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अमेरिका के बाद रेमडेसिविर दवा का भारत में भी होगा ट्रायल, डब्ल्यूएचओ करेगा सहयोग

Tue, 05 May 2020 05:42 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Tue, 05 May 2020 05:42 AM IST
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After America, Remdesivir drug clinical trial will be tried in india
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

अमेरिका के बाद भारत में जल्द ही रेमडेसिविर दवा का क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सहयोग से ये परीक्षण शुरू किए जाएंगे। स्वास्थ्य मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, सीएसआईआर और आईसीएमआर की टीमें इस पर काम कर रही हैं। डब्ल्यूएचओ से एक हजार रेमडेसिविर की शीशियां भारत को मिली हैं, जिनका इस्तेमाल कुछ राज्यों में होगा।

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हालांकि, यह दवा सिर्फ कोरोना के गंभीर मरीजों के लिए दी जाएगी। अमेरिका में हुए परीक्षणों के बाद वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि इस दवा के सेवन से गंभीर कोरोना ग्रस्त मरीजों में तेजी से सुधार आता है। हालांकि यह दवा इबोला वायरस के संक्रमण के लिए बनाई गई थी।
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अमेरिका में कोरोना के इलाज में इस्तेमाल होने जा रही एंटीवायरल दवा रेमेडिसिविर अगले सप्ताह से उपलब्ध रहेगी। अमेरिकी संस्था फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इमरजेंसी में इस दवा के प्रयोग को मंजूरी दी थी। दवा बनाने वाली कंपनी गीलीड साइंसेज के प्रबंधन का कहना है कि दवा का निर्माण कंपनी में तेजी से चल रहा है जिससे अधिक से अधिक लोगों को इसे मुहैया कराया जा सके। कंपनी के सीईओ डैन ओ ने बताया कि कंपनी कोरोना की वैक्सीन बनाने पर भी तेजी से काम कर रही है।

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After America, Remdesivir drug clinical trial will be tried in india
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

भारतीय मूल की वैज्ञानिक अरुणा सुब्रमणियम समेत अन्य ने कहा था कि कोरोना के इलाज में ये दवा प्रभावी है और कुछ मरीज तेजी से ठीक हुए हैं। एफडीए ने अपने आदेश में कहा है कि दवा का प्रयोग नसों के जरिए होगा। कोरोना संक्रमित मरीजों, संदिग्धों और गंभीर हालत में भर्ती बच्चों को ये दवा दी जाएगी। कंपनी ने बताया है कि अब तक दवा का करीब 15 लाख स्टॉक था जो सरकार को दे दिया गया है जिससे एक से दो लाख लोगों का इलाज संभव है।

  • इबोला के लिए बनी, उसी के मरीज पर ट्रायल में फेल

इबोला के इलाज के लिए रेमडेसिविर दवा तैयार की गई थी लेकिन इबोला के मरीजों पर किए गए परीक्षण में ये फेल हो गई थी। लेकिन कोविड-19 संक्रमण के मरीजों पर सफल परीक्षण से  दुनियाभर में कोरोना का इलाज कर रहे डॉक्टरों में एक उम्मीद जगी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शुरुआती दौर में रेमेडेसिविर के कोरोना मरीज़ों पर हुए परीक्षण को सीमित असर वाला ही बताया था। इसके अलावा यह दवा कुछ महंगी पड़ेगी। इसे बनाने वाली कंपनी गिलीड के मुताबिक, इसका एक डोज करीब 60 हजार रुपये का पड़ेेगा।

अन्य दवाओं के साथ ही प्लाज्मा थेरैपी का करें इस्तेमाल

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media

कोरोना को मात दे चुके मरीजों का प्लाज्मा थेरैपी की सटीकता की पुष्टि के लिए बड़े पैमाने पर अध्ययन की जरूरत है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) दिल्ली के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा, डॉक्टर अन्य दवाओं के साथ इसका प्रयोग रोगी की जान बचाने के लिए कर सकते हैं। आईसीएमआर कई संस्थानों को इसको लेकर शोध करने को कह चुका है।

हालांकि कुछ राज्य इस तकनीक को बेहतर मान रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि इसके जरिए कुछ गंभीर रोगियों को ठीक होने में मदद मिली है। गुलेरिया का कहना है कि अभी तक कोरोना को लेकर प्लाज्मा ट्रायल की संख्या बहुत कम है और कुछ ही मरीजों में इसका लाभ देखने को मिला है।

ये इलाज के लिए एक रणनीति हो सकती है। इससे रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ सकती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, संक्रमण से ठीक हो चुके मरीज का प्लाज्मा जब दूसरे मरीज को चढ़ता है तो उसमें मौजूद एंटीबॉडीज संक्रमण से लड़ने की ताकत पैदा करती हैं लेकिन ये कोई ऐसी चीज नहीं है जिससे कोई बड़ा बदलाव हो जाएगा। अभी तक के अध्ययनों में इसे कोई जादुई तरकीब नहीं कहा गया है। उल्लेखनीय है कि शुरुआती उत्साह के बाद प्लाज्मा थेरैपी के नतीजों को लेकर डॅक्टरों ने भी संदेह व्यक्त किए हैं। 

 200 से 300 लोगों पर अध्ययन की जरूरत

कोरोना के इलाज के लिए कई तरह के तरीकों पर शोध की जरूरत है। इलाज के किसी एक तरीके पर बंधा नहीं जा सकता है। बड़े पैमाने पर यानि 200 से 300 मरीजों को प्लाज्मा थैरेपी देनी होगी और फिर अध्ययन करना होगा तब असली हकीकत पता चलेगी। इसके बाद ही इसके प्रयोग पर रणनीति स्पष्ट हो सकेगी।

शक्तिशाली एंटीबॉडीज की जरूरत...

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI

सर गंगा राम अस्पताल के वाइस चेयरमैन और मेडिसिन विभाग के डॉ. अतुल कक्कड़ कहते हैं कि डोनेशन के लिए सही मरीज का चुनाव अहम होगा। संक्रमण का ज्यादा स्तर वाले में एंटीबॉडीज भी ज्यादा होंगी। उसकी एंटीबॉडीज वायरस से लड़ने के लिए सबसे शक्तिशाली होगी।

  • क्या सबका प्लाज्मा दिया जा सकता है?

कोरोना और प्लाज्मा थेरेपी के इलाज के बीच सबसे बड़ा मुद्दा ये है ‘सभी का प्लाज्मा दिया जा सकता है’ इससे पहले रक्त की जांच करनी होगी। क्या वो सुरक्षित है और उसमें पर्याप्त मात्रा में एंटीबॉडीज हैं जिसका लाभ दूसरे रोगी को मिल सकता है।

ऐसे में एंटीबॉडीज की जांच जरूरी है जो नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी पुणे में संभव है। एनआईवी की रिपोर्ट से ही पुष्ट होगा कि प्लाज्मा जो दिया जा रहा है उसमें पर्याप्त मात्रा में एंटीबॉडीज है।

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