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Parliament Special Session: विशेष सत्र ने बढ़ाईं धड़कनें, 75 साल की चर्चा कहीं संविधान की समीक्षा तो नहीं!

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 14 Sep 2023 07:36 PM IST
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सार
Parliament Special Session: कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा कर दिया कि पीएम मोदी, सोनिया गांधी की ओर से लिखे गए पत्र की वजह से दबाव में आए हैं। इसी वजह से केंद्र सरकार, संसद के विशेष सत्र का एजेंडा घोषित करने को तैयार हुई है...
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75 years of discussion whether the Constitution is being reviewed or not in Parliament Special Session
Parliament Special Session: Priyanka Chaturvedi - फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार

संसद के विशेष सत्र को लेकर सभी राजनीतिक दलों के नेताओं की धड़कनें बढ़ी हुई हैं। हालांकि बुधवार रात को संसदीय कार्य मंत्री प्रहृलाद जोशी ने अपने ट्वीट के जरिए यह बता दिया कि संसद के विशेष सत्र का एजेंडा क्या रहेगा। संसद के विशेष सत्र में 75 साल का सफर, जिसमें संविधान सभा से लेकर अभी तक की उपलब्धियां शामिल हैं, पर चर्चा होगी। सत्र का एजेंडा आने के बाद भी विपक्षी नेताओं को लगता है कि 'पर्दे' के पीछे कुछ तो है, जो सामने नहीं आ पा रहा है। 75 साल का हिसाब-किताब, कहीं 'संविधान' समीक्षा और उसमें बदलाव की पहली सीढ़ी तो नहीं है। कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख, सोनिया गांधी ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखा था। उन्होंने आग्रह किया था कि 18 सितंबर से शुरू होने वाले संसद के विशेष सत्र में देश की आर्थिक स्थिति, जातीय जनगणना, चीन के साथ सीमा पर गतिरोध और अदाणी समूह से जुड़े नए खुलासों की पृष्ठभूमि में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित करने की मांग समेत नौ मुद्दों पर उचित नियमों के तहत चर्चा कराई जाए।

एजेंडे में जनता के महत्व का कुछ नहीं है

बुधवार रात को जब संसदीय कार्य मंत्री ने एजेंडे की जानकारी दी, तो कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने यह दावा कर दिया कि पीएम मोदी, सोनिया गांधी की ओर से लिखे गए पत्र की वजह से दबाव में आए हैं। इसी वजह से केंद्र सरकार, संसद के विशेष सत्र का एजेंडा घोषित करने को तैयार हुई है। सत्र का जो एजेंडा सार्वजनिक हुआ है, वह फिलहाल कुछ खास नहीं है। इन सब बातों के लिए नवंबर के सत्र तक इंतजार किया जा सकता था। जयराम रमेश ने कहा, मैं श्योर हूं कि 'लेजिसलेटिव ग्रेनेड' को लास्ट मोमेंट के लिए छुपा कर रखा गया है। पर्दे के पीछे कुछ और है। कांग्रेस पार्टी के महासचिव, केसी वेणुगोपाल ने कहा, केंद्र सरकार ने जो भी एजेंडा फिलहाल घोषित किया है, उनमें से कोई भी उन पब्लिक इंपॉर्टेंस का नहीं है। गौरव गोगोई ने कहा, सीपीसी चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने देश की बेहद महत्वपूर्ण समस्याओं को लेकर पीएम मोदी को पत्र लिखा था। वे मुद्दे तो गायब ही दिख रहे हैं। सरकार ने संसद के विशेष सत्र की शुरुआत से एक दिन पहले यानी 17 सितंबर को सर्वदलीय बैठक बुलाई है।

चर्चा में रहा था बिबेक देबरॉय का लेख

सरकार ने अपने एजेंडे में चार बिलों का जिक्र किया है। इनमें एडवोकेट बिल, प्रेस एंड रजिस्ट्रेशन ऑफ पीरियोडिकल बिल 2023, पोस्ट ऑफिस बिल और चीफ इलेक्शन कमिश्नर एंड अदर इलेक्शन कमिश्नर बिल है। विपक्षी नेताओं का कहना है कि संसद के विशेष सत्र में सरकार का असल एजेंडा कुछ और ही है। अगर सरकार ने 75 साल के हिसाब किताब पर चर्चा करने की बात कही है, तो उसे संविधान बदलने की पहली सीढ़ी कहा जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएएसी-पीएम) के अध्यक्ष बिबेक देबरॉय का पिछले दिनों एक लेख चर्चा का विषय बन गया था। उस लेख में नए संविधान की बात की गई थी। जब इस मुद्दे पर विवाद बढ़ा तो उन्होंने अपने विचार को केंद्र सरकार से अलग बताया था। ईएएसी-पीएम ने सोशल मीडिया पर स्पष्टीकरण देते हुए लिखा, 'डॉ बिबेक देबरॉय का लेख उनकी व्यक्तिगत राय थी। वह भारत सरकार के विचारों को नहीं दर्शाता। वह लेख 15 अगस्त को 'देयर इज ए केस फॉर वी द पीपल टू इंब्रेस अ न्यू कॉस्टिट्यूशन' शीर्षक से छापा गया था।

संविधान का जीवनकाल महज 17 साल होता है

इसमें उन्होंने लिखा था, अब हमारे पास वह संविधान नहीं है, जो हमें 1950 में विरासत में मिला था। इसमें संशोधन होते रहे हैं, लेकिन वे हर बार बेहतरी के लिए हों, ऐसा संभव नहीं है। 1973 से हमें बताया गया है कि संविधान की 'बुनियादी संरचना' को बदला नहीं जा सकता है। देबरॉय ने एक स्टडी के हवाले से बताया था कि लिखित संविधान का जीवनकाल महज 17 साल का होता है। उन्होंने, भारत के वर्तमान संविधान को औपनिवेशिक विरासत बताया था। ये पूछना चाहिए कि संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे शब्दों का अब क्या मतलब है। हमें खुद को एक नया संविधान देना होगा। आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि ये सब पीएम की मर्जी से हो रहा है।

'संविधान बदलने' के लिए भाजपा सत्ता में आई

शिव सेना (उद्धव ठाकरे) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा था, 'वे एक नया संविधान चाहते हैं जो उनके फायदे के लिए काम करे। वो एक नया विचार चाहते हैं ताकि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाए। उन्हें नए स्वतंत्रता सेनानी चाहिएं, क्योंकि अभी उनके पास कोई नहीं है। वे भारत में नफरत का एक नया आइडिया चाहते हैं। आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने इस लेख पर कहा था, 'आरएसएस कभी भी संविधान को लेकर सहज नहीं था, इसलिए वर्तमान सरकार और इसके चीफ संविधान में दर्ज विचार-आजादी, समानता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता से नफरत करते हैं। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में केंद्रीय राज्य मंत्री रहे अनंत हेगड़े ने संविधान बदलने को लेकर एक बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि भाजपा 'संविधान बदलने' के लिए सत्ता में आई है। निकट भविष्य में ऐसा किया जाएगा।

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