इतिहास बने 220 साल पुराने 41 आयुध कारखाने: सात कंपनियों में तब्दील हुई विरासत, सेना ऑर्डर देगी इसकी कोई गारंटी नहीं
एआईडीईएफ के महासचिव श्रीकुमार बताते हैं, देश की विरासत को प्राइवेट हाथों में सौंप दिया गया है। पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर इस तरह के सौदे के खिलाफ थे। वे आयुध कारखानों के मौजूदा स्वरूप को ही आगे बढ़ाना चाहते थे। इन कारखानों की जमीन दो लाख करोड़ रुपये की है...
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भारतीय रक्षा तंत्र का चौथा बाजू कहे जाने वाले 220 साल पुराने 41 आयुध कारखाने आज इतिहास बन गए हैं। देश की यह विरासत एक अक्तूबर से सात कंपनियों में विभाजित हो गई है। रक्षा मंत्रालय ने सेना के लिए साजोसामान बनाने वाले ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड 'ओएफबी' को भंग कर दिया है। ओएफबी की संपत्ति व कर्मचारी भी अब सात सरकारी कंपनियों में ट्रांसफर कर दिए जाएंगे। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने बताया, आज देश के लिए काला दिन है। केंद्र सरकार ने एक 'विरासत' को खत्म कर दिया है। रक्षा क्षेत्र के अलावा 41 आयुध कारखानों में काम करने वाले 76 हजार कर्मियों का भविष्य भी दोराहे पर आ गया है। अब इन कंपनियों को सेना से काम मिलेगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। जब काम नहीं होगा तो कंपनियों पर ताला लग जाएगा। केंद्र सरकार ने यह फैसला कर रक्षा क्षेत्र पर कुठाराघात किया है। शुक्रवार को आयुध कारखानों के 76 हजार कर्मियों और अधिकारियों ने दोपहर का लंच नहीं किया।
केंद्र सरकार की तरफ से 41 आयुध कारखानों को कंपनी में तब्दील करने के पीछे यह दलील दी गई थी कि ओएफबी में ऑटोनॉमी, अकाउंटेबिलिटी और एफिशिएंसी में सुधार होगा। ओएफबी का कॉरपोरेटाइजेशन किया जाएगा। रक्षा मंत्रालय ने 28 सितंबर को अपने ऑर्डर में कहा था, पहली अक्टूबर से 41 प्रॉडक्शन यूनिट्स और नॉन-प्रॉडक्शन यूनिट्स का प्रबंधन, नियंत्रण, ऑपरेशंस और मेंटेनेंस सात सरकारी कंपनियों को ट्रांसफर करने का फैसला किया है। इन्हें डीपीएसयू का नाम दिया गया है। कंपनियों के नाम मुनिशन इंडिया लिमिटेड, आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड, एडवांस्ड विपंस एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड, ट्रूप कम्फर्ट्स लिमिटेड, यंत्र इंडिया लिमिटेड, इंडिया ऑप्टेल लिमिटेड और ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड हैं। सी. श्रीकुमार का कहना है, इन कारखानों ने भारतीय सेना को पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध, बांग्लादेश लिब्रेशन वॉर, कारगिल की लड़ाई और लद्दाख जैसी झड़पों में साजो-सामान सप्लाई किया था। केंद्र सरकार इस फैसले की आड़ में प्राइवेट कंपनियां और विदेशी हथियार निर्माताओं को लाभ पहुंचाना चाहती है। अभी तक प्राइवेट कंपनियां, 41 आयुध कारखानों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रही थीं। केंद्र ने इंडियन डिफेंस के रणनीतिक कौशल और प्रबंधन के साथ खिलवाड़ किया है। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के अनुसार, यह फैसला एक भ्रामक कदम साबित होगा।
सरकार ने चहेते उद्योगपतियों की राह आसान की
बतौर श्रीकुमार, केंद्र के इस फैसले के खिलाफ लड़ाई लड़ी जाएगी। यह लड़ाई कोर्ट में और सड़क पर लड़ेंगे। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस निर्णय को एतिहासिक करार दिया था। उनका कहना था, इन आयुध कारखानों में कार्यरत 76,000 कर्मचारियों की सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। यह निर्णय देश के रक्षा उत्पादन में बढ़ोतरी के मकसद से लिया गया है। इससे देश की रक्षा जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। सभी सात कंपनियां रक्षा क्षेत्र के अन्य उपक्रमों की तरह ही होंगी। एआईडीईएफ के महासचिव श्रीकुमार बताते हैं, देश की विरासत को प्राइवेट हाथों में सौंप दिया गया है। पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर इस तरह के सौदे के खिलाफ थे। वे आयुध कारखानों के मौजूदा स्वरूप को ही आगे बढ़ाना चाहते थे। इन कारखानों की जमीन दो लाख करोड़ रुपये की है। सरकार अपने चहेते उद्योगपतियों को 62 हजार एकड़ जमीन कोड़ियों के भाव दिलाने के लिए इसकी कीमत 72 हजार करोड़ रुपये लगवा रही थी। अब केंद्र सरकार ने अपने चहेते उद्योगपतियों की राह आसान कर दी है।
बीपीएमएस महासचिव, मुकेश सिंह ने कहा, ये सामान्य कारखाने नहीं हैं। सेना के साजो-सामान की जरुरत कभी ज्यादा हो सकती है तो कभी कम। कभी किसी खास उपकरण की क्षमता बढ़ानी पड़ सकती है। जैसे टैंक हैं, किसी टैंक का वजन जो दशकों पहले ठीक माना जाता था, आज उसे घटाना पड़ रहा है। सामने दुश्मन के पास कैसे टैंक हैं, मैदानी इलाका है पहाड़ी, मौसम कैसा है आदि बातें क्षमता तय करती हैं। ये त्वरित बदलाव सरकारी संस्थान में ही संभव हैं। सुरक्षा की दृष्टि से इन बदलावों को प्राइवेट कंपनी या निगम के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। आज सरकार ने आयुध कारखानों को निगम बना दिया है, लेकिन कल इन्हें बंद भी कर सकती है। सरकार के लिए यह कहना बहुत आसान है कि ये निगम तो घाटे में चल रहे हैं, इसलिए इन्हें बेचना पड़ रहा है। सरकार यह भरोसा दे रही है कि इन निगमों को कंपनी एक्ट में सौ फीसदी लिस्ट कराएंगे। ये सरकार का सफेद झूठ है। पिछले साल ही कर्मियों ने सरकार के समक्ष अपना विरोध दर्ज करा दिया था। इन कारखानों को निगम न बनाने की एवज में डिफेंस सेक्रेटरी को कई तरह के प्रपोजल दिए गए थे, लेकिन सरकार को कोई रास नहीं आया। वजह, केंद्र सरकार इन कारखानों को निजी हाथों में देने का मन बना चुकी थी।