फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   aakar patel analysis on liquor ban in bihar

'शराबबंदी से बिहार में सबको नुकसान होगा'

Sun, 10 Apr 2016 03:39 PM IST
आकार पटेल/वरिष्ठ विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आकार पटेल/वरिष्ठ विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए Updated Sun, 10 Apr 2016 03:39 PM IST
विज्ञापन
aakar patel analysis on liquor ban in bihar
भारत के एक अन्य राज्य बिहार ने सभी तरह की शराब पर पूर्ण पाबंदी लगा दी - फोटो : Thinkstock

जाने माने समाज विज्ञानी एमएन श्रीनिवास ने कहा था कि शराबबंदी और गोहत्या पर रोक में समानता है। उनका मतलब था कि इन प्रतिबंधों के लिए चाहे जो भी दलील दी जाए, प्रतिबंध लगाने की इच्छा के मूल में ब्राह्मणवादी और सवर्णवादी संवेदना है। इसलिए इस बात पर अचरज नहीं होना चाहिए कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने इन दोनों मुद्दों पर- गोहत्या पर पाबंदी और शराब बंदी पर एक ही दिन यानी 24 नवंबर, 1948 को बहस की थी। इसका ज़िक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि भारत के एक अन्य राज्य बिहार ने सभी तरह की शराब पर पूर्ण पाबंदी लगा दी है। केरल भी उसी रास्ते पर बढ़ रहा है, गुजरात और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में पहले से ही शराबबंदी है। बिहार में नीतीश कुमार का शासन है। उनका दावा है कि वे विचारों से लोहियावादी हैं, राममनोहर लोहिया के विचारों से प्रेरित।

विज्ञापन


http://ichef-1.bbci.co.uk/news/ws/660/amz/worldservice/live/assets/images/2016/03/31/160331132201_bihar_liquor_prohibition_awareness_campaign_nitish_624x351_biharpictures.com.jpg
विज्ञापन


मेरे पास लोहिया के विचारों वाला नौ खंडों वाला संग्रह मौजूद है, उसमें पांबदी के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं हैं, कहीं-कहीं पर रिफ़रेंस भर के लिए ज़िक्र भर है। गांधी जी की तरह लोहिया कभी शराब सेवन से होने वाली हानियों पर भाषण नहीं देते थे। खंड 6 में एक जगह लोहिया भारत के राष्ट्रपति की कलकत्ता क्लब का संरक्षक होने के चलते आलोचना करते हैं क्योंकि इस क्लब की मुख्य गतिविधि शराब पीना है।
विज्ञापन
विज्ञापन


हालांकि लोहिया जो बात कह रहे थे, वो पाखंड है, नैतिकता नहीं। उन्होंने कहा, “शराब के उपयोग के हिसाब से पिछड़े देश का राष्ट्रपति एक शराब पीने वाले क्लब का संरक्षक है, यह बताता है कि भारत में किस तरह से सवर्ण धोखाधड़ी की व्यवस्था को अपने पर और देश पर लादे हुए हैं।” इसके अलावा जहां भी उन्होंने पाबंदी की बात संक्षिप्त तौर पर ही की है, जो कांग्रेस नेताओं को भी पसंद आता रहा। शायद लोहिया ये जानते थे कि पाबंदी दुनिया भर में कहीं भी कामयाब नहीं हुई है। प्राथमिक तौर पर इसके तीन प्रभाव होते हैं- एक तो शराब से चलने वाली अर्थव्यवस्था अंडरग्राउंड हो जाती है, जिससे राजस्व का नुकसान होता है, कभी-कभार शराब पीने वाला भी अपराधी हो सकता है और इससे पुलिस का अपराधीकरण होता है। अमरीका में 1920 की पाबंदी के समय कई बड़े माफिया गैंगलीडर का जन्म होता है जिसमें अल कापोने भी शामिल है जिन्होंने शिकागो जैसे शहरों की पुलिस व्यवस्था को भ्रष्ट बना दिया। गुजरात में बीते कई दशकों से शराब पर पाबंदी लगी हुई है, लेकिन राज्य में शराब खुले तौर पर उपलब्ध है क्योंकि पुलिस ने हर स्तर पर समझौता किया हुआ है।

http://ichef.bbci.co.uk/news/ws/624/amz/worldservice/live/assets/images/2016/03/31/160331130801_bihar_liquor_ban_demonstration_640x360_manishshandilya_nocredit.jpg

राज्य में कई तरह के अपवादों के ज़रिए छूट भी दी गई है क्योंकि पूरी तरह से पाबंदी असंभव है। गुजराती मध्य वर्ग अपने साथ परमिट लेकर चलता है जिसके चलते स्वास्थ्य आधार पर उन्हें पीने की छूट जाती है। इसमें काफ़ी धोखाधड़ी भी होती है। पाकिस्तान में मुझे यह देखकर अचरज हुआ कि कराची में सरकारी लाइसेंस वाली शराब की दुकानें थी। आज की तारीख़ में भारतीय पर्यटकों के लिए क़ानूनी तौर पर पाकिस्तान में शराब पीना संभव है, लेकिन गुजरात में नहीं। यह अद्भुत है। अगर पाबंदी कामयाब नहीं होती है, तो फिर राज्य इसे लागू करने की कोशिश क्यों करते हैं? एक मान्यता ये है कि इससे बेहतर और नैतिक रूप से ज़िम्मेदार समाज बनता है। हालांकि ये झूठा तर्क है।  यूरोपीय देशों को देखिए, जहां कोई पाबंदी नहीं है, या फिर अरब वर्ल्ड को देखिए जहां काफ़ी पाबंदी है। ऐसे में बेहतर और नैतिक रूप से ज़िम्मेदार समाज कौन है? और इनमें से भारत किसके जैसा बनना चाहता है? 1948 में, गोमांस खाने में तर्क दो ख़ेमों में बंटा था। एक तो प्रोफ़ेसर शिब्बन लाल सक्सेना जैसे लोगों ने आर्थिक वजहों से गोहत्या पर पाबंदी लगाने का अनुरोध किया था। इसमें मवेशी को संपत्ति के तौर पर देखा जाता है, गाय दूध देती है और हल जोतने के लिए बैल भी।


http://ichef.bbci.co.uk/news/ws/624/amz/worldservice/live/assets/images/2016/01/15/160115114410_india_beef_640x360_reuters_nocredit.jpg

हालांकि मशीनीकरण और ट्रैक्टर के इस्तेमाल ने इन तर्कों को अप्रासंगिक बना दिया है। आज गिनती के ऐसे किसान होंगे जो बैलों से खेती करते होंगे। हालांकि उस वक़्त मध्य प्रांत के डॉ। रघु वीरा ने कहीं ज़्यादा सटीक तर्क दिए थे। यह हिंदू धर्म में भी लिखा गया है कि ब्रह्म हत्या और गोहत्या एक समान है। इसका मतलब यही है कि किसी पढ़े लिखे (ब्राह्मण) की हत्या करने और गोहत्या करने वाले की सज़ा एक समान होनी चाहिए। संविधान सभा की बहसों के दौरान भी हिंदुत्ववादियों ने पाबंदी के मुद्दे को हिंदुत्ववादियों ने जीवित रखा। बांबे के बीजी खेर ने कहा था, “धर्मशास्त्रों के मुताबिक़ शराब पीना पांच भीषण पापों में शामिल है।” धर्मशास्त्रों के मुताबिक़ तो पटेलों को पढ़ने और लिखने पर भी पाबंदी है तो क्या हम उसे स्वीकार करते हैं? हम भाग्यशाली रहे कि इन तर्कों के बावजूद हमें एक बेहतर संविधान मिला।

http://ichef.bbci.co.uk/news/ws/624/amz/worldservice/live/assets/images/2016/01/08/160108134246_alcohol_640x360_pa_nocredit.jpg
दो शानदार वक्ताओं ने पाबंदी का विरोध किया था। कोल्हापुर के बीएच खारडेकर ने अपने पहले संबोधन में कहा था, “एक तर्क ये दिया जा रहा है कि सभी समुदाय ऐसा चाहते हैं। इस सूची में पारसी और ईसाइयों को भी शामिल किया गया है। महाशय, मैं पारसी और ईसाइयों को थोड़ा बहुत जानता हूं और मानता हूं कि वे इस पाबंदी के पक्ष में तो नहीं होंगे।” बिहार के जयपाल सिंह ने भी पाबंदी का विरोध किया था। उन्होंने आदिवासी समुदाय का पक्ष लिया था जो परंपरागत तौर पर शराब बनाते और उसका इस्तेमाल करते रहे हैं। उन्होंने कई और चीज़ें भी कही थीं, जैसे, “मैं ये कहना चाहता हूं कि हम इस देश के सबसे प्राचीन लोगों के धार्मिक अधिकारों में दखल दे रहे हैं।” यही बात शैव संप्रदाय के हिंदुओं पर भी लागू होती है, जो लोग गांजे का इस्तेमाल भांग के तौर पर करते हैं। मतलब यह समुदाय अपने सांस्कृतिक व्यवहार के चलते अपराधियों में शामिल हो सकता है।

बिहार में शराबबंदी कामयाब नहीं होगी, क्योंकि यह गुजरात में भी नाकाम रही है। यह क़ानून के तौर पर कायम रहेगी, लेकिन पीने वाले क़ानून के दायरे में रास्ता निकाल लेंगे। पुलिस का अपराधीकरण हो जाएगा और राज्य को राजस्व का नुकसान उठाना होगा। हर किसी का नुक़सान होगा लेकिन लोहियावादी मानेंगे कि उन्होंने सही चीज़ के लिए कोशिश की है।
(लेखक के निजी विचार हैं।)

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed