिया जेरनेट करने में सबसे करीबी साथी का काम करती है। हालांकि मेरा मकसद यही रहता है कि साथी के साथ वक्त की बर्बादी न हो। साथी का काम खत्म और अपना शरू।
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कलम के संग जब साथ जुड़ा, वक्त ने करियर दिखा दिया,
समाचारों में जब दुनिया देखी तो शब्दों ने पीना सिखा दिया।
2002 में पत्रकारिता करियर की शुरुआत हुई और सिगरेट पीने की भी। समय के साथ जैसे तजुर्बा बढ़ा, वैसे ही खर्चा। हालांकि ये बात भी सच है कि कम वेतन के बावजूद कभी सिगरेट का खर्चा मुझे बोझ नहीं लगा। असूल यही बनाया कि सिगरेट कभी उधार नहीं पीउंगा और न ही कभी पी।
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दो साल पहले एक्सीडेंट हुआ। ऑपरेशन हुआ तो उस समय एक महीने सिगरेट नहीं पी। परिवार भी खुश कि शुक्र है, बला से पीछा छूटा, लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। जमीन पर पांव रखते ही लबों पर फिर से सिगरेट आ गई। सिगरेट पीता हूं, मां जानती है, दुखी भी होती है, लेकिन पर्दा कायम है, क्योंकि समय के साथ ये तलब इतनी पुरानी हो गई है कि चाहता तो हूं कि छोड़ दूं, लेकिन....
कौन कहता है कि दुनिया मैने जीती है,
कल तक मैं इसको पीता था, आज ये मुझको पीती है...
-विजय जैन