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Mizoram: छह क्षेत्रीय दलों के गठजोड़ से बनी पार्टी मिजोरम में सत्ता के शीर्ष पर, ये है ZPM के बनने की कहानी

Mon, 04 Dec 2023 05:08 PM IST
कुमार विवेक न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कुमार विवेक Updated Mon, 04 Dec 2023 05:08 PM IST
सार

Mizoram: 2018 के मिजोरम विधान सभा चुनावों में जेडपीएम पहली बार मैदान में उतरा। पार्टी ने खुद को मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश किया। उस दौरान पार्टी ने शराबबंदी की वकालत की।

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A party formed by an alliance of 6 regional parties at the top of power in Mizoram, know the story of ZPM
जेडपीएम मिजोरम। - फोटो : amarujala.com

विस्तार

भारत के पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम में विधानसभा चुनाव के वोटों के गिनती पूरी हो चुकी है। नतीजों में जोराम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) ने 27 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर लिया है। 40 सीटों वाले मिजोरम विधानसभा में बहुमत के लिए 21 सीटों की जरूरत थी। एक पूर्व आईपीएस अधिकारी, विधायक और पूर्व सांसद लालडुहोमा द्वारा स्थापित पार्टी जेडपीएम के मिजोरम में सत्ता के शिखर तक पहुंचने की कहानी बहुत दिलचस्प रही है। आइए जानते हैं इस पार्टी के बारे में सबकुछ।  

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कैसे हुआ जोरम पीपुल्स मूवमेंट का गठन? 

जोरम पीपुल्स मूवमेंट का गठन छह क्षेत्रीय दलों के गठबंधन के रूप में किया गया था। यह छह क्षेत्रीय दल थे- मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, जोरम नेशनलिस्ट पार्टी, जोरम एक्सोडस मूवमेंट, जोरम डिसेंट्रेलाइजेशन फ्रंट, जोरम रिफॉर्मेशन फ्रंट और मिजोरम पीपुल्स पार्टी। इन दलों ने आगे चलकर एक एकीकृत इकाई के रूप में विलय कर दिया, इसके बाद आधिकारिक तौर पर 2018 में जोरम पीपुल्स मूवमेंट यानी आज के जेडपीएम का गठन हुआ। हालांकि चुनाव आयोग में पंजीकृत होने के लिए जेडपीएम को और इंतजार करना पड़ा।

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2018 के विधानसभा चुनावों में निर्दलीय लड़े जेडपीएम प्रत्याशी

2018 के मिजोरम विधान सभा चुनावों में जेडपीएम पहली बार मैदान में उतरा। पार्टी ने खुद को मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश किया। पार्टी ने शराबबंदी की वकालत की। पार्टी ने 36 में से 40 सीटों पर चुनाव लड़ा। उस वक्त लालडुहोमा की गठित पार्टी को चुनाव आयोग से मान्यता नहीं मिल सकी थी, जिसके कारण उनके उम्मीदवारों को निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में उतरना पड़ा था। निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में जेडपीएम ने 8 सीटों पर जीत हासिल की। यह अपेक्षाकृत नए ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। चुनाव में लालडुहोमा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री लालथनहलवा को करारी शिकस्त दी, जिसके बाद से वे राजनीतिक गलियारों में सुर्खियां बन गए।

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2019 में जेडपीएम को चुनाव आयोग से मान्यता मिली

जेडपीएम का उद्देश्य मिजोरम के लोगों से जुड़े विभिन्न मुद्दों को उठाना था। इसका गठन  सामाजिक चिंताओं और सामुदायिक कल्याण पर ध्यान देने के लिए एक गैर-राजनीतिक इकाई के रूप में किया गया था। भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) ने आधिकारिक तौर पर जुलाई 2019 में पार्टी को पंजीकृत किया। हालांकि इस खुशी खबर के बीच एक बुरी खबर भी आई। एक तरफ जेडपीएम को राजनीतिक पार्टी का दर्जा मिला दूसरी ओर इसकी सबसे बड़ी संस्थापक पार्टी, मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, 2019 में ही गठबंधन से बाहर हो गई।

2023 के मिजोरम विधानसभा चुनाव में जेडपीएम को बहुमत

2023 के मिजोरम विधानसभा चुनावों में, जेडपीएम ने सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ा। सात नवंबर को हुए चुनाव में 80 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ। चार दिसंबर को शुरू हुए वोटों की गिनती में जेडपीएम ने मिनट तक 40 में से 25 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर ली है। ऐसे में प्रदेश में जेडपीएम की सरकार बननी और लालडुहोमा का मुख्यमंत्री बनना तय हो गया है।  

कभी पीएम के सुरक्षा प्रभारी रहे हैं जेडपीएम के संस्थापक लालडुहोमा?

मिज़ोरम में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी जेडपीएम के अध्यक्ष लालडुहोमा मिज़ोरम के एक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। एक स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, 1972 से 1977 तक लालडुहोमा ने मिजोरम के मुख्यमंत्री के प्रधान सहायक के तौर पर काम किया था। अपनी स्नातक की पढ़ाई के बाद उन्होंने भारतीय सिविल सेवा परीक्षा दी। 1977 में आईपीएस बनने के बाद उन्होंने गोवा में एक स्क्वाड लीडर के तौर पर काम किया। तैनाती के दौरान उन्होंने तस्करों पर बड़ी कार्रवाई की। पुलिस अधिकारी के तौर पर उनकी उपलब्धियां सामाचार पत्रों की सुर्खियां बनने लगी थीं। 1982 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें अपना सुरक्षा प्रभारी नियुक्त किया था। पुलिस उपायुक्त के रूप में विशेष पदोन्नति दी गई थी। राजीव गांधी की अध्यक्षता में 1982 एशियाई खेलों की आयोजन समिति के सचिव भी थे।

कैसे हुई लालडुहोमा की राजनीति में 'एंट्री'?

1984 में पुलिस सेवा से इस्तीफा देने के बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए थे। उसी वर्ष दिसंबर माह में लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कर लालडुहोमा संसद पहुंचे थे। 1988 में कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद उन्हें दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित किया गया था, जिसके कारण उन्हें लोकसभा की सदस्यता गंवानी पड़ी थी।

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