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Israel-Iran Ceasefire: ऐसा युद्ध जिसमें सब जीते, ईरान में जीत का जश्न तो इस्राइल-अमेरिका की इच्छा भी पूरी

Tue, 24 Jun 2025 01:48 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Tue, 24 Jun 2025 01:48 PM IST
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A war in which everyone won, Iran celebrated victory and Israel-America's wish was also fulfilled
इस्राइल-ईरान तनाव - फोटो : PTI

इस्राइल ने जब 13 जून की रात को अचानक ईरान पर हमला बोल दिया था, माना जा रहा था कि दुनिया फिर से एक नए संकट में घिर गई है। यदि अमेरिका, रूस, मध्य पूर्व और चीन जैसे देश इस युद्ध में कूदते तो यह तीसरे विश्व युद्ध की तरफ भी जा सकता था। यह युद्ध अनेक देशों की अर्थव्यवस्थाओं के तबाह होने का कारण भी बन सकता था।

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जिस तरह यह युद्ध अचानक शुरू हुआ था, उसी तरह अचानक समाप्त भी हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इसकी जानकारी दी कि दोनों देश सीजफायर पर सहमत हो गए हैं। इस युद्ध में हुए भारी जान-माल के नुकसान के बाद भी इसमें शामिल तीनों ही देश अपने को जीता हुआ घोषित कर रहे हैं, वे अपनी जनता और दुनिया के सामने यही दिखाना चाहते हैं।
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इस युद्ध में एक हजार से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। लाखों करोड़ रुपये के हथियार, मिसाइलें और बम-बारूद खर्च किए गए हैं। इन हमलों के कारण ईरान और इस्राइल में जितनी तबाही हुई है, उसको ठीक करने में दोनों देशों को भारी पैसा और समय लगने वाला है। यह नुकसान कितना हुआ है, इसका आकलन संभवतः कुछ समय के बाद ही सामने आ पाएगा। लेकिन हमलों के ये निशान लंबे समय तक दोनों देशों को कष्ट देने वाले हैं। 
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क्या लक्ष्य हासिल हुआ?
इस युद्ध की शुरुआत में ही ईरान पर हमले के बाद इस्राइल ने बता दिया था कि इन हमलों का उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करना था। हमले के बाद इस्राइल ने बाकायदा इसकी घोषणा की कि वह अपने लक्ष्य में कामयाब हुआ है और उसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भारी चोट पहुंचाई है। उसने ईरान के टॉप परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या कर भी यह दावा किया था कि अब आने वाले कुछ वर्षों तक ईरान परमाणु कार्यक्रम आगे बढ़ाने की स्थिति में नहीं होगा। अमेरिकी बी-2 बॉम्बर से हुए अमेरिकी हमलों के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने भी यही दावा किया था। 

इस्राइल दावा कर रहा है कि उसने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया है और यह उसकी जीत है। अमेरिका भी पिछले दशक से इसी लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रहा था कि वह ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु शक्ति संपन्न होने से रोके। यदि इस्राइली-अमेरिकी हमलों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को चोट पहुंचाने में इतनी सफलता मिल चुकी है तो निश्चय ही यह इस्राइल और अमेरिका के लिए जीत है। 



भारत-पाकिस्तान की तरह इस्राइल-ईरान के बीच हुए सीजफायर की घोषणा भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के माध्यम से ही दुनिया को पता चली। ट्रंप ने स्पष्ट किया है कि दोनों देशों के बीच यह समझौता हुआ है, लेकिन ट्रंप के द्वारा सबसे पहले घोषणा होने से यह संकेत मिलता ही है कि इस सीजफायर में  उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रही है। यानी अमेरिका और ट्रंप कहीं न कहीं अपना महत्व स्थापित करने में सफल रहे हैं। इसे अमेरिकी दृष्टिकोण से बढ़त कही जा सकती है। 

दावे पर संदेह क्यों?
हालांकि, रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि इस्राइल-अमेरिका के इस दावे को अभी पुख्ता नहीं कहा जा सकता। ब्रिगेडियर डीएस त्रिपाठी (रिटायर्ड) ने अमर उजाला को बताया कि यह दावा एक तरफा ही कहा जा सकता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी ने अभी तक इस तरह की कोई पुष्टि नहीं की है कि ईरान के परमाणु संयंत्रों के आसपास इस तरह का कोई परमाणु विकिरण दर्ज किया गया है। 

इसके करीब एक वर्ष पहले ही एमआई ने यह रिपोर्ट दी थी कि ईरान तीन महीने के अंदर ही परमाणु हथियार बनाने में सक्षम है। वह यूरेनियम को 90 प्रतिशत से अधिक संवर्धित करने की क्षमता हासिल कर चुका है। ऐसे में अभी यह नहीं कहा जा सकता कि इन हमलों में ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह नष्ट किया जा चुका है। 

यह दावा स्वयं ईरान के दावे से भी पुष्ट होता है। ईरान ने यह घोषणा कर दुनिया को चौंका दिया था कि उसे इस्राइल-अमेरिका से हमले की आशंका थी और इसी कारण उसने अपनी परमाणु तैयारियों को अलग जगह पर स्थानांतरित कर दिया था। आज की स्थिति में ईरान का दावा ज्यादा सटीक हो सकता है। 


ईरान भी जीता
अमेरिका दशकों से यह इच्छा रखता रहा है कि ईरान में सत्ता परिवर्तन हो। वह अली खामेनेई की जगह किसी दूसरे के हाथ में ईरान की बागडोर देखने के लिए लगातार अभियान चलाता रहा है। ईरान पर हमले के बाद भी इस्राइल ने ईरान की जनता से यही अपील किया था कि वह इस सत्ता को उखाड़ फेंकें और एक नई शुरुआत करें। लेकिन अब जब कि युद्ध समाप्ति की घोषणा हो चुकी है, खामेनेई अपने पद पर डटे हुए हैं। ईरान दावा कर सकता है कि उसने अमेरिकी मंसूबों को असफल कर दिया है।

ब्रिगेडियर डीएस त्रिपाठी (रिटायर्ड) ने कहा कि ईरान ने अमेरिकी बेसों पर हमले कर अपनी जनता को जीत जैसा जश्न मनाने का अवसर दे दिया है। तेहरान की सड़कों पर जीत का जश्न मनाया जा रहा है। इससे यह बात तो साबित होती ही है कि ईरान का एक बड़ा वर्ग अभी भी अली खामेनेई के साथ खड़ी है। ऐसे में ईरान के पास इस्राइली-अमेरिकी इरादों के सामने घुटने न टेकने और अपनी संप्रभुता बनाए रखने को लेकर जीत का जश्न मनाने का अवसर है। यानी इस युद्ध में ईरान भी अपने उद्देश्य में सफल रहा है।   

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