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अमित शाह: आखिर कैसे एक कार्यकर्ता से बन गए भाजपा के सबसे सफल अध्यक्ष

Thu, 23 May 2019 09:52 PM IST
सोनू शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Thu, 23 May 2019 09:52 PM IST
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Amit shah how a worker became most successful BJP president
अमित शाह - फोटो : PTI

एक राजनीतिक पार्टी अध्यक्ष के तौर पर बेहतरीन काम करना और अपनी पार्टी को लगातार जीत दिलाना, किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता है। लेकिन इसको आसान बनाया है भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने। एक समय था जब अमित शाह पार्टी के साधारण से कार्यकर्ता हुआ करते थे। वह अटल बिहारी वाजपेयी जैसे भाजपा के दिग्गज नेताओं के लिए पोस्टर चिपकाने का काम किया करते थे, लेकिन आज वहीं अमित शाह अपनी चाणक्य जैसी नीतियों के बल पर खुद पार्टी के पोस्टर ब्वॉय बन गए हैं।

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2014 के लोकसभा चुनाव से करीब 10 महीने पहले यानी 12 जून, 2013 को अमित शाह को पहली बार पार्टी की ओर के उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था। तब प्रदेश में भाजपा के पास महज 10 लोकसभा सीटें ही थीं। उनके संगठनात्मक कौशल और नेतृत्व क्षमता का अंदाजा तब लगा, जब 16 मई 2014 को सोलहवीं लोकसभा चुनाव के परिणाम घोषित हुए। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 71 सीटें जीतकर चमत्कार कर दिया था। उत्तर प्रदेश में भाजपा की ये अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। इस करिश्माई जीत के बाद अमित शाह का कद पार्टी के भीतर इतना बढ़ा कि उन्हें सीधे अध्यक्ष बना दिया गया। इसके बाद की कहानी तो आप देख ही रहे हैं कि उन्होंने पार्टी को कहां पहुंचाया है।

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राजनीति में आने से पहले पिता का कारोबार संभालते थे शाह

22 अक्टूबर, 1964 को महाराष्ट्र के मुंबई में जन्मे अमित शाह गुजरात के एक रईस परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई मेहसाणा में हुई है। उसके बाद बॉयोकेमिस्ट्री की पढ़ाई के लिए शाह अहमदाबाद आ गए, जहां से उन्होंने बॉयोकेमिस्ट्री में बीएससी की और फिर अपने पिता का कारोबार संभालने में जुट गए। उनके पिता का मनसा में प्लास्टिक के पाइप का कारोबार था।

14 साल की उम्र में आरएसएस में हुए थे शामिल

कहते हैं कि अमित शाह महज 14 साल की उम्र में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे। उनकी राजनीतिक शुरुआत यहीं से हुई थी। साल 1982 में वो एबीवीपी के सबसे युवा कार्यकर्ताओं में से एक थे। (इसी साल उनकी मुलाकात मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई थी) उनके काम से प्रभावित होकर संगठन ने उसी साल उन्हें अहमदाबाद का सचिव बना दिया। इसके बाद 1986 में वह भाजपा में शामिल हुए और तब से उन्होंने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

कभी आडवाणी और अटल बिहारी के लिए किया था चुनाव प्रचार

1991 अमित शाह के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा साल था, क्योंकि पार्टी की ओर से उन्हें लालकृष्ण आडवाणी के लिए गांधीनगर संसदीय क्षेत्र में चुनाव प्रचार का जिम्मा दिया गया था। उन्होंने अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। इसके बाद साल 1996 में शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के लिए भी चुनाव प्रचार किया। इसी साल अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार प्रधानमंत्री का पद संभाला था।

42 छोटे-बड़े चुनाव लड़े, सभी में मिली जीत

1989 से 2014 के बीच अमित शाह ने गुजरात राज्य विधानसभा और विभिन्न स्थानीय निकायों के लिए 42 छोटे-बड़े चुनाव लड़े और सभी में उन्हें जीत मिली। 1997, 1998, 2002 और 2007 में वह सरखेज विधानसभा क्षेत्र से जीते। इसके बाद साल 2012 में वह अहमदाबाद के नरणपुरा से विधायक बने। वर्तमान में वह राज्यसभा सांसद हैं।

इसके अलावा 1999 में वह अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक (एडीसीबी) के प्रेसिडेंट चुने गए। 2009 में गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष बने और फिर 2014 में नरेंद्र मोदी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद वही इसके अध्यक्ष भी बने। 2003 से 2010 तक उन्होंने गुजरात सरकार की कैबिनेट में गृह मंत्रालय का जिम्मा संभाला।

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फर्जी मुठभेड़ के आरोप लगे, फिर अदालत ने दी क्लिन चिट

अमित शाह ने अपने जीवन में उतार-चढ़ाव भी खूब देखे हैं। शाह तब सुर्खियों में आए, जब 2004 में अहमदाबाद के बाहरी इलाके में कथित रूप से एक फर्जी मुठभेड़ में इशरत जहां, ज़ीशान जोहर और अमजद अली राणा के साथ प्रणेश की हत्या हुई। गुजरात पुलिस का दावा था कि साल 2002 में गोधरा कांड का बदला लेने के लिए ये लोग तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मारने आए थे।

इस मामले में गोपीनाथ पिल्लई ने अदालत में एक आवेदन देकर मामले में अमित शाह को भी आरोपी बनाने की अपील की थी। एक समय ऐसा भी आया जब सोहराबुद्दीन शेख की फर्जी मुठभेड़ के मामले में साल 2010 में 25 जुलाई को उन्हें गिरफ्तार भी होना पड़ा। उनके बेहद खास रहे गुजरात पुलिस के निलंबित अधिकारी डीजी बंजारा ने शाह पर आरोप लगाए। हालांकि 15 मई 2014 को सीबीआई की एक विशेष अदालत ने शाह के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण इस याचिका को खारिज कर दिया।

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