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किसान आंदोलन: मुख्यमंत्री मनोहरलाल के 'आंसू' और हुड्डा के '32' के बीच क्यों निश्चिंत हैं दुष्यंत, कौन हो रहा एक्सपोज
Fri, 12 Mar 2021 04:19 PM IST
Harendra Chaudhary
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Fri, 12 Mar 2021 04:19 PM IST
सार
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसान आंदोलन के मुद्दे पर प्रदेश के सभी राजनीतिक दल 'चार साल' को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति तय कर रहे हैं। वजह, प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2024 में होने हैं। किसानों के मुद्दों पर कांग्रेस और जजपा का रवैया ढुलमुल सा रहा है...
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हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल
- फोटो : अमर उजाला (फाइल)
विस्तार
किसान आंदोलन को लेकर हरियाणा की राजनीति गरमा गई है। प्रदेश में कई दिनों से मुख्यमंत्री मनोहरलाल के 'आंसू' और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के '32' के बीच उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला क्यों निश्चिंत हैं, यह चर्चा चल रही है। हरियाणा विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव गिरने के बाद खट्टर सरकार और दुष्यंत चौटाला निश्चिंत हो गए हैं कि उनके विधायक अभी एकजुट हैं।
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अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले हुड्डा इसलिए खुश हैं कि उनके साथ दो निर्दलीय विधायकों ने भी सरकार के खिलाफ वोट दिया है। हुड्डा अब जजपा विधायकों को यह कह कर उनके इलाके में घेरेंगे कि ये विधायक जो मीडिया में किसानों का साथ देने का दावा कर रहे थे, विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर इन्होंने खट्टर सरकार के पक्ष में वोट दिया है। ऐसा कर उन्होंने किसानों की पीठ में छुरा घोंपने का काम किया है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसान आंदोलन के मुद्दे पर प्रदेश के सभी राजनीतिक दल 'चार साल' को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति तय कर रहे हैं। वजह, प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2024 में होने हैं। किसानों के मुद्दों पर कांग्रेस और जजपा का रवैया ढुलमुल सा रहा है।
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ये दोनों पार्टियां अभी तक खुलकर किसानों के साथ आने से कतराती रही हैं। हालांकि मीडिया में इन दलों की तरफ से किसानों के पक्ष में बयान जरूर आते रहे हैं। गणतंत्र दिवस के बाद इनेलो के पूर्व विधायक अभय चौटाला और कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा किसानों के मंच पर पहुंचे हैं। प्रदेश की राजनीति के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रविंद्र कुमार सैनी बताते हैं, अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जजपा विधायक, जो एक दिन पहले तक मीडिया में किसानों का समर्थन करने का दावा कर रहे थे, वे सदन में खट्टर सरकार के पक्ष में खड़े दिखाई दिए।
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जजपा के तीन विधायक, जिनमें देवेंद्र सिंह बबली और राम कुमार गौतम शामिल थे, उनके सस्पेंस ने न केवल दुष्यंत चौटाला, बल्कि मुख्यमंत्री मनोहरलाल की नींद भी उड़ा दी थी। ऐसा माना जा रहा था कि ये विधायक सरकार के विपक्ष में जा सकते हैं। तीनों ही पार्टियों को डर था, इसलिए सभी ने अपने-अपने विधायकों के लिए व्हिप जारी किया था।
बतौर रविंद्र कुमार, पूर्व सीएम हुड्डा अब जजपा पर हमलावर हो सकते हैं। उनके पास एक अवसर भी है। वे जजपा विधायकों के इलाकों में जाकर लोगों को बता सकते हैं कि इन्होंने किसानों के मुद्दे पर लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का विरोध किया था। जजपा को एक्सपोज करने की तैयारी हो रही है। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जब हुड्डा ट्रैक्टर पर बैठे थे, तो उनकी महिला विधायक शकुंतला खटक अन्य लोगों के साथ उस ट्रैक्टर को खींच रही थी।
मुख्यमंत्री मनोहरलाल जब सदन में इसका घटना पर बोल रहे थे तो उनके आंसू निकल आए। हालांकि विपक्षी नेताओं का आरोप था कि वह सब एक ड्रामा था। मनोहरलाल, अपने खिलाफ जारी विरोध से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए हुड्डा के मामले को भावनात्मक टच दे रहे हैं। उनका यह प्रयास हो सकता है कि इससे किसान आंदोलन में प्रदेश सरकार की भूमिका और मंत्रियों की तीखी बयानबाजी पर कुछ हद तक पर्दा डल जाए।
जजपा अभी निश्चिंत है, इसके पीछे कई कारण हैं। यह अलग बात है कि अविश्वास प्रस्ताव से पहले उपमुख्यमंत्री दुष्यंत की सांस फूल गई थी। नतीजा, उन्हें भी व्हिप जारी करना पड़ा। जजपा, अभी प्रदेश में अपने पांव जमा रही है। रविंद्र कुमार के मुताबिक, अगर वह सरकार से बाहर आती है तो उसके हाथ ज्यादा कुछ नहीं लगेगा। खासतौर पर जाट वोटरों का वह हिस्सा उनके पक्ष में आ सकता है, जो अब हुड्डा के साथ है। जजपा नेता दुष्यंत को अपने कैडर वोट बैंक का विरोध खत्म करना आता है। अभी वे उन मुद्दों पर फोकस कर रहे हैं, जिन्हें लेकर वे लोगों के बीच जा सकते हैं।
हाल ही में निजी सेक्टर में राज्य के युवाओं को 75 फीसदी आरक्षण देने को राज्यपाल ने मंजूरी दी है। ये दुष्यंत का ही आइडिया रहा है। वे सामाजिक सुरक्षा के कई दूसरे मसलों पर भी काम कर रहे हैं। कुल मिलाकर, अगले चुनाव में दुष्यंत, लोगों के बीच जाकर अपने कामों की गिनती करा सकें, अभी वे इसी पर सारा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वे कह चुके हैं कि भाजपा और जजपा का गठबंधन अटूट है। यह पूरे पांच साल चलेगा।