गुजरात चुनाव: राजनीति में अटकी पार-तापी-नर्मदा लिंक परियोजना! 27 आदिवासी बहुल सीटों पर थी भाजपा को नुकसान की आशंका
अमर उजाला से चर्चा में आदिवासी नेताओं ने आरोप लगाते हुए कहा कि महाराष्ट्र के डांग, वलसाड और नासिक जिले में छह जलाशय विकसित होने से करीब 50,000 लोग सीधे प्रभावित होंगे। इनमें से तीन बांध डांग में, एक वलसाड में और दो महाराष्ट्र में विकसित किए जाएंगे। डांग जिले के वाघई तालुका में बनने वाले तीन बांधों के डूब क्षेत्रों में कम से कम 35 गांव पूरी तरह से जलमग्न हो जाएंगे...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
गुजरात में प्रस्तावित पार-तापी नर्मदा लिंक परियोजना सत्ताधारी भाजपा के लिए अब परेशानी का सबब बनते जा रही है। विधानसभा चुनाव को देखते हुए भले ही भाजपा ने फिलहाल इस योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया हो, लेकिन विपक्षी दल कांग्रेस ने स्थानीय आदिवासी संगठनों के साथ मिलकर भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर भाजपा सरकार विधानसभा चुनाव से पहले इस योजना पर काम शुरू कर देती, तो चुनाव में करीब 27 आदिवासी बाहुल सीटों पर उसे नुकसान उठाना पड़ सकता था। इसी सिलसिले में गुजरात के मंत्रियों और पार्टी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से दिल्ली में मुलाकात की और आदिवासियों के विरोध की जानकारी दी। इसके बाद ही केंद्र सरकार ने पार-तापी-नर्मदा (पीटीएन) नदी जोड़ो परियोजना को छोड़ने का फैसला किया है।
आखिर किसान क्यों कर रहे हैं विरोध?
अमर उजाला से चर्चा में आदिवासी नेताओं ने आरोप लगाते हुए कहा कि महाराष्ट्र के डांग, वलसाड और नासिक जिले में छह जलाशय विकसित होने से करीब 50,000 लोग सीधे प्रभावित होंगे। इनमें से तीन बांध डांग में, एक वलसाड में और दो महाराष्ट्र में विकसित किए जाएंगे। डांग जिले के वाघई तालुका में बनने वाले तीन बांधों के डूब क्षेत्रों में कम से कम 35 गांव पूरी तरह से जलमग्न हो जाएंगे। नदी जोड़ने की परियोजना की लागत 10,211 करोड़ रुपये है और अगर सरकार सौराष्ट्र और कच्छ में सिंचाई के लिए बड़े बांध बनाना चाहती है तो उन्हें वहां इन बांधों को विकसित करना चाहिए। यहां बांध बनाने और वहां पानी लेने का कोई मतलब नहीं है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पार-तापी-नर्मदा नदियों को जोड़ने वाली इस परियोजना के तहत सात बांधों के निर्माण के कारण लगभग 7,500 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो जाएगी। इससे पहले साल 2007-2008 में आदिवासियों के कड़े विरोध के बाद यह परियोजना रुक गई थी। आदिवासी नेताओं का आरोप है कि केंद्र ने नर्मदा योजना की विफलता को छिपाने के लिए परियोजना को डिजाइन किया है। परियोजना के परिणामस्वरूप डांग, वलसाड और तापी जिलों में सैकड़ों आदिवासी विस्थापित होंगे। सागौन और बांस और अन्य लकड़ियों से भरपूर डांग के जंगल जलमग्न हो जाएंगे। आदिवासी नेताओं का कहना है कि उन्होंने नर्मदा योजना, स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, उकाई आदि जैसी कई परियोजनाएं देखी हैं, जहां आदिवासियों को उनकी भूमि से विस्थापित होने के लिए मुआवजा दिया जाना बाकी है।
विधानसभा चुनाव को देख सरकार ने खींचे हाथ
कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार ने आदिवासी आबादी और आगामी राज्य चुनावों के विरोध के कारण गुजरात में नदी जोड़ने की परियोजना को रोक दिया है। भाजपा सरकार को आगामी गुजरात चुनावों के कारण पर-तापी-नर्मदा नदी-जोड़ने की परियोजना को रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा है, क्योंकि जमीनी स्तर पर आंदोलन ने हजारों आदिवासियों के संभावित विस्थापन का विरोध किया था। उनका दावा है कि इससे वलसाड, डांग और नवसारी जिलों में उनकी आजीविका नष्ट हो जाएगी। लेकिन मध्यप्रदेश में विनाशकारी केन-बेतवा लिंक परियोजना जारी है। आदिवासी समुदाय के विरोध के बाद भाजपा सांसदों ने परियोजना को रोकने के लिए गृह मंत्री से मुलाकात की और बाद में यह फैसला लिया गया।
परियोजना को लेकर गोहिल ने भाजपा से पूछे सवाल
अमर उजाला से चर्चा में कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद शक्ति सिंह गोहिल ने कहा कि तापी पार-नर्मदा लिंक परियोजना में हजारों आदिवासी परिवारों को नुकसान होगा। कांग्रेस आदिवासी परिवारों के अधिकार की लड़ाई लड़ेगी। गोहिल ने सरकार से सवाल किया कि, नर्मदा का 18 लाख हेक्टर सिंचाई का कमांड एरिया था, वो क्यों नहीं किया? कच्छ, सौराष्ट्र, नॉर्थ गुजरात के जरूरत वाले विस्तार में पानी क्यों नहीं पहुंचा। उद्योगपतियों को नर्मदा योजना में प्रावधान नहीं होने के बाद भी क्यों पानी दे रहे हो।
गोहिल कहा कि इस परियोजना के खिलाफ जब आदिवासी नेताओं ने आंदोलन चलाया। जब भाजपा को लगा कि आगामी विधानसभा चुनाव में नुकसान हो जाएगा तो फिर इसे स्थगित करने की घोषणा की गई। यह घोषणा सरकार ने नहीं की, बल्कि उसकी जगह भाजपा के गुजरात प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल ने की। गोहिल ने यह भी कहा कि कांग्रेस विकास के खिलाफ नहीं है, लेकिन चंद पूंजीपतियों का फायदा पहुंचाने के लिए हजारों आदिवासी परिवारों को नुकसान पहुंचाने की कोई बात करेगा तो उसका हम पुरजोर विरोध करेंगे।
पार-तापी-नर्मदा लिंक परियोजना से हजारों आदिवासी परिवार प्रभावित होंगे, जिसमें हमारे पास दक्षिण गुजरात में बहुत बड़ा जंगल है, वह जंगल बरबाद होगा। वनसंपत्ती पर आदिवासियों का अधिकार के कानून होने के बावजूद गुजरात में आदिवासियों को सनद दी जाती है, अधिकार पत्र नहीं। आदिवासी गांव की जमीन लेनी है तो ग्रामसभा का प्रस्ताव जरूरी है, गुजरात सरकार ने उस एक्ट को ही बदल लिया, ताकि अपने चहेते उद्योगपति मित्रों को जमीन दे पाए।
ये है पार-तापी-नर्मदा नदी लिंक परियोजना
- पार-तापी-नर्मदा लिंक परियोजना पश्चिमी घाट के जल अधिशेष क्षेत्रों से सौराष्ट्र और कच्छ (गुजरात) के पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पानी भेजा जाएगा।
- इस लिंक परियोजना में उत्तर महाराष्ट्र और दक्षिण गुजरात में प्रस्तावित सात जलाशय शामिल हैं। सात प्रस्तावित जलाशयों का जल 395 किमी. लंबी नहर के माध्यम से संचालित सरदार सरोवर परियोजना (नर्मदा पर) से छोटे रास्ते के क्षेत्रों की सिंचाई करते हुए लिया जाएगा।
- योजना में प्रस्तावित सात बांध झेरी, मोहनकवचली, पाइखेड़, चसमांडवा, चिक्कर, डाबदार और केलवान हैं। इससे सरदार सरोवर का पानी बचेगा जिसका उपयोग सौराष्ट्र और कच्छ क्षेत्र में सिंचाई के लिये किया जाएगा। इस लिंक में मुख्य रूप से सात बांधों तीन डायवर्ज़न वियर, दो सुरंगों, 395 किमी. लंबी नहर, 6 बिजली घरों और कई क्रॉस-ड्रेनेज कार्यों के निर्माण की परिकल्पना की गई है।