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राहत फौरी मंजिल अभी बहुत दूर, पाक सेना के संबंध में अनुमान लगाना बेहद मुश्किल

Fri, 19 May 2017 01:34 AM IST
amarujala.com-Presented by- अभिषेक मिश्रा
amarujala.com-Presented by- अभिषेक मिश्रा Updated Fri, 19 May 2017 01:34 AM IST
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after icj stay on jadhav case, difficult to guess pak next step
कुलभूषण जाधव (फाइल फोटो)

इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) ने कुलभूषण यादव की फांसी पर रोक लगाने के साथ-साथ उसकी गिरफ्तारी पर संदेह जताते हुए भारत की राजनयिक पहुंच देने की मांग का समर्थन किया है। वियना संधि का स्पष्ट उल्लंघन और सैन्य अदालत के जरिए फांसी की सजा सुनाए जाने के कारण इस तरह के ही फैसले की उम्मीद थी। मगर लाख टके का सवाल यह है कि क्या इस मामले में भारत को मंजिल मिल गई है? पाकिस्तान ने तत्काल इस फैसले को न मानने की घोषणा कर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं।

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कूटनीतिक दृष्टि से देखें तो आईसीजे के फैसले से पाकिस्तान कूटनीतिक दबाव में है। उसने भले ही आईसीजे के फैसले को न मानने की बात कही है, मगर उसे भी पता है कि जाधव को फांसी देने की राह अब इतनी भी आसान नहीं है। आईसीजे के फैसले को नहीं मानने के लिए पाकिस्तान अमेरिका का उदाहरण दे सकता है जिसने हर बार अंतर्राष्ट्रीय अदालत के फैसले को धता बताई है। मगर इस मामले में पेंच यह है कि जहां अमेरिका ने एक बार भी आईसीजे के फैसले को नहीं माना है, वहीं पाकिस्तान को आईसीजे के फैसले को पूर्व में स्वीकार करना पड़ा है।

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कुलभूषण मामले में पाकिस्तान की कई कमजोर कड़ियां

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तकनीकि दृष्टि से देखें तो कुलभूषण मामले में पाकिस्तान की कई कमजोर कड़ी थी। सैन्य अदालत द्वारा फांसी की सजा देना, जाधव की गिरफ्तारी के संबंध में ठोस सबूत सामने नहीं लाने के अलावा उससे सबसे बड़ी चूक भारत की राजनयिक पहुंच की अपील को 16 बार ठुकराना रहा। चूंकि वियना संधि के किसी भी देश को अपने नागरिक को कानूनी सहायता देने का अधिकार है।

भारत और पाकिस्तान दोनों वियना संधि के दायरे में आते हैं। इसलिए जाधव को बिना कानूनी सहायता पहुंचाए फांसी की सजा देना उसकी सबसे कमजोर कड़ी बन गई। अब निश्चित रूप से इस मामले में दुनिया की निगाह होगी। जाहिर तौर पर इससे पाकिस्तान पर वैश्विक दबाव पड़ेगा। भारत अब इस मामले को संयुक्त राष्ट्र में भी मजबूती से उठा पाएगा।

फिलहाल इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पाकिस्तानी सेना है। चूंकि फैसला सैन्य अदालत का है, इसलिए यह दावे से नहीं कहा जा सकता कि उस पर कूटनीतिक दबाव का कोई असर होगा। जब पाकिस्तानी सेना अपने ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नहीं मानती तो अंतर्राष्ट्रीय अदालत के फैसला उस पर कितना असर डालेगा यह जानना समझना कठिन है।

फिर चूंकि आईजेसी के अलावा फिलहाल जाधव को इस फैसले को चुनौती देने का अधिकार है, ऐसे में यह मामला लंबा खिंचेगा और इस दौरान कुछ नए पेंच सामने आ सकते हैं। हां, यहां मैं इस मामले में टीवी चैनल की भूमिका पर अपनी बात रखना चाहूंगा। चैनल में जिस तरह से और जिस स्तर  की बहस चलाई जा रही है उससे यह मामला सुलझने के बदले और उलझेगा। टीवी मीडिया को इस मामले की कूटनीतिक महत्व समझते हुए इसे जीत या हार के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए।

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