Fact Check: 2017 के पत्थरबाजी के वीडियो को अभी का बताकर सांप्रदायिक रंग देने की हो रही कोशिश, पढ़ें पड़ताल
Fact Check: सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया जा रहा है, वीडियो में लोग पत्थरबाजी करते हुए नजर आ रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि यह नोएडा की एक सोसाइटी का हालिया वीडियो है। हमारी पड़ताल में यह वीडियो आठ साल पुराना निकला है।
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विस्तार
सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया जा रहा है। इस वीडियो में दिख रहा है कि लोग एक दूसरे पर पत्थरबाजी कर रहे हैं। वीडियो में कुछ गार्ड पत्थर फेंकते हुए नजर आ रहे हैं। वीडियो को शेयर करके दावा किया जा रहा है कि यह वीडियो नोएडा की पॉश कॉलोनी महागुन सोसाइटी का है। यहां बांग्लादेशी बस्ती में रहने वाले लोगों ने सोसाइटी में हमला बोल दिया है।
अमर उजाला ने अपनी पड़ताल में इस दावे को गलत पाया है। हमारी पड़ताल में यह सामने आया है कि वीडियो 2017 का है। वीडियो को गलत सांप्रदायिक दावे को साथ अभी शेयर किया जा रहा है। यह मामला नोएडा के सेक्टर 78 महागुन सोसायटी में काम करने वालों के द्वारा हमला किए जाने का था। आरोप है कि एक फ्लैट मालिक ने काम करने वाली एक नौकरानी को बंधक बनाकर उसकी पिटाई कर दी। इसके बाद बाकी काम करने वालों ने सोसाइटी में घुसकर पत्थरबाजी की थी।
क्या है दावा
इस वीडियो को शेयर करके दावा किया जा रहा है कि नोएडा की पॉश कालोनी महागुन सोसाइटी। एक परिवार जिसके यहां एक बांग्लादेशी मुस्लिम महिला घरेलू नौकरानी का काम करती थी। उस पर चोरी करने का आरोप था। महिला घर वापस गई और बांग्लादेशी बस्ती से लोगों को बुलाकर लाई और सोसाइटी में हंगामा कर दिया।
पड़ताल
इस दावे की पड़ताल करने के लिए हमने वीडियो के कीफ्रेम्स को गूगल रिवर्स इमेज पर सर्च किया। यहां हमें इस वीडियो से जुड़ी रिपोर्ट एबीपी न्यूज पर देखने को मिली। इस रिपोर्ट को 12 जुलाई 2017 के प्रकाशित किया गया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि “नोएडा के सेक्टर 78 स्थित महागुन मॉडर्न सोसाइटी में एक बड़ी हिंसा भड़क उठी, जब एक निवासी ने कथित तौर पर एक नौकरानी की पिटाई कर दी। खबरों के अनुसार, सोसाइटी के निवासियों ने कथित तौर पर नकदी चुराने के आरोप में नौकरानी पर हमला किया। इससे उसके रिश्तेदार और आसपास रहने वाले गुस्साए ग्रामीण सुबह 7 बजे परिसर में इकट्ठा हो गए और लाठी-डंडों और ईंटों के साथ सोसाइटी में घुस गए।”
हमारी पड़ताल में यह साफ है कि वीडियो 2017 का है। जिसे अभी भ्रामक दावे के साथ शेयर किया जा रहा है। साथ ही रिपोर्ट में किसी बांग्लादेशी बस्ती से लोगों के बारे में जानकारी नहीं मिली।