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एक जबर पान खाने वाले के जज्बात दिल से...
Thu, 23 Mar 2017 09:08 AM IST
anand anand
amarujala.com- Presented by: रत्नाकर त्रिपाठी
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Published by: anand anand
Updated Thu, 23 Mar 2017 09:08 AM IST
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बहुत कम लोगों को मालूम है कि जब दफ्तर में एक बनारसी का काम फंसा और मुंबई के बाबू के एक बीड़ा पान नोश फरमाने पर जब दशकों से रुका काम मिनटों में हो गया... तो इसके चश्मदीद एक गीतकार ने भावातिरेक में यह विश्व प्रसिद्ध लाइन लिख डाली... कि खइके पान बनारस वाला, खुल जाए बंद अक्ल का ताला...।
अब ई कौन सा बैलेंस हुआ कि एक उधर मारे तो एक इधर भी मारोगे। बूचड़खाने का खून और पान की पीक का रंग तो एक है, लेकिन तासीर अलग-अलग है।
पान क्या है समझो.. कि पूरा एक योग ध्यान है। दफ्तरों में जब कोई मसला फंसता है तो बड़े बाबू चौरसिया जी की दुकान से एक पान जमाकर ध्यान मग्न हो जाते हैं और मसला चुटकियों में हल हो जाता है।
ये भी पढ़ें: सीएम योगी को पान-गुटखा न खाने वाले यूपी के एक वोटर का Open Letter
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पान तो हमेशा से दफ्तरों और कार्यालयों की शान रहा है। बड़े-बड़े राज दरबारों में पान ओहदे के हिसाब से दिए जाते थे। अगर कोई बड़ा काम करना होता था तो थाली में पान दरबार में घुमाया जाता था और जो बीड़ा उठा लेता था वही शूरवीर माना जाता था। ये परंपरा आजतक चली आ रही है।
पान का जलवा यह है कि चाहे कोई भी शुभ कार्य हो प्रभू को प्रसन्न करने के लिए सबसे पहले 'तांबूलम समर्पयामी' कहकर इसे चढ़ाया जाता है।
अनंतकाल से चले आ रहे पान के चलते भारत में एक जात ने ही पैदाइश ले ली, जिसे तमोली के नाम से जानते हैं। अब जब राज दरबार में पान चला, मुगल दरबार में पान चला, फिरंगी सरकार में पान चला तो अब कौन सी आफत आ पड़ी कि चिल्लाने लगे कि दफ्तर में पान न खाना।
अरे, श्रीवास्तव जी जब लकड़ी की पौराणिक कुर्सी पर बैठकर नागवल्ली (पान) को मरोड़ते हुए अपने मुख कमल में प्रविष्ट कराते हैं और चूने लगे उंगलियों को बालों में पोछते हुए आखें बंद करते हैं तो बाएं-बाएं करती समस्या भी धाएं-धाएं करके हल होती है।
घुलने के बाद जब पान का रस तालू से कंठ होते हुए उदर में प्रविष्ट करता है तो सारे स्नायुतंत्र और कोशिकाएं पूर्ण चैतन्य हो जाती हैं और चतुर्दिक काम का मौहाल बनने लगता है।
पान का रस उदर तक जाते-जाते दिमाग चौतरफा खुल जाता है और कलम फाइलों पर इस तरह लहराने लगती है जिस तरह कभी साहिर लुधियानवी नागिन की लहराती जुल्फों का जिक्र किया करते थे।
पान खाया नहीं, जमाया जाता है, होथों पर दिखता नहीं रचता है। चबाया नहीं, घुलाया जाता है। शिथिल पड़े नीरव से सरकारी दफ्तरों में जब पान की रौनक आती है तो चेहरे खिल उठते हैं।
पान घुलाया जाता है इसलिए उन्हें जाहिलियत से देखा जाता है जो पान थूका करते हैं। अब आप ही बताइए, कौन दफ्तर में पान थूककर अपने ऊपर जाहिल का ठप्पा लगाना चाहेगा।
बस इतना जानिए हुजूर कि पान आम भारतीयों, दफ्तरियों और बनारसियों की आन है, बान है, शान है। मुंह में पान नहीं है तो शरीर में जान नहीं है। जब तक पान का मुंह चलता रहता है तब तक कलम का शिरा घीसता रहता है।
पान पर प्रतिबंध लगाना दफ्तरों की बिजली काट देने जैसा है। उर्वरा मनुष्य की नसबंदी कर देने जैसा है। यकीन मानिए नसबंदी से जहां समाज में वंश का विकास रुकता है, वहीं पानबंदी से दफ्तरों में विचारों का विकास रुक जाएगा। जनता की नब्ज को पहचानिए।
जुआड़ियों से पंगा लीजिए, बूचड़ियों से लीजिए, लेकिन पनेड़ियों से मत लीजिए। पान को रोकना एक परंपरा को रोकना है। देश के गौरव को रोकना है। दफ्तरों की सोच को रोकना है।
अब पनेड़ियों के रोम बनारस में तो पान का यह जलवा है कि जो नहीं खाता है, उसे ऐसा धिक्कारा जाता है कि मुनव्वर राणा भी कहने को मजबूर होते हैं कि 'मुहब्बत करते हो और आंसू बहाना नहीं आया... अरे बनारस में रहते हो और पान खाना नहीं आया।'
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अब ई कौन सा बैलेंस हुआ कि एक उधर मारे तो एक इधर भी मारोगे। बूचड़खाने का खून और पान की पीक का रंग तो एक है, लेकिन तासीर अलग-अलग है।
पान क्या है समझो.. कि पूरा एक योग ध्यान है। दफ्तरों में जब कोई मसला फंसता है तो बड़े बाबू चौरसिया जी की दुकान से एक पान जमाकर ध्यान मग्न हो जाते हैं और मसला चुटकियों में हल हो जाता है।
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पान तो हमेशा से दफ्तरों और कार्यालयों की शान रहा है। बड़े-बड़े राज दरबारों में पान ओहदे के हिसाब से दिए जाते थे। अगर कोई बड़ा काम करना होता था तो थाली में पान दरबार में घुमाया जाता था और जो बीड़ा उठा लेता था वही शूरवीर माना जाता था। ये परंपरा आजतक चली आ रही है।
पान का जलवा यह है कि चाहे कोई भी शुभ कार्य हो प्रभू को प्रसन्न करने के लिए सबसे पहले 'तांबूलम समर्पयामी' कहकर इसे चढ़ाया जाता है।
अनंतकाल से चले आ रहे पान के चलते भारत में एक जात ने ही पैदाइश ले ली, जिसे तमोली के नाम से जानते हैं। अब जब राज दरबार में पान चला, मुगल दरबार में पान चला, फिरंगी सरकार में पान चला तो अब कौन सी आफत आ पड़ी कि चिल्लाने लगे कि दफ्तर में पान न खाना।
अरे, श्रीवास्तव जी जब लकड़ी की पौराणिक कुर्सी पर बैठकर नागवल्ली (पान) को मरोड़ते हुए अपने मुख कमल में प्रविष्ट कराते हैं और चूने लगे उंगलियों को बालों में पोछते हुए आखें बंद करते हैं तो बाएं-बाएं करती समस्या भी धाएं-धाएं करके हल होती है।
घुलने के बाद जब पान का रस तालू से कंठ होते हुए उदर में प्रविष्ट करता है तो सारे स्नायुतंत्र और कोशिकाएं पूर्ण चैतन्य हो जाती हैं और चतुर्दिक काम का मौहाल बनने लगता है।
पान का रस उदर तक जाते-जाते दिमाग चौतरफा खुल जाता है और कलम फाइलों पर इस तरह लहराने लगती है जिस तरह कभी साहिर लुधियानवी नागिन की लहराती जुल्फों का जिक्र किया करते थे।
पान खाया नहीं, जमाया जाता है, होथों पर दिखता नहीं रचता है। चबाया नहीं, घुलाया जाता है। शिथिल पड़े नीरव से सरकारी दफ्तरों में जब पान की रौनक आती है तो चेहरे खिल उठते हैं।
पान घुलाया जाता है इसलिए उन्हें जाहिलियत से देखा जाता है जो पान थूका करते हैं। अब आप ही बताइए, कौन दफ्तर में पान थूककर अपने ऊपर जाहिल का ठप्पा लगाना चाहेगा।
बस इतना जानिए हुजूर कि पान आम भारतीयों, दफ्तरियों और बनारसियों की आन है, बान है, शान है। मुंह में पान नहीं है तो शरीर में जान नहीं है। जब तक पान का मुंह चलता रहता है तब तक कलम का शिरा घीसता रहता है।
पान पर प्रतिबंध लगाना दफ्तरों की बिजली काट देने जैसा है। उर्वरा मनुष्य की नसबंदी कर देने जैसा है। यकीन मानिए नसबंदी से जहां समाज में वंश का विकास रुकता है, वहीं पानबंदी से दफ्तरों में विचारों का विकास रुक जाएगा। जनता की नब्ज को पहचानिए।
जुआड़ियों से पंगा लीजिए, बूचड़ियों से लीजिए, लेकिन पनेड़ियों से मत लीजिए। पान को रोकना एक परंपरा को रोकना है। देश के गौरव को रोकना है। दफ्तरों की सोच को रोकना है।
अब पनेड़ियों के रोम बनारस में तो पान का यह जलवा है कि जो नहीं खाता है, उसे ऐसा धिक्कारा जाता है कि मुनव्वर राणा भी कहने को मजबूर होते हैं कि 'मुहब्बत करते हो और आंसू बहाना नहीं आया... अरे बनारस में रहते हो और पान खाना नहीं आया।'