फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Allahabad High court held nullity to Legal nikah Under Muslim law

इस्लामी कानून के तहत वैध निकाह को हाईकोर्ट ने अवैध ठहराया, सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई

Wed, 11 Sep 2019 01:01 AM IST
देव कश्यप राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Wed, 11 Sep 2019 01:01 AM IST
सार

  • इस्लामी कानून के तहत निकाह को हाईकोर्ट ने ठहराया अवैध
  • पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैबियस कॉरपस याचिका दायर की, लेकिन वह खारिज हो गई
  • मुस्लिम युवती को व्यस्क होने तक नारी निकेतन में रखने के निर्णय को हाईकोर्ट ने ठहराया सही
  • सुप्रीम कोर्ट मामले में करेगा सुनवाई

विज्ञापन
Allahabad High court held nullity to Legal nikah Under Muslim law
Allahabad High Court - फोटो : PTI

विस्तार

इस्लामी कानून के तहत निकाह करने वाली मुस्लिम युवती को व्यस्क होने तक पति के साथ रहने का अधिकार नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर मसले पर सुनवाई को राजी हो गया है। युवती ने अपनी मर्जी से पसंद के लड़के के साथ शादी की थी। अहम बात है कि हाईकोर्ट ने न केवल इस निकाह को अवैध ठहरा दिया बल्कि युवती को नारी निकेतन में रखने के निर्णय को भी सही ठहराया।

विज्ञापन


उत्तर प्रदेश के बहराइच की रहने वाली 16 वर्षीय फातीमा ने गत 22 जून को अपनी मर्जी के साथ एक मुस्लिम युवक के साथ निकाह किया था। इस जोड़े ने मुस्लिम कानून के तहत निकाह के तमाम शर्तों को पूरा किया था। इसके बाद युवती के पिता की शिकायत पर लड़के के खिलाफ अपरहरण सहित अन्य अपराधों के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। मजिस्ट्रेट के समक्ष अपनी मर्जी के साथ निकाह करने व उसके साथ रहने की इच्छा के बावजूद उसे व्यस्क होने तक नारी निकेतन भेज दिया गया। इसके बाद उसके पति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में हैबियस कॉरपस याचिका दायर की, लेकिन वह खारिज हो गई। हाईकोर्ट ने युवती को नारी निकेतन में रखने के तो फैसले को तो सही ठहराया ही बल्कि शादी को भी शून्य करार दिया।
विज्ञापन


वकील दुष्यंत पराशर के माध्यम से दायर इस मुस्लिम नाबालिग युवती ने नारी निकेतन में भेजने व निकाह को शून्य करार देने के फैसले को चुनौती दी है। याचिका में कहा गया कि मुस्लिम कानून के तहत, रजोस्वला की उम्र (15 वर्ष) की युवती को अपनी मर्जी से निकाह करने का अधिकार है। युवती के मुताबिक, निकाह की तमाम शर्तों को पूरा करने के बाद भी उसे पति के साथ रहने की इजाजत न देना और शादी को शून्य करार देना, गैरकानूनी है। युवती ने कहा है वह अपने पति के साथ रहना चाहती है तो उसे ऐसा करने से महरूम कैसे रखा जा सकता है।

विज्ञापन
विज्ञापन

न्यायमूर्ति एनवी रमण, न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की पीठ ने इस मसले का परीक्षण करने का निर्णय लेते हुए यूपी सरकार, समेत अन्य को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा है। युवती की वकील दुष्यंत पराशर ने पीठ से कहा कि युवती ने अपने प्रेमी से अपनी मर्जी के साथ शादी की है। उसने मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयान (धारा-164 के तहत) में भी कहा था कि बिना किसी दबाव के उसने निकाह किया है और वह अपने पति के साथ रहना चाहती है। बावजूद इसके शादी को शून्य करार देना और उसे अयोध्या के नारी निकेतन में रखने का आदेश, गैरकानूनी और असंवैधानिक है। उन्होंने युवती को नारी निकेतन में रखने को अवैध डिटेंशन करार दिया है। उन्होंने कहा कि ऐसा करना मौलिक अधिकारों का हनन है।

आखिर 16 वर्ष की आयु में ही क्यों निकाह करना पड़ा युवती को

युवती का आरोप है कि वह पिछले दो वर्ष से एक मुस्लिम लड़के से प्यार करती थी, लेकिन पिता उसकी शादी तीन-चार बच्चे वाले एक शख्स के साथ करना चाहते थे। लिहाजा वह घर से भाग गई और उसने अपने प्रेमी के साथ निकाह कर लिया।

निकाह को लेकर क्या कहता है मुस्लिम कानून

- युवक व युवती 15 वर्ष की आयु (रजोस्वला) पार कर चुके हों
- दोनों मुस्लिम हों
- निकाह में प्रस्ताव व मंजूरी हो, दो गवाह की मौजूदगी हो
- मेहर व उपहार
- प्रतिबंधित रिश्ते से अलग हो

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed