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Cyber-Naive: Gen Z डिजिटल दुनिया में फुल स्मार्ट, फिर साइबर खतरों के आगे क्यों हो रहे फेल?

Wed, 02 Sep 2026 05:01 PM IST
रिया दुबे न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Wed, 02 Sep 2026 05:01 PM IST
सार

Gen Z के लिए डिजिटल दुनिया कोई नई चीज नहीं, लेकिन साइबर खतरे अब भी बड़ा गेम हैं। टेक्नोलॉजी चलाने में माहिर यह पीढ़ी कई बार सुरक्षा के बेसिक नियमों में पीछे रह जाती है। ऐसे में एक क्लिक, लिंक या फर्जी ऑफर बड़ा नुकसान करा सकता है। आइए जानते हैं कि क्या कहती है साइबर सेफ्टी को लेकर यह रिपोर्ट।

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Gen Z Is Smart in the Digital World, So Why Are They Still Falling for Cyber Threats?
जेन जी और साइबर सेफ्टी - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

बेबी बूमर्स से मिलेनियल्स तक हर पीढ़ी ने तकनीक को बदलते हुए देखा है। लैंडलाइन फोन से फीचर फोन और फिर टचस्क्रीन स्मार्टफोन तक का सफर इन पीढ़ियों के सामने हुआ। लेकिन Gen Z यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई पीढ़ी ऐसी है, जिसने बचपन से ही डिजिटल दुनिया को अपने आसपास देखा है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शॉपिंग, गेमिंग और डिजिटल पेमेंट इनके रोजमर्रा का हिस्सा हैं। लेकिन सवाल यह है कि डिजिटल दुनिया से इतने सहज Gen Z क्या साइबर खतरों को पहचानने में भी उतने ही माहिर हैं?

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Kaspersky के इंटरनल मार्केट रिसर्च सेंटर की स्टडी के मुताबिक, भारत में 67 फीसदी Gen Z खुद को डिजिटल माहौल में आसानी से नेविगेट करने में कॉन्फिडेंट मानते हैं। यानी एप्स चलाने से लेकर सोशल मीडिया और ऑनलाइन सर्विसेज इस्तेमाल करने तक उन्हें ज्यादा परेशानी नहीं होती।
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लेकिन डिजिटल सुरक्षा की बात आती है तो तस्वीर थोड़ी अलग दिखती है। APAC यानी एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में सिर्फ 26 फीसदी Gen Z का मानना है कि उन्हें डिजिटल खतरों और ऑनलाइन सुरक्षा उपायों की एडवांस जानकारी है। भारत में यह आंकड़ा 35 फीसदी है। इंडोनेशिया में 28 फीसदी, मलेशिया में 28 फीसदी, वियतनाम में 24 फीसदी, थाईलैंड में 23 फीसदी और चीन में सिर्फ 10 फीसदी Gen Z ने डिजिटल सुरक्षा की एडवांस जानकारी होने की बात कही।

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डिजिटल इस्तेमाल में आगे, सुरक्षा में पीछे

स्टडी के मुताबिक, Gen Z के बीच डिजिटल सुरक्षा की आदतें भी उतनी मजबूत नहीं हैं। APAC में सिर्फ 22 फीसदी Gen Z अपने मोबाइल में एंटीवायरस सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करते हैं। यह हिस्सा मिलेनियल्स में 31 फीसदी, Gen X में 28 फीसदी और बेबी बूमर्स में 43 फीसदी है।


पासवर्ड बदलने के मामले में भी Gen Z पीछे है। सिर्फ 35 फीसदी Gen Z ने बताया कि वे नियमित रूप से अपना पासवर्ड बदलते हैं। वहीं मिलेनियल्स में यह आंकड़ा 48 फीसदी, Gen X में 50 फीसदी और बेबी बूमर्स में 53 फीसदी है। यानी Gen Z को नई टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करना आता है, लेकिन उसे सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल करने की आदत अभी उतनी मजबूत नहीं है।

Gen Z Is Smart in the Digital World, So Why Are They Still Falling for Cyber Threats?
क्या कहते हैं आंकड़े? - फोटो : Amar Ujala

फोन में ही है सबसे जरूरी निजी जानकारी

आज स्मार्टफोन सिर्फ कॉल और मैसेज करने का जरिया नहीं है। इसमें हमारी तस्वीरें, जरूरी दस्तावेज, बैंकिंग से जुड़ी जानकारी, पासवर्ड और सोशल मीडिया अकाउंट्स की डिटेल तक मौजूद रहती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में 38 फीसदी Gen Z अपने फोन में मौजूद फोटो और निजी दस्तावेजों को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। वहीं 30 फीसदी के लिए पासवर्ड और लॉगिन क्रेडेंशियल बेहद महत्वपूर्ण हैं। यही वजह है कि अगर फोन या किसी ऑनलाइन अकाउंट तक किसी साइबर अपराधी की पहुंच हो जाए तो नुकसान सिर्फ सोशल मीडिया अकाउंट तक सीमित नहीं रहता।

90 फीसदी Gen Z झेल चुके हैं साइबर घटना

स्टडी में APAC के 90 फीसदी Gen Z ने बताया कि उन्होंने पिछले एक साल में कम से कम एक साइबर घटना का सामना किया। यह आंकड़ा मिलेनियल्स के बराबर है। इन घटनाओं में सोशल मीडिया अकाउंट हैक होना, निजी डेटा लीक होना, ऑनलाइन स्कैम, निवेश से जुड़ी धोखाधड़ी और गेमिंग अकाउंट का एक्सेस खोना शामिल रहा।

रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल दुनिया से परिचित होना और साइबर सुरक्षा में एक्सपर्ट होना एक ही बात नहीं है। किसी एप या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को आसानी से चला लेना इस बात की गारंटी नहीं देता कि यूजर फर्जी लिंक, स्कैम या डेटा चोरी जैसे खतरे पहचान पाएगा।

ऑनलाइन फ्रॉड से बचने के लिए क्या करें?

अगर कोई खुद को पुलिस, इनकम टैक्स विभाग, बैंक या मोबाइल कंपनी का अधिकारी बताकर कॉल करे और अकाउंट बंद होने या जब्त होने का डर दिखाए तो घबराएं नहीं। कॉल काटकर संबंधित बैंक या विभाग से सीधे संपर्क करें। नेट बैंकिंग और दूसरे जरूरी अकाउंट्स के पासवर्ड समय-समय पर बदलते रहें।

WhatsApp, मैसेंजर या सोशल मीडिया पर आए किसी अनजान लिंक से APK या कोई एप डाउनलोड न करें। बैंकिंग एप जैसा दिखने वाला फर्जी एप भी आपके फोन में मैलवेयर पहुंचा सकता है। ऑनलाइन मिलने वाले ऐसे इनाम, नौकरी या ऑफर से सावधान रहें जो जरूरत से ज्यादा अच्छे लगें। ऐसे ऑफर आपकी निजी जानकारी हासिल करने का जाल हो सकते हैं।

एप हमेशा Google Play Store, Apple App Store या संबंधित आधिकारिक स्टोर से ही डाउनलोड करें। डाउनलोड करने से पहले एप के रिव्यू और यूजर फीडबैक भी जरूर देखें। अपने स्मार्टफोन, टैबलेट और कंप्यूटर को लेटेस्ट ऑपरेटिंग सिस्टम और सिक्योरिटी अपडेट के साथ अपडेट रखें। जरूरत के मुताबिक भरोसेमंद एंटीवायरस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करें।

भारत में अगर आप ऑनलाइन फ्रॉड का शिकार हो जाते हैं तो तुरंत 1930 पर कॉल करें। बैंक ट्रांजैक्शन की जानकारी देने से संबंधित खातों पर कार्रवाई और पैसे को रोकने की कोशिश की जा सकती है। जितनी जल्दी शिकायत की जाएगी, पैसे को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की संभावना उतनी बेहतर होगी।

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