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एक ऐसा शख्स जो बिना चुनाव लड़े हैं तीन बार से विधायक 

Mon, 01 May 2017 05:44 PM IST
amarujala.com- Presented By: अभिषेक तिवारी
amarujala.com- Presented By: अभिषेक तिवारी Updated Mon, 01 May 2017 05:44 PM IST
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A person who has contested without contesting from the MLA three times
file photo - फोटो : bbc
उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय के एक बड़े अधिकारी से जब पिछली विधानसभा के मनोनीत सदस्य के बारे में मैंने फोन पर जानना चाहा तो वो बड़ी जोर से हंसे। उनका जवाब था, "हमें तो कभी दिखे नहीं, आप को मिलें तो बताइएगा। इस नेक काम के लिए आपको नमन करूंगा।" ये मनोनीत सदस्य थे पीटर फैंथम। उत्तर प्रदेश विधान सभा में 403 निर्वाचित विधायकों के अलावा एक विधायक को सरकार की सहमति से राज्यपाल मनोनीत करते हैं। ये कहीं से चुनाव नहीं लड़ते और न ही इनका कोई निर्वाचन क्षेत्र होता है। इस तरह से विधानसभा में कुल विधायक 404 हो जाते हैं। पीटर फैंथम तीन कार्यकाल से विधानसभा में मनोनीत हो रहे हैं और लगातार उनके मनोनयन पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि इस दौरान राज्य में सरकार समाजवादी पार्टी की थी या फिर बहुजन समाज पार्टी की।
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'माफिया नहीं अच्छे लोग हैं वो'

A person who has contested without contesting from the MLA three times
file photo - फोटो : bbc

पुराने लखनऊ के मॉडल हाउस इलाके में पीटर फैंथम का विद्यालय और घर है। सुबह करीब नौ बजे विद्यालय पहुंचने पर पीटर फैंथम से मुलाकात हुई तो उन्होंने विधानसभा में अपने कई अनुभव शेयर किए। मसलन, 1997 में विधानसभा में हुई मार-पीट वाली घटना से लेकर 'माफिया' कहे जाने वाले कुछ विधायकों के साथ अच्छे संबंधों तक। उनका कहना था कि ये लोग 'माफिया' नहीं बल्कि बहुत अच्छे लोग हैं, इनके बारे में 'गलत' बातें प्रचारित की जाती हैं।

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'विधानसभा में कभी नजर नहीं आए पीटर'

A person who has contested without contesting from the MLA three times
file photo - फोटो : bbc
लेकिन जब यही बात हमने पिछली विधानसभा के कुछ सदस्यों से पूछी तो ऐसा कोई नहीं मिला जिसने पीटर फैंथम के साथ विधानसभा परिसर में चहल-कदमी की हो या फिर उनके साथ बैठक की हो। यहां तक कि पूर्व विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय तक ने नहीं। माता प्रसाद पांडेय विधानसभा अध्यक्ष के तौर पर दो कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। वो साफतौर पर कहते हैं कि उन्होंने पीटर फैंथम को शायद ही कभी विधानसभा में देखा हो।वो कहते हैं, "इनसे अपेक्षा की जाती है कि ये सदन में रहेंगे और कम से कम अपने समुदाय के लोगों के हितों के मुद्दों को रखेंगे। लेकिन दस साल के कार्यकाल में मैंने कभी नहीं देखा कि इन्होंने कोई सवाल रखा हो, किसी परिचर्चा में हिस्सा लिया हो, यहां तक कि गवर्नर के अभिभाषण में भी ये शायद ही दिखे हों।"
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पीटर फैंथम सदन में उठा चुके हैं सवाल

A person who has contested without contesting from the MLA three times
file photo - फोटो : bbc
हालांकि पीटर फैंथम कहते हैं कि उन्होंने जनहित के और एंग्लो-इंडियन समुदाय के हितों से जुड़े कई मुद्दे सदन में उठाए हैं। पीटर कहते हैं, "विधायक निधि से हमने कई स्कूलों में अच्छे काम किए हैं। एंग्लो-इंडियन समुदाय ज्यादातर शिक्षा में लगा हुआ है और इस दिशा में हमने बतौर विधायक कई काम किए हैं। कई गांवों में भी हमने विधायक निधि से पैसा दिया है।" दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 333 में राज्यों की विधानसभाओं में एंग्लो इंडियन समुदाय के एक सदस्य को मनोनीत करने का प्रावधान किया गया है। राज्यपाल उस स्थिति में ऐसा कर सकते हैं जबकि उन्हें ये लगे कि इस समुदाय का सम्यक प्रतिनिधित्व विधान सभा में नहीं है।

मनोनीत सदस्यों को क्या महत्व है?

A person who has contested without contesting from the MLA three times
file photo - फोटो : bbc

जानकारों के मुताबिक ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि आजादी के बाद अंग्रेज तो भारत से चले गए लेकिन अंग्रेज पुरुषों और भारतीय महिलाओं की संतानें ज्यादातर यहीं रह गईं थीं जिन्हें एंग्लो-इंडियन कहा जाता है। चूंकि इस समुदाय के लोगों की देश भर में जनसंख्या महज पांच लाख के आस-पास थी और इसके आधार पर इनका कहीं से निर्वाचित होना संभव नहीं था, इसलिए इनके मनोनयन का प्रावधान किया गया ताकि इस समुदाय का प्रतिनिधित्व कायम रहे। लेकिन लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "न तो मनोनीत सदस्य सदन में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं और न ही उनका कोई महत्व है, सिर्फ प्रतीकात्मक तौर पर आजादी के साठ साल बाद भी गुलामी की एक परंपरा कायम है।" संविधानविद सुभाष कश्यप कहते हैं, " ये राज्यों के ऊपर है, किसी तरह की बाध्यता नहीं है। राज्यपाल को यदि लगता है कि एंग्लो इंडियंस का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है, तभी मनोनीत कर सकते हैं। राज्य यदि चाहें तो प्रस्ताव पारित करके व्यवस्था को खत्म भी कर सकते हैं क्योंकि ये आरक्षण है और इसे अनंत काल तक के लिए नहीं दिया जा सकता।" बहरहाल, जानकारों का कहना है कि ये संवैधानिक व्यवस्था है और जब तक संविधान इसकी इजाजत देगा तब तक एंग्लो इंडियन सदस्य विधान सभाओं में मनोनीत होंगे। लेकिन कई बार आरोप ये भी लगते हैं कि मनोनीत विधायक सदन में उपस्थित नहीं होते हैं, बहस-मुबाहिसे में किसी स्तर पर उनकी भूमिका नहीं होती है और सिर्फ प्रतीकात्मक रूप में इस व्यवस्था को कायम रखा गया है। जहां तक पीटर फैंथम का सवाल है तो वो तीन बार से विधायक मनोनीत हो रहे हैं। जब मैंने उनसे सवाल किया कि क्या इसके लिए उनके समुदाय का कोई और व्यक्ति राजनीतिक दलों को नहीं मिलता है, तो उन्होंने हँसकर जवाब दिया, "मिलता होगा, लेकिन शायद लखनऊ में होने का फायदा मिलता हो।"

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