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पुलवामा आतंकी हमले से पैदा हुई इस खीझ का क्या करे सरकार?

Fri, 15 Feb 2019 02:18 PM IST
शशिधर पाठक शशिधर पाठक, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: शशिधर पाठक Updated Fri, 15 Feb 2019 02:18 PM IST
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After Pulwama terror Attack Modi Government to do this irritability arising
pulwama terror attack

जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन ऑल आऊट। 8 जुलाई 2016 को आतंकी बुरहान वानी को मुठभेड़ में मार गिराने के बाद पैदा हुई स्थिति से सुरक्षा बलों ने जमकर लोहा लिया। 2016 में उड़ी में सैन्य शिविर पर हमला, इसके बाद सेना की 15वीं कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल सतीश दुआ की निगरानी में सर्जिकल स्ट्राइक। इसके बाद ऑपरेशन ऑल आऊट के तहत लश्करे तोइबा, जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के टॉप कमांडरों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया। सबकुछ ठीक रहा, लेकिन सुरक्षा बल ही अपनी सतर्कता भूल गए। केंद्र सरकार को पुलवामा में आत्मघाती आतंकी हमले के बाद पैदा हुई यह खीझ खाए जा रही है। 

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पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह मानते हैं कि कहीं न कहीं लापरवाही हुई है। जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने सुरक्षा में हुई चूक को साफ स्वीकार कर लिया है। मलिक का मानना है कि कहीं न कहीं चूक हुई तभी इतना बड़ा हमला हो पाया। जनरल विक्रम सिंह से लेकर सेना के टॉप कमांडरों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में 70-72 गाडियां छोड़िए, 100 गाड़ियों से अधिक के काफिले में सश बलों की मूवमेंट होती रही है। यह हमारे देश की सीमा है, हमारी सड़क है, इस पर हमारे वाहन और हमारे सैनिक, लोग नहीं चलेंगे तो कौन चलेगा? जनरल सिंह के अनुसार आतंकवाद से डर गए तो क्या बचा? लेकिन जब मूवमेंट होती है तो सुरक्षा के पहलू को ध्यान में रखा जाता है। खुफिया सूचना, मानव इंटेलीजेंस, ऑपरेशनल तैयारी समेत सभी पहलुओं में उच्च स्तर की सतर्कता बरती जाती है। 
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सेना मुख्यालय के एक ब्रिगेडियर का कहना है कि हम आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र में काम कर रहे हैं, वहां तो हर पल खतरा है। हमारी सावधानी ही खतरे से बचने का उपाय है। लेफ्टिनेट जनरल(पूर्व) सतीश दुआ भी सुरक्षा बलों से हुई चूक को खारिज नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि जनरल सतीश दुआ का कहना है कि आरओपी होती है, लेकिन आतंकी बंदूक की गोली को चीरकर उसके भीतर घुसने आ रहा है। वह मौत को गले लगाने आ रहा है तो वह कुछ करके जाएगा। लेफ्टिनेंट जनरल(रिटा.) बलबीर सिंह संधू का कहना है कि ऐसे हमले सतर्कता, स्टैंडर्ड आपरेशन प्रोसीजर का पालन करके ही रोके जा सकते हैं। 
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इसे क्यों भूल गए हमारे सुरक्षा बल?

जैश-ए- मोहम्मद का सरगना मसूद अजहर का भतीजा उस्मान हैदर अक्टूबर 2018 में सुरक्षा बलों द्वारा मुठभेड़ में मारा गया। इससे पहले नवंबर 2017 में मसूद अजहर का भांजा भी अबू तल्हा रशीद भी मुठभेड़ में मार दिया गया था। पिछले छह महीने से सेना और अर्धसैनिक बल ऑपरेशन ऑल आऊट के तहत जम्मू-कश्मीर में आतंकियों की कमर तोड़ देने का दावा कर रही है।

इतिहास की तारीखों पर ध्यान दें तो 9 फरवरी 2001 को ही संसद भवन पर हमले के दोषी अफजल गुरु को दिल्ली की तिहाड़ जेल में सजा सुनाई गई थी। 2013 के बाद से हर साल 13 फरवरी के करीब आने पर सुरक्षा बल आतंकी हमले के बाबत सतर्कता बरतते आए हैं। 

इससे पहले 26 नवंबर 2008 को मुबई में आतंकी हमला हुआ था। 13 दिसंबर 2003 को जैश के आतंकियों मे संसद भवन परिसर को गोलियों की तड़तड़ाहट से गुंजाया था। जनवरी 2013 में लांस नायक हेमराज और उसके साथी के साथ आतंकियों ने बर्बर कार्रवाई थी। दिसंबर 2015 में ही पठानकोट एयरफोस स्टेशन पर आतंकी हमला हुआ था। एक तरह से भारी बर्फबारी के दौरान जम्मू-कश्मीर और देश में आतंकी वारदात की संभावना बढ़ जाती है।

हर साल खुफिया एजेंसियां इसके बाबत चेतावनी देती हैं। गृह मंत्रालय के आंकडों के अनुसार 2015 में आतंकियों ने 208 बार, 2016 में 322 बार और 2017 में 342 सुरक्षा बलों पर हमला किया। इसके जवाब में सुरक्षा बलों ने 2016 में 150 तो 2017 में 213 आतंकियों को मार गिराया। 2018 में 24 दिसंबर तक सुरक्षा बलों ने 257 आतंकियों का सफाया किया था। 

सरकार की खीझ......कहां हुई सुरक्षा में चूक?

हर साल की तरह इस बार भी अक्तूबर, नवंबर से खुफिया तंत्र के कान खड़े हैं। सूत्र बताते हैं कि खुफिया चेतावनी का स्तर कहीं से कम नहीं रहा है। जैश-ए-मोहम्मद, लश्करे तोइबा जैसे संगठनों के शीर्ष कमांडरों को भी देश में 2019 में आम चुनाव होने की जानकारी है। सेना और सीमा सुरक्षा बल इसे केंद्र में रखकर उच्च स्तर पर सतर्कता बरत रहे हैं। मीडिया में भी लगातार इस साल की शुरुआत से अब्दुल रशीद गाजी के सीमा पार करके जम्मू-कश्मीर आने की सूचना है। 

रिपोर्ट के अनुसार गाजी अपने दो साथियों के साथ भारतीय सीमा में घुस आया है। गाजी के बारे में बताया जा रहा है कि वह अफगानिस्तान में भी ट्रेनिंग देता था और इम्प्रूव्ड इक्सप्लोसिव डिवाइस का मास्टर है। वैसे भी पुलवामा में जहां आत्मघाती हमला हुआ है, श्रीनगर से कोई 20 किमी दूर है। ऐसे में सीआरपीएफ के इतने बड़े काफिले के मूंवमेंट में पर्याप्त सावधानी क्यों नहीं बरती गई? काफिले के बीच में एक एसयूवी का आना और सीआरपीएफ की बस से टकराना, कैसे संभव हुआ। क्या यह सतर्कता में बड़ी चूक नहीं है? 

अहम है सीसीएस की बैठक

प्रधानमंत्री हमले के वक्त उत्तराखंड के देहरादून जाने के लिए निकल पड़े थे। हमले की जानकारी उन्हें रास्ते में ही मिली। तब वह दिल्ली से बाहर थे। मौसम खराब होने के कारण प्रधानमंत्री को बृहस्पतिवार को सड़क के रास्ते से बरेली के त्रिशूल एयरफोर्स स्टेशन पर आना पड़ा और इसके बाद देर रात 11 बजे के बाद वह दिल्ली लौटे। इस दौरान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल उन्हें जानकारियों से अवगत कराते रहे। 

समझा जा रहा है कि देर रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुलवामा आत्मघाती हमले पर विस्तार पर से जानकारी ली। प्रधानमंत्री के दिल्ली से बाहर होने और देर रात लौट पाने की स्थिति के कारण ही सुरक्षा मामलों की कैबिनेट की बैठक शुक्रवार को सुबह बुलाई गई है। इस बैठक में हिस्सा लेने के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह, सीआरपीएफ के डीजी राजीव भटनागर के अलावा सुरक्षा, खुफिया व्यवस्था से जुड़े अफसर जम्मू-कश्मीर पुलवामा दौरे पर जाएंगे। माना जा रहा है कि इस दौरान सीसीएस की बैठक में कोई अहम निर्णय लिया जा सकता है।

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