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अमित शाह कब, कहां निशाना लगा दें, कोई नहीं जानता: एनडीएमए के मंच पर 'कांग्रेस' को घेरने से चूके नहीं केंद्रीय गृह मंत्री

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 30 Sep 2021 05:25 PM IST
सार

अमित शाह ने कहा, भारत में आपदा प्रबंधन की यात्रा थोड़ी देर से शुरू हुई। 1995 में तत्कालीन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन केंद्र की स्थापना हुई। वह भी कृषि विभाग के अंतर्गत शुरू हुआ। ये एक अच्छी शुरुआत थी। उसके बाद हमारे देश में दो वर्षों में दो बड़ी घटनाएं हुईं। 1999 में ओडिशा में सुपर साइक्लोन आया और 10,000 लोग मारे गए। इसके बाद वर्ष 2001 में भुज में आए भूकंप में 14,000 लोग मारे गए...

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Amit Shah criticized congress at NDMA Function, said- disaster management task force should have started after Bhopal tragedy in India
नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के 17वें स्थापना दिवस समारोह में अमित शाह - फोटो : Agency

विस्तार

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की शैली को समझना हर किसी के वश की बात नहीं है। वे कब, कहां निशाना लगाना दें, ये कोई नहीं जानता। मंगलवार को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के 17वें स्थापना दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। वे मंच से आपदा प्रबंधन के बारे में बात कर रहे थे। शाह ने कहा कि असल में एनडीएमए की शुरुआत भोपाल त्रासदी के बाद हो जानी चाहिए थी, क्योंकि ये एक ऐसी घटना थी, जिसने देश को झकझोर कर रख दिया था। एक ही शहर में 8,000 लोगों की मृत्यु होना एक बहुत बड़ी घटना थी। उसके बाद वाजपेयी के समय ये यात्रा शुरू हुई और आज जब पिछले 17 वर्षों की तरफ मुड़कर देखते हैं तो हम बहुत बड़ी मंजिल तय कर चुके हैं। अभी बहुत लंबा रास्ता बाकी है, हम अभी संतुष्ट होने की स्थिति में नहीं पहुंचे हैं। केंद्रीय गृह मंत्री का साफ इशारा था कि कांग्रेस के शासनकाल में हुई 'भोपाल गैस त्रासदी' की घटना के बाद ऐसी आपदाओं से बचाव के लिए जिस तेजी से ठोस काम होना चाहिए था, वह नहीं हो सका।

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केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि देशभर में कई बड़े उद्योग हैं, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम हैं और कई बड़ी कंपनियों के पास आपदा के खिलाफ लड़ने के संसाधन भी उपलब्ध हैं, लेकिन पहले इन्हें कभी शासन के साथ जोड़ा नहीं गया। आज हर कलेक्टर के पास उसके जिले में आपदा के खिलाफ लड़ने के उपलब्ध संसाधनों, चाहे वे सरकार के पास हों या फिर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पास या फिर निजी कंपनियों के पास, उनकी कंप्यूटराइज्ड सूची है। इन्हें उपयोग करने की व्यवस्था भी है। जैसे ही चेतावनी आती है, तुरंत इन संसाधनों को प्रयोग में लिया जा सकता है। पहले, जब आपदा आती थी तो ये सब संसाधन उपयोग में नहीं आते थे, लेकिन यह योजना बनने के कारण इन सबका उपयोग हो रहा है और जान-हानि कम से कम हो रही है और यह एक बहुत बड़ा काम है। मोदी सरकार इसे बखूबी कर रही है।

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वाजपेयी के समय शुरू हुई टास्कफोर्स

शाह ने कहा, भारत में आपदा प्रबंधन की यात्रा थोड़ी देर से शुरू हुई। 1995 में तत्कालीन राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन केंद्र की स्थापना हुई। वह भी कृषि विभाग के अंतर्गत शुरू हुआ। ये एक अच्छी शुरुआत थी। उसके बाद हमारे देश में दो वर्षों में दो बड़ी घटनाएं हुईं। 1999 में ओडिशा में सुपर साइक्लोन आया और 10,000 लोग मारे गए। इसके बाद वर्ष 2001 में भुज में आए भूकंप में 14,000 लोग मारे गए। इन दोनों घटनाओं ने देश और सरकार के व्यवस्था तंत्र को झकझोर कर रख दिया। वहीं से विचार आया कि क्यों ना एक ऐसी व्यवस्था की जाए जो अपने आप में स्वतंत्र हो। वह ऐसी एजेंसियों के साथ जुड़े जो तत्काल कार्रवाई कर सके। उस वक्त वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने एक टास्क फ़ोर्स का गठन किया। संयोग से उसी वक्त नरेंद्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने भी गुजरात में इस पर काफ़ी चिंतन किया। इसे एक मूर्त रूप देने की बात शुरू हुई और 2005 में एनडीएमए की स्थापना हुई। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।

पहले ही पता चल जाता हैं गिरेगी आकाशीय बिजली

कॉमन अलर्ट प्रोटोकॉल को लेकर अमित शाह ने कहा, इसका अच्छी तरह से प्रचार किया जाना चाहिए। एनडीएमए ने कई बहुत अच्छी पहल की हैं, जिसके अंतर्गत बिजली गिरने के स्थान के बारे में हम छह मिनट पहले और बड़े क्षेत्र का कुछ घंटे पहले अलर्ट दे सकते हैं। शीतलहर और भीषण गर्मी के लिए कार्य योजना बनाई है, लेकिन इन पर अमल नहीं होता है। अगर अर्ली वॉर्निंग देने वाली एजेंसियां और इस प्रकार की चेतावनी अमल में आ जाए तो काफी जानें बचाई जा सकती हैं। 1999 के तूफान में 10,000 लोगों की मृत्यु हुई थी और इस साल तीन तूफान आए हैं लेकिन मृत्यु का आंकड़ा 50 से ज़्यादा नहीं है। अब हम बहुत पहले से ही इसकी चेतावनी दे देते हैं, वहां से लोगों को बचाने का काम होता है, कच्चे घरों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की व्यवस्था होती है। केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि राज्यों ने भी इसके लिए बहुत अच्छा तंत्र खड़ा किया है। केंद्र और राज्य मिलकर मृत्यु का आंकड़ा बहुत कम करने में सफल हुए हैं। अगर हम सरोवर बना देते हैं तो ब्रह्मपुत्र में बाढ़ आने की संभावना 40 फीसदी कम हो जाती है। नेसैक इस प्रकार की लोकेशन ढूंढने का काम कर रहा है और इसमें सफलता भी मिली है। अब तक 19 लोकेशन ढूंढ ली गई हैं, जहां बड़े सरोवर बन जाएंगे और वहां पानी भेजने में ऊर्जा भी नहीं लगेगी, टोपोग्राफी से ही पानी वहां पहुंच जाएगा।

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