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चीफ जस्टिस के बाद अब जस्टिस इंदु ने उठाया मध्यस्थता का मुद्दा
Sun, 16 Feb 2020 05:53 AM IST
Mohit Mudgal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Mohit Mudgal
Updated Sun, 16 Feb 2020 05:53 AM IST
सार
अदालतों के ऊपर बढ़ते मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए एक सप्ताह के अंदर दूसरी बाद सुप्रीम कोर्ट के किसी जज ने मध्यस्थता प्रक्रिया में सुधार का मुद्दा उठाया है। जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने शनिवार को कहा कि भारत को तदर्थ के बजाय संस्थागत मध्यस्थता तंत्र पर ध्यान देने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने मध्यस्थता के लिए पेशेवर व प्रशिक्षित मध्यस्थकारों की नियुक्ति की भी सिफारिश की।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : social media
विस्तार
जस्टिस मल्होत्रा से पहले 8 फरवरी को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) एसए बोबडे ने भी संस्थागत मध्यस्थता की वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि अदालतों में मुकदमा आने से पहले अनिवार्य मध्यस्थता के जरिये उसे निपटाने का प्रयास किए जाने के लिए कानून बनाने की आवश्यकता है।
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जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने नानी पालकीवाला मध्यस्थता केंद्र (एनपीएसी) की तरफ से आयोजित 12वें वार्षिक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता सम्मेलन में मध्यस्थता प्रक्रिया को दुरुस्त करने की तत्काल आवश्यकता है, ताकि न्यायिक समीक्षा के ढांचे का विस्तार किए बिना आंतरिक अपील के अधिकार को सुनिश्चित किया जा सके। अपने संबोधन को 1996 के संबंधित अधिनियम के दौर पर केंद्रित करते हुए जस्टिस मल्होत्रा ने इसके तहत दिए गए निर्णयों, उनके दायरे, सभी विभिन्न पहलुओं की चर्चा की।
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उन्होंने कहा कि भारत के लिए तदर्थ मध्यस्थता से संस्थागत मध्यस्थता की तरफ रुख करने का समय आ गया है। करीब 250 वकीलों, विभिन्न कंपनियों के सीईओ, विद्वानों और छात्रों के सामनेउन्होेंने पेशेवर व प्रशिक्षित मध्यस्थकारों की नियुक्ति को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा, यदि मध्यस्थकार को विषय की वाकई जानकारी होगी तो उसके आदेश की न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता बेहद कम होगी।
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क्यों की जा रही मध्यस्थता की वकालत
- अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा आदि में पहले से है मध्यस्थता का प्रावधान
- इन देशों में मुकदमेबाजी से पहले मध्यस्थ के साथ बैठते हैं दोनों पक्ष
- तीन करोड़ मुकदमे लंबित हैं देश की अदालतों में
- एक पीढ़ी में दाखिल मुकदमे को दूसरी पीढ़ी लड़ती है
- मुकदमों के बोझ से न्यायिक प्रक्रिया बेहद सुस्त हो गई है
- समय-पैसे की बरबादी से वादी की हिम्मत टूट जाती है
- इसके बावजूद बढ़ती जा रही है मुकदमों की संख्या