ट्रिपल तलाक पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी व केंद्र सरकार का पक्ष समान
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ट्रिपल तलाक को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी और केंद्र सरकार का पक्ष, एक ही पाले में हैं। सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल करते हुए केंद्र सरकार ने मुस्लिम समुदाय में ट्रिपल तलाक की प्रथा का विरोध करते हुए कहा था कि 65 वर्षों से मुस्लिम समुदाय में सुधार न होने की वजह से महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर व असुरक्षित बना दिया है।
केंद्र सरकार का मानना है कि ट्रिपल तलाक और बहुविवाह को धर्म का अहम या जरूरी हिस्सा नहीं करार दिया जा सकता। संविधान केअनुच्छेद-25 के तहत ट्रिपल तलाक या बहुविवाह की छूट नहीं मिली है और न ही यह धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इस तरह की प्रथाओं की वैधता को समानता, सम्मान और अभेदभावपूर्ण के सिद्धांतों के आलोक में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पुन:परीक्षण की जरूरत है। सरकार का मानना है कि ट्रिपल तलाक और बहुविहवा का महिलाओं की स्थिति पर बड़ा असर पर पड़ता है।
यह मूल अधिकारों से जुड़ा मामला भी है
वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर परीक्षण का निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रथम दृष्टया यह माना है कि यह न सिर्फ नीतिगत मसला है बल्कि यह मूल अधिकारों से जुड़ा मामला भी है। शीर्ष अदालत ने भी यह महसूस किया है कि कई मामलों में पति द्वारा मनमाने तरीके से तलाक लेने या पहली पत्नी केरहते दूसरी शादी करने जैसे मामले में मुस्लिम महिलाएं कई बार भेदभाव की शिकार होती हैं।
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर शीर्ष अदालत के कई फैसलों को देखते हुए ट्रिपल तलाक की वैधता को संवैधानिक मापदंडों पर परीक्षण की दरकार है। फिलहाल इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है और एक केबाद कई पक्षकार इसमें शामिल होते जा रहे हैं।