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1962 युद्ध के दौरान जला दिए गए थे बैंक के नोट, सिक्कों को तालाब में फेक दिया

Sun, 22 Oct 2017 01:16 PM IST
रेहान फजल
रेहान फजल Updated Sun, 22 Oct 2017 01:16 PM IST
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1962 india china war: bank notes were burned out and coins were thrown in ponds
- फोटो : BBC

1962 के भारत-चीन युद्ध पर सबसे सटीक हेडलाइन द इकॉनामिस्ट ने लगाई थी- जब कोहरा छँटा तो चीनी हर जगह मौजूद थे। 18 नवंबर आते-आते से ला (अरुणाचल प्रदेश में तवांग के पास का सीमावर्ती इलाका) बिना लड़ाई के चीनियों के हाथ पड़ चुका था।

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अफवाहें तो यहाँ तक थीं कि चौथी कोर को गुवाहाटी जाने के लिए कह दिया गया था। सैनिकों के काफिले पश्चिम की तरफ बढ रहे थे। तेजपुर को खाली करने के लिए कह दिया गया था और ननमती तेल शोधक कारखाने को उडाए जाने की बात चल रही थी।
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तेजपुर के उपायुक्त का कहीं अता-पता नहीं था। वे डर कर भाग चुके थे। असम सरकार ने राणा केडीएन सिंह से कहा था कि वह लड़खड़ाते हुए प्रशासन की बागडोर संभालें।
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तेजपुर के असैनिक नागरिकों को नाव से पश्चिमी किनारे पर ले जाया जा रहा था।

पढ़ें: चीन में किस धर्म को मानने वाले लोग सबसे ज्यादा

अधिकतर परिवार एक-दो सूटकेसों और छोटे ट्रंकों में जितना सामान भर सकते थे, भर कर भोमारागुडी घाट की तरफ बढ़ रहे थे ताकि वे ब्रह्मपुत्र नदी पार कर दक्षिणी असम की ओर बढ़ सकें। कुछ परिवार तो कड़कड़ाती ठंड में खुले में रात बिता रहे थे ताकि दूसरे दिन तड़के सुबह ही उनका नंबर आ जाए।

पालतू जानवरों को मार रहे थे गोली

1962 india china war: bank notes were burned out and coins were thrown in ponds

ब्रह्मपुत्र के उत्तरी किनारे पर रहने वाले ज्यादातर अंग्रेज चाय बागान मालिकों ने अपनी संपत्ति अपने मातहतों और क्लर्कों के हवाले कर दी थी। अपने पालतू जानवरों को वह या तो बांट रहे थे या उन्हें गोली मार रहे थे। उनका एक ही लक्ष्य था कि किसी तरह कलकत्ता पहुँचा जाए। इस पूरे कूच में नावों के अलावा कारों, बसों, साइकिलों और बैलगाड़ियों तक का सहारा लिया जा रहा था। कुछ लोग तो पैदल ही अपने घरों से निकल पड़े थे।

राणा लाउडस्पीकर से उद्घोषणा कर रहे थे कि वह शाम छह बजे दक्षिणी किनारे जाने वाली आखिरी फेरी पर सवार होंगे और बचे हुए लोगों के लिए नदी पार करने का यह आखिरी मौका होगा। तेजपुर एक भुतहा नगर दिखाई दे रहा था। स्टेट बैंक ने अपने यहाँ रखी सारी करेंसी में आग लगा दी थी और अधजले नोटों के टुकडे हवा में उड़ रहे थे। सिक्कों को पास के तालाब में फेंक दिया गया था।

मानसिक रोगी छोड़े गए
प्रशासन ने मानसिक अस्पताल के ताले खोल दिए थे और 20-30 विक्षिप्त लोग शहर में यहाँ-वहाँ घूम रहे थे। उन सरकारी कागजातों में भी आग लगाई जा रही थी जिन्हें चीनी किसी भी हालत में पढ़ नहीं सकते थे। देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू असम के लोगों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त कर रहे थे। 

उत्तर पूर्व में रहने वाले लोग नेहरू के उस भाषण का जिक्र करते हुए अभी तक कहते हैं कि भारत सरकार ने तो उन्हें तभी विदाई दे दी थी। 19 नवंबर की सुबह तेजपुर में एक पत्ता तक नहीं खड़क रहा था... लगता था जैसे सब कुछ एक जगह पर रुक गया था! सौभाग्य से चीनी तेजपुर से 50 किलोमीटर पहले ही रुक गए थे।

युद्ध विराम

1962 india china war: bank notes were burned out and coins were thrown in ponds

19 नवंबर की आधी रात चीनी रेडियो ने घोषणा की कि उसने तुरंत प्रभाव से एकपक्षीय युद्ध विराम कर दिया है, बशर्ते भारतीय सेना भी उसका पालन करे। आकाशवाणी का 20 नवंबर की सुबह का बुलेटिन अब भी सीमाओं पर भारतीय सैनिकों के वीरता से लड़ने के समाचार सुना रहा था। किसी ने भी थक कर सोए हुए प्रधानमंत्री को जगा कर चीन की इस नई पेशकश के बारे में बताने की जुर्रत नहीं की थी।

यह एक विडंबना थी कि चाहे वह जवान हो या जनरल, यह जानने के लिए बीजिंग रेडियो का सहारा ले रहा था कि उसके अपने युद्ध के मैदान में क्या हो रहा था। 21 नवंबर तक तेजपुर में जिंदगी धीरे-धीरे सामान्य हो चली थी। गृह मंत्री लाल बहादुर शास्त्री लोगों का ढाँढस बढ़ाने वहाँ पहुँचे थे। दो दिन बाद इंदिरा गाँधी ने भी वहाँ का दौरा किया था और जिला प्रशासन के लोग वापस वहाँ पहुँचना शुरू हो गए थे।

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