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अमर उजाला विशेष: जानिये जीबी रोड पर संघर्ष की एक अनूठी कहानी

Fri, 12 Oct 2018 07:05 PM IST
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली  Updated Fri, 12 Oct 2018 07:05 PM IST
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A unique story of struggle Of GB Road Sex workers

दिल्ली का रेड लाइट एरिया कहा जाने वाले जीबी रोड का नाम सामने आते ही हमारी सोच इस दिशा में जाने लगती है कि वहां पर कोठे हैं, वेश्यावृति में संलिप्त महिलाएं हैं, गंदा है पर धंधा है, आदि। यहां इससे ऊपर भी बहुत कुछ है। 

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सेक्स वर्कर का अपने बच्चों के लिए एक अनूठा संघर्ष जो देश-दुनिया की नजर में कम ही आता है। धंधे में रहते हुए ये महिलाएं अपने बच्चों को डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, वकालत और अध्यापक बनने की राह पर ले आई हैं। यह तो केवल एक पहलू है। 
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जीबी रोड के कोठों के बीच जर्जर हालत में चल रहे तीन-चार कमरों वाले एक स्कूल ने उनकी इस उड़ान को पंख लगाए हैं। जी हां, तस्वीर का दूसरा पहलू यही है। डॉक्टर-इंजीनियर बनने वाले बच्चों की नींव इसी स्कूल में पड़ती है। 
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ललिता.एस.ए पिछले 27 सालों से कोठों के बीच में एक स्कूल, क्रेच या डे-बोर्डिंग, जो भी कहें, संचालित कर रही हैं। एसपीआईडी-एसएमएस सेंटर (एनजीओ) की मदद से यह स्कूल चलता है। वे इस संस्था की उपाध्यक्ष भी हैं। उनका कहना है कि इस स्कूल में दो साल से लेकर 14 साल तक के बच्चे रहते हैं। अभी इनकी संख्या 70 है। शुरू से लेकर अब तक की बात करें तो करीब दो हजार बच्चे इस स्कूल से निकलकर आगे जा चुके हैं। कुछ बच्चे बैंक मैनेजर और होटल मैनेजर भी बने हैं। 

इस सेंटर पर रह कर जीवन की नींव मजबूत करने वालों में महाराष्ट्र के परविंद्र (बदला हुआ नाम), कर्नाटक में जैकब (बदला हुआ नाम) और आंधप्रदेश में एल. कुमार (काल्पनिक नाम) तो एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं। सुदीप्त (बदला हुआ नाम) अभी लॉ की पढ़ाई कर रहा है। 

इसी तरह पेरामेडिकल कोर्सेज में भी हमारे बच्चों ने दाखिला लिया है। स्कूल के रजिस्टर में मां का नाम ही ज्यादा दिखता है। इस बाबत स्कूल संचालिका का कहना है कि हम वेश्यावृति में संलिप्त किसी महिला से उसके जीवन के बारे में नहीं पूछते। वे जो कहती हैं, स्कूल के रजिस्टर में बच्चे के आगे वही नाम लिखा जाता है। पचास-साठ प्रतिशत महिलाएं अपने बच्चों को खुद का ही नाम देती हैं।
 

गंदा है, पर धंधा है...के बीच इन बच्चों की नींव मजबूत हुई है...कैसे 

A unique story of struggle Of GB Road Sex workers

जीबी रोड पर रहने वाली सेक्स वर्कर अपने बच्चों को दो साल के बाद इस सेंटर पर छोड़ देती हैं। जब कभी बच्चा अपनी मां से मिलने की जिद करता है तो उसे सेंटर कर्मी कोठे पर ले जाकर मां से मिला लाता है। कई बार दोपहर को मां भी पांच-दस मिनट के लिए स्कूल में आकर बच्चे का हालचाल ले जाती है। 

कई मौकों पर यह भी देखा गया है कि सेंटर कर्मी बच्चे को लेकर कोठे पर पहुंचता है, लेकिन मां के पास समय नहीं होता। तब तक वह बच्चे को खिलाता-पिलाता है। बच्चा रोने न लगे, इसके लिए वह उसे खिलौने देकर बहलाता है। 

ललिता.एस.ए के मुताबिक, वे इन बच्चों को वह सब देने का प्रयास करती हैं, जो एक बच्चे को अपने मां-बाप से मिलता है। बच्चों को उनकी पसंद का खाना देने से लेकर उनके खेलने तक हर बात का ध्यान रखा जाता है। पढ़ाई के साथ संस्कार की अलग क्लास लगती है। 

जब ये बच्चे 14 साल के हो जाते हैं तो इनकी मां की सहमति से इन्हें चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के समक्ष पेश कर किसी सरकारी होम में शिफ्ट कर दिया जाता है। वहां पर इन बच्चों को जो भी कोर्स करना है या आगे उन्हें कौन सी पढ़ाई करनी है, इस बाबत सेंटरकर्मी होम में जाकर उनकी मदद करते हैं।

संडे के दिन ये बच्चे जीबी रोड के स्कूल में आते हैं, खेलते हैं, अपनी मां से मिलते हैं और शाम को चले जाते हैं। बच्चों को यही कहा जाता है कि इनकी मां किसी फैक्टरी में काम करती है। वह इनसे मिलने यहीं पर आ जाती हैं। अगर कोई बच्चा दो दिन से ज्यादा स्कूल में अनुपस्थित रहता है तो सेंटरकर्मी कोठे पर जाकर पता लगाते हैं कि बच्चा क्यों नहीं आ रहा है।

हैपी बर्थ-डे टू यू भी होता और...नवरात्र में ये बच्चे कोठे पर जाते हैं...

इन बच्चों का जब बर्थ-डे होता है तो इनकी मां चुपके से सेंटर पर आकर मिठाई, चॉकलेट, टॉफी और फल दे जाती है। दोपहर को बच्चे का जन्मदिन मनाया जाता है। सभी बच्चे उसे हैपी बर्थ डे टू यू बोलते हैं और तालियां बजाते हैं। अष्ठमी या रामनवमी के दिन स्कूल के बच्चों को, खासतौर पर लड़कियों को कोठों पर बुलाया जाता है। उनकी पूजा कर उन्हें खाना खिलाया जाता है।

एक सवाल के जवाब में कि जीबी रोड या उसके आसपास रहने वाले लोग क्या इन बच्चों को अपने घर बुलाते हैं, तो ललिता का जवाब था, नहीं, बिल्कुल नहीं। यहां पर बड़े-बड़े कारोबारी हैं, मगर नवरात्र पर वे इस स्कूल के बच्चों को बुलाना पसंद नहीं करते।

कोठे नंबर 52 में रह रही शयामली (बदला हुआ नाम) का कहना है कि हमारी जैसे तैसे कट गई, लेकिन बच्चों को इस नर्क से दूर रखना है। हमारा प्रयास यही रहता है कि दसवीं के बाद इन्हें अपने गांव या शहर में या फिर कहीं दूर हॉस्टल में भेज दिया जाए।

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