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नीलगंज में हुई थी जलियांवाला जैसी घटनाः अंग्रेजों ने मारे थे आजाद हिंद फौज के 2300 सैनिक

Mon, 12 Aug 2019 07:23 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला Published by: जितेंद्र भारद्वाज Updated Mon, 12 Aug 2019 07:23 PM IST
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After jallianwala bagh Massacre, british army killed the 2300 azad hind fauj soldiers in Nilgunj
Jute Reserch Centre Entrence - फोटो : AmarUjala

जलियांवाला बाग में जिस क्रूरता से अंग्रेजी हुकुमत ने निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलाकर 1,000 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, उसके बाद वह भीषण नरसंहार ब्रिटिश भारत के इतिहास का काला धब्बा बन गया। लेकिन ऐसा नहीं है कि अंग्रेजों की क्रूरता केवल जलियांवाला बाग तक ही सीमित रही, बल्कि पश्चिम बंगाल का नीलगंज इलाका भी अंग्रेजों के अत्याचारों का गवाह बना, जहां अंग्रेजों ने बड़ी बेरहमी से आजाद हिंद फौज के हजारों सैनिकों का कत्ल कर दिया था। लेकिन यह घटना लोगों के जहन में नहीं बल्कि इतिहास के पन्नों में ही कैद हो कर रह गई।

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जलियांवाला बाग में महिलाएं, बच्चे बने थे निशाना

पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में नीलगंज इलाका आजादी के दिनों की एक बड़ी घटना को अपने में संजोए हुए है। यह घटना बिल्कुल जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसी थी। फर्क केवल इतना था कि जलियांवाला बाग में महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और युवाओं को मौत के घाट उतारा गया, जबकि नीलगंज के आर्मी कैंप में आजाद हिंद फौज के सैनिकों को बेदर्दी से कत्ल कर दिया गया।

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ब्रिटिश सरकार ने भी मानी थी हत्याकांड की बात

After jallianwala bagh Massacre, british army killed the 2300 azad hind fauj soldiers in Nilgunj
1945 में ब्रिटिश आर्मी द्वारा कराई गई अदालती जाँच का सबूत यह पत्र - फोटो : National Archives of India

25 सितंबर, 1945 की रात ब्रिटिश आर्मी ने आजाद हिंद फौज के तकरीबन 2,300 सैनिकों पर मशीनगन चलाकर उन्हें मार डाला था। ब्रिटिश आर्मी की पूर्वी कमान के मेजर जनरल 6-ओएमडी ने इस हत्याकांड की जांच की था। उन्होंने पुष्टि करते हुए लिखा कि हत्याकांड तो हुआ है, लेकिन शव कहां हैं। इंडियन नेशनल आर्मी के कर्नल जीएस ढिल्लन ने अपने एक पत्र में इस हत्याकांड का जिक्र करते हुए लिखा था कि उस रात 2,300 सैनिकों को मार डाला गया था। अब वहां पर केंद्रीय जूट संस्थान बना है। स्थानीय लोग 25 सितंबर को जब वहां देने श्रद्धांजलि देने आते हैं, तो उन्हें संस्थान के भीतर नहीं जाने दिया जाता। मजबूरन, नीलगंज के लोग संस्थान के गेट के बाहर ही अपने शहीदों को श्रद्धांजलि देकर लौट जाते हैं।

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नौआई नदी में फेंक दिए थे शव

उत्तर 24 परगना स्थित नीलगंज (बैरकपुर) में नेताजी सुभाष चंद्र मिशन के सचिव सधन बोस का कहना है, आजादी से पहले यहां पर साहेब बागान था और आर्मी कैंप के साथ यहां ब्रिटिश आर्मी के अफसर भी रहते थे। सितंबर 1945 में यहां बड़ी संख्या में युद्धबंदी लाए गए। ये सभी आजाद हिंद फौज के सदस्य थे, जिन्हें इंफाल, तत्कालीन बर्मा, नागालैंड और कई दूसरी जगहों से पकड़ कर लाया गया था। 25 सितंबर की उस काली रात को यहां जलियांवाला बाग से कई गुना बड़े हत्याकांड को अंजाम दिया गया। आर्मी कैंप से लेकर नौआई नदी तक खून ही खून बिखरा पड़ा था। कहा जाता है कि ब्रिटिश आर्मी ने सैनिकों के अधिकांश शवों को इसी नदी में फेंक दिया था।

जंगल में भी फेंकी थी लाशें

बनारस की सुभाष संस्था के महासचिव तमल सान्याल और कोलकाता यूनिवर्सिटी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर शोध कर चुके डॉ. जयंत चौधरी बताते हैं कि आजाद हिंद फौज के सैनिकों के शव ट्रकों में भरकर नदी पर लाए गए। अनेक शव आसपास के जंगलों में पेड़ों पर फेंक दिए गए। उस वक्त वहां पर ताड़ के सात पेड़ खड़े थे। कई शव इन पेड़ों पर अटके हुए थे। इसके अलावा नेशनल आर्काइव से जो दस्तावेज हासिल किए गए हैं, उनमें भी इस हत्याकांड का प्रमाण मिल जाता है।

ब्रिटिश सरकार ने कराई थी अदालती जांच

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कर्नल जीएस ढिल्लन द्वारा लिखित डायरी का वो पन्ना, जिसमें उस हत्याकांड का ज़िक्र है। - फोटो : AmarUjala

आजाद हिंद फौज और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सहयोगी रहे कर्नल जीएस ढिल्लन ने भी अपने एक पत्र में नीलगंज हत्याकांड का जिक्र किया था। गौरतलब है कि कर्नल ढिल्लन पर लालकिले में ट्रायल भी चला था। दस्तावेजों में लिखा है कि ब्रिटिश सरकार ने इस हत्याकांड की अदालती जांच कराई थी। जिसमें हत्याकांड को स्वीकार किया गया, लेकिन शवों को लेकर ज्यादा कुछ नहीं कहा गया। हालांकि दस्तावेजों में मेजर नांबियार और कैप्टन मेनन को सस्पेंड करने की जिक्र किया गया है।

ब्रिटिश आर्मी ने दी गोली मारने की अनुमति

तमल सान्याल का कहना है कि उनके पास 22 सितंबर 1945 को जारी ब्रिटिश आर्मी का वह सर्कुलर भी है, जिसमें ब्रिटिश सैनिकों और यहां तक कि संतरी को भी यह अधिकार दिया गया था कि अगर कोई युद्धबंदी दुस्साहस करता है, तो उसपर बल प्रयोग किया जाए, यहां तक कि गोली चलाने का भी अधिकार दिया गया, जिसके तीन बाद ही यह हत्याकांड हो गया।

पीएम मोदी से की श्रद्धांजलि समारोह के आयोजन की मांग

डॉ. जयंत चौधरी, तमल सान्याल और सधन बोस का कहना है कि 25 सितंबर को जब स्थानीय लोग अपने शहीदों को श्रद्धांजलि देने जाते हैं, तो उन्हें जूट संस्थान के मुख्य गेट पर ही रोक दिया जाता है। आर्काइव के दस्तावेजों में लिखा है कि 1951 में यहां जनता का प्रवेश रोक दिया गया था, जिसके बाद यहां जूट संस्थान खुल गया। इस बाबत पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने राज्य सरकार और दूसरी संस्थाओं को एक पत्र भी लिखा था। लेकिन उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा नेता राम माधव को पत्र लिख कर सरकार से मांग की है कि भारत सरकार नीलगंज में हुए हत्याकांड को मान्यता दे, साथ ही हर साल वहां  श्रद्धांजलि समारोह का आयोजन किया जाए।

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