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UP Assembly Election 2022: अखिलेश रालोद-आप सबको बनाएंगे अपना पर ओवैसी को अब तक ना-ना, क्या AIMIM भी होगी साइकिल पर सवार
Wed, 24 Nov 2021 04:56 PM IST
प्रतिभा ज्योति
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: प्रतिभा ज्योति
Updated Wed, 24 Nov 2021 04:56 PM IST
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सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव व असदुद्दीन ओवैसी।
- फोटो :
amar ujala
विस्तार
अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी ने कमर कस ली है। पार्टी ने सभी छोटे दलों के लिए गठबंधन के दरवाजे खोल दिए हैं, जिसमें राष्ट्रीय लोक दल, आम आदमी पार्टी, ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से लेकर अपना दल तक का स्वागत हो रहा है। गठबंधन के लिए अखिलेश यादव की रालोद के अध्यक्ष जयंत चौधरी और आम आदमी पार्टी के यूपी प्रभारी संजय सिंह से बात हो चुकी है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी पहले ही गठबंधन का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के लिए सपा के दरवाजे तो क्या खिड़कियां तक बंद है।पर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के एक न्यूज चैनल को दिए बयान ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या ओवैसी भी इस गठबंधन का हिस्सा बनने जा रहे हैं? मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक राजभर ने कथित तौर पर कहा है किओवैसी भी सपा के साथ गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राजभर ने कहा ओवैसी चुनाव में अखिलेश के साथ आ सकते हैं, लेकिन उन्हें 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग छोड़नी होगी। 10 सीट पर लड़ना है तो बताइए फिर बात करें'। हालांकि कुछ ही दिनों पहले अखिलेश यादव ओवैसी के साथ किसी भी तरह के गठबंधन से मना कर चुके हैं।
चुनाव में भाजपा को हराने के लिए जब अखिलेश सभी छोटी पार्टियों को साथ लेकर सभी समीकरण दुरुस्त करने में जुटे हैं लेकिन अभी तक ओवैसी से दूरी बनाए हुए हैं। आखिर इसकी वजह क्या है? पार्टी नेता इसके इसके पीछे की वजह यह बताते हैं कि समाजवादी पार्टी अपनी 'मुस्लिम पार्टी' की छवि को मिटाने की कोशिश कर रही है। पार्टी के नेताओं का तर्क यह है कि हमें एक ऐसी पार्टी के रूप में देखा जाता है जिसे केवल यादव और मुस्लिमों का समर्थन हासिल है, इससे भाजपा की हिंदुत्व की एजेंडे को बल मिल रहा था और पार्टी चुनाव हार रही थी।
जानकार बताते हैं कि यूपी में करीब 20 फीसदी मुस्लिम आबादी है और राज्य की करीब 143 सीटों पर मुस्लिम वोट बैंक का प्रभाव है। अब तक सपा एम-वाई समीकरण यानी यादव और मुसलमान वोट बैंक सपा की जीत का आधार रहा है। लेकिन 2014 के बाद से भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे के आगे सपा का यह समीकरण गड़बड़ाया तो पार्टी को रणनीति बदलनी पड़ी।
ताज टेनरी पर नमाज अता करते मुस्लिम समाज के लोग (फाइल फोटो)
- फोटो :
अमर उजाला
राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आने लगा, मुस्लिम समर्थक पार्टी की छवि को दूर करने के लिए अखिलेश यादव ने कई हिंदू मंदिरों का दौरा कर लिया। मुस्लिम नेताओं के साथ मंच साझा न करने का भी एक सचेत प्रयास किया गया। पार्टी की रणनीति में हुए इस महत्वपूर्ण बदलाव की एक झलक तब देखने को मिली जब सपा के सबसे प्रभावशाली मुस्लिम नेता और नौ बार के विधायक रहे आजम खान को फरवरी 2020 में भाजपा सरकार ने गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन सपा की तरफ से विरोध के स्वर नहीं उठे। खान और उनके परिवार के खिलाफ सौ से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं।
क्या यह एक स्मार्ट रणनीति है? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अखिलेश यादव के पास हिंदू कार्ड खेलने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एक वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार का कहना है कि ‘वह दिन लद गए जब सपा ने लगन और खुले तौर पर मुसलमानों से प्यार किया था। अब मौजूदा समय में हिंदुत्व की राजनीति हो रही है और चाहते या न चाहते हुए भी सभी पार्टियों को इसका पालन करना होगा’।
हालांकि पार्टी के कुछ मुस्लिम नेताओं को इस बात की आशंका है इस तरह मुसलमानों से दूर जाने से सपा को मुस्लिम वोटों का नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। चूंकि ओवैसी भी मैदान में है, इसलिए हो सकता है मुस्लिम वोट उधर छिटक जाए। इसलिए पार्टी के कुछ मुस्लिम नेता ओवैसी को भी साथ लेकर चलने के पक्ष में है।
क्या यह एक स्मार्ट रणनीति है? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अखिलेश यादव के पास हिंदू कार्ड खेलने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। एक वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार का कहना है कि ‘वह दिन लद गए जब सपा ने लगन और खुले तौर पर मुसलमानों से प्यार किया था। अब मौजूदा समय में हिंदुत्व की राजनीति हो रही है और चाहते या न चाहते हुए भी सभी पार्टियों को इसका पालन करना होगा’।
हालांकि पार्टी के कुछ मुस्लिम नेताओं को इस बात की आशंका है इस तरह मुसलमानों से दूर जाने से सपा को मुस्लिम वोटों का नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। चूंकि ओवैसी भी मैदान में है, इसलिए हो सकता है मुस्लिम वोट उधर छिटक जाए। इसलिए पार्टी के कुछ मुस्लिम नेता ओवैसी को भी साथ लेकर चलने के पक्ष में है।
जनसभा को संबोधित करते असदुद्दीन ओवैसी
- फोटो :
amar ujala
क्या यदि ओवैसी 10 सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार हो जाए तो उन्हें गठबंधन में शामिल किया जा सकता है, इस बारे में पूछे जाने पर पार्टी के एक नेता ने कहा ‘कुछ नहीं कहा जा सकता। पार्टी नेतृत्व क्या सोच रही है, इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता’। लेकिन अभी अध्यक्ष जी (अखिलेश यादव) जो कर रहे हैं, अगर वह ऐसा नहीं करते हैं तो वह हिंदू वोट खो देंगे।"
भाजपा के हिंदूत्व के एजेंडे के आगे ओवैसी ने मुसलमानों के असली प्रतिनिधि होने के तौर पर अपनी पहचान बनाई है। इसी वजह से उनकी पार्टी चर्चा में भी आई है। पार्टी 2020 में बिहार के मुस्लिम बहुल सीमाचल क्षेत्र में पांच सीटें हासिल करने में सफल रही थी। हालांकि इस साल की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में पार्टी अपना खाता खोलने में विफल रही। एआईएमआईएम अब यूपी चुनाव में ताल ठोंक रही है।
ओवैसी ने 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। इसके लिए एआईएमआईएम पहले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली भागीदारी संकल्प मोर्चा गठबंधन का हिस्सा रही थी लेकिन अक्टूबर में एसबीएसपी ने समाजवादी पार्टी के साथ नया गठबंधन कर लिया। एसबीएसपी के गठबंधन से अलग होने का निर्णय विधानसभा चुनाव से पहले गैर-भाजपा दलों के गठबंधन को एक साथ जोड़ने के ओवैसी के प्रयासों के लिए एक झटका था। हैदराबाद के सांसद ने पहले संकेत दिया था कि उनकी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के साथ बातचीत कर रही है।
भाजपा के हिंदूत्व के एजेंडे के आगे ओवैसी ने मुसलमानों के असली प्रतिनिधि होने के तौर पर अपनी पहचान बनाई है। इसी वजह से उनकी पार्टी चर्चा में भी आई है। पार्टी 2020 में बिहार के मुस्लिम बहुल सीमाचल क्षेत्र में पांच सीटें हासिल करने में सफल रही थी। हालांकि इस साल की शुरुआत में पश्चिम बंगाल में पार्टी अपना खाता खोलने में विफल रही। एआईएमआईएम अब यूपी चुनाव में ताल ठोंक रही है।
ओवैसी ने 100 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। इसके लिए एआईएमआईएम पहले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली भागीदारी संकल्प मोर्चा गठबंधन का हिस्सा रही थी लेकिन अक्टूबर में एसबीएसपी ने समाजवादी पार्टी के साथ नया गठबंधन कर लिया। एसबीएसपी के गठबंधन से अलग होने का निर्णय विधानसभा चुनाव से पहले गैर-भाजपा दलों के गठबंधन को एक साथ जोड़ने के ओवैसी के प्रयासों के लिए एक झटका था। हैदराबाद के सांसद ने पहले संकेत दिया था कि उनकी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल यादव और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद के साथ बातचीत कर रही है।