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चिंताजनक: मछलियों की 3086 प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा, प्रदूषण-जलवायु परिवर्तन बड़ी वजह
Fri, 15 Dec 2023 05:25 AM IST
जलज मिश्रा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: जलज मिश्रा
Updated Fri, 15 Dec 2023 05:25 AM IST
सार
अध्ययन से पता चला है कि दुनिया भर में ताजे पानी में पाई जाने वाली मछलियों की 14,898 प्रजातियों में से 3,086 भारी खतरे में हैं। इन पर यदि तत्काल ध्यान न दिया गया तो यह शीघ्र ही विलुप्त हो जाएंगी। प्रदूषण, ताजे पानी में पाई जाने वाली मछलियों की उन 57 फीसदी प्रजातियों को प्रभावित कर रहा है जिन पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा है।
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Fish
- फोटो : istock
विस्तार
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) के नए विश्लेषण के अनुसार वैश्विक स्तर पर ताजे पानी में पाई जाने वाली मछलियों की करीब एक चौथाई प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इसके लिए प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसे कारक जिम्मेदार हैं। ताजे पानी की मछलियों पर किया गया यह अपनी तरह का पहला व्यापक अध्ययन है।
अध्ययन से पता चला है कि दुनिया भर में ताजे पानी में पाई जाने वाली मछलियों की 14,898 प्रजातियों में से 3,086 भारी खतरे में हैं। इन पर यदि तत्काल ध्यान न दिया गया तो यह शीघ्र ही विलुप्त हो जाएंगी। प्रदूषण, ताजे पानी में पाई जाने वाली मछलियों की उन 57 फीसदी प्रजातियों को प्रभावित कर रहा है जिन पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा है। जलवायु में आ रहा बदलाव संकटग्रस्त मछलियों की करीब 17% प्रजातियों को प्रभावित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों, जलस्रोतों के जल स्तर में आ रही गिरावट, बदलता मौसम और समुद्री जल का नदियों में ऊपर की ओर बढ़ना जैसे मुख्य कारक जिम्मेदार हैं।
33% संकटग्रस्त प्रजातियां खतरे में
आक्रामक प्रजातियों और बीमारी के कारण मीठे पानी की 33 फीसदी संकटग्रस्त मछली प्रजातियां खतरे में हैं। जबकि इनका बढ़ता शिकार 25 फीसदी प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर रहा है। इनके अंडों के लिए हो रहा शिकार भी इनकी घटती आबादी की एक वजह है। बढ़ता शिकार, जलवायु परिवर्तन के कारण आवास में आ रही गिरावट और बांधों की वजह से पानी के प्रवाह में आ रही कमी जैसे कारक जिम्मेदार हैं।
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मछली के राजा सैल्मन पर भी संकट
रिपोर्ट में अटलांटिक सैल्मन की वैश्विक आबादी में 2006 से 2020 के बीच 23 फीसदी की गिरावट आई है। इसकी वजह से यह प्रजाति भी ‘खतरे के करीब’ आ गई है। यह मछली अब उत्तरी यूरोप और अमेरिका में कुछ नदियों तक ही सीमित रह गई है।
हरे कछुए भी संकट में
आईयूसीएन की रेड लिस्ट में अब तक 1,57,190 प्रजातियों को शामिल किया गया है। इनमें से 44,016 पर विलुप्त होने का खतरा है। रिपोर्ट में मध्य दक्षिण प्रशांत और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में पाए जाने वाले हरे कछुए भी संकट में हैं। इनकी आबादी को विलुप्त होने की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
दुनियाभर में आधे से अधिक मीठे पानी की मछली प्रजातियां
आईयूसीएन की विशेषज्ञ कैथी ह्यूजेस का कहना है कि दुनियाभर में मछलियों की जितनी भी प्रजातियां ज्ञात हैं उनमें से आधे से अधिक मीठे पानी की हैं। यह विविध प्रजातियां पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और उसे बेहतर बनाने में मदद करती हैं। मीठे पानी का यह पारिस्थितिक तंत्र करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। इसमें पाई जाने वाली मछलियां लाखों लोगों की जीविका का साधन हैं। इसलिए इस ओर तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।
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अध्ययन से पता चला है कि दुनिया भर में ताजे पानी में पाई जाने वाली मछलियों की 14,898 प्रजातियों में से 3,086 भारी खतरे में हैं। इन पर यदि तत्काल ध्यान न दिया गया तो यह शीघ्र ही विलुप्त हो जाएंगी। प्रदूषण, ताजे पानी में पाई जाने वाली मछलियों की उन 57 फीसदी प्रजातियों को प्रभावित कर रहा है जिन पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा है। जलवायु में आ रहा बदलाव संकटग्रस्त मछलियों की करीब 17% प्रजातियों को प्रभावित कर रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण नदियों, जलस्रोतों के जल स्तर में आ रही गिरावट, बदलता मौसम और समुद्री जल का नदियों में ऊपर की ओर बढ़ना जैसे मुख्य कारक जिम्मेदार हैं।
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33% संकटग्रस्त प्रजातियां खतरे में
आक्रामक प्रजातियों और बीमारी के कारण मीठे पानी की 33 फीसदी संकटग्रस्त मछली प्रजातियां खतरे में हैं। जबकि इनका बढ़ता शिकार 25 फीसदी प्रजातियों के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर रहा है। इनके अंडों के लिए हो रहा शिकार भी इनकी घटती आबादी की एक वजह है। बढ़ता शिकार, जलवायु परिवर्तन के कारण आवास में आ रही गिरावट और बांधों की वजह से पानी के प्रवाह में आ रही कमी जैसे कारक जिम्मेदार हैं।
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मछली के राजा सैल्मन पर भी संकट
रिपोर्ट में अटलांटिक सैल्मन की वैश्विक आबादी में 2006 से 2020 के बीच 23 फीसदी की गिरावट आई है। इसकी वजह से यह प्रजाति भी ‘खतरे के करीब’ आ गई है। यह मछली अब उत्तरी यूरोप और अमेरिका में कुछ नदियों तक ही सीमित रह गई है।
हरे कछुए भी संकट में
आईयूसीएन की रेड लिस्ट में अब तक 1,57,190 प्रजातियों को शामिल किया गया है। इनमें से 44,016 पर विलुप्त होने का खतरा है। रिपोर्ट में मध्य दक्षिण प्रशांत और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में पाए जाने वाले हरे कछुए भी संकट में हैं। इनकी आबादी को विलुप्त होने की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है।
दुनियाभर में आधे से अधिक मीठे पानी की मछली प्रजातियां
आईयूसीएन की विशेषज्ञ कैथी ह्यूजेस का कहना है कि दुनियाभर में मछलियों की जितनी भी प्रजातियां ज्ञात हैं उनमें से आधे से अधिक मीठे पानी की हैं। यह विविध प्रजातियां पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और उसे बेहतर बनाने में मदद करती हैं। मीठे पानी का यह पारिस्थितिक तंत्र करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। इसमें पाई जाने वाली मछलियां लाखों लोगों की जीविका का साधन हैं। इसलिए इस ओर तत्काल ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।