मौत के बाद पति के शुक्राणु मांगे, एम्स ने किया मना
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क्या एक औरत का अपने पति की मौत के बाद उनके शुक्राणुओं पर अधिकार होता है? भारत के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, एम्स के डॉक्टर्स के सामने यही सवाल था जब एक औरत ने पोस्ट-मार्टम के वक्त अपने पति के शुक्राणु निकाले जाने का आग्रह किया।
एम्स में फोरेंसिक मेडिसिन के प्रमुख, डॉ. सुधीर गुप्ता ने बीबीसी को बताया कि वो महिला पति की मौत के बाद भी उनके बच्चे की मां बनना चाहती थी। पर वो ये बात नहीं मान पाए। उन्होंने बताया, “हमें मना करना पडा, क्योंकि बच्चे के कानूनी अधिकार, पिता की मर्जी और मां की जिम्मेदारी से जुड़े कई मसले हैं जिनके बार में गाइडलाइन्स होनी जरूरी है, मां अगर बाद में बच्चे को रखना ना चाहे तो बहुत दिक्कतें पैदा हो सकती हैं।”
मृत्यु के बाद भी मर्द के अंडकोष में शुक्राणु कुछ समय तक जीवित रहते हैं, पर उनके निकाले जाने के बारे में भारत में फिलहाल कोई नीति-निर्देश नहीं हैं। आईवीएफ और सरोगेसी जैसी तकनीक के लिए साल 2010 में बनाई गईं ‘असिसिटिड रीप्रोडक्टिव टेकनॉलॉजीज गाइडलाइन्स’ में ‘स्पर्म डोनेशन’ का प्रावधान है। इसके मुताबिक अगर एक मर्द अपने होशोहवास में अपने शुक्राणु दान करता है तो उनका इस्तेमाल उसकी मौत के बाद भी किया जा सकता है।
यह ऐसा पहला मामला नहीं
डॉ. सुधीर गुप्ता के मुताबिक ये अकेला मामला नहीं था और उनके पास पहले भी ऐसे आवेदन आए हैं। उनके मुताबिक, “जब अचानक दुर्घटना में पति की मौत हो जाए और नव-विवाहित दंपत्ति की कोई संतान ना हो तो पोस्ट मार्टम के वक्त ऐसी दरख्वास्त की गई हैं।”
जर्नल ऑफ रिप्रोडक्टिव साइंसिस में इस सवाल पर हाल ही में किए शोध में पाया गया कि भारत समेत दक्षिण एशिया में नेपाल, भूटान और बांग्लादेश में इस पर कोई दिशा-निर्देश नहीं हैं जबकि पाकिस्तान में इस पर पाबंदी है।
कानून की नजर में ‘असिसिटिड रीप्रोडक्टिव टेकनॉलॉजी’ की मदद से पैदा हुए बच्चे को दंपत्ति का वारिस माना जाता है और उसका उनकी जायदाद पर हक है। लेकिन मृत्यु के बाद अगर शुक्राणु निकालकर बच्चा पैदा किया जाए तो उसे वारिस माना जाएगा या नहीं, इसपर कोई दिशा-निर्देश नहीं है। डॉ. सुधीर गुप्ता के मुताबिक कोई गाइडलाइन्स बनाने से पहले कानूनी दर्जे के अलावा, ऐसे पैदा किए बच्चे को समाज में वैध दर्जा मिलने के मुद्दे के बारे में भी सोचना जरूरी है।
Published By Rahul Sankrityayan