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विचार: स्वाद की विरासत को मिली वैश्विक उड़ान

Thu, 01 Oct 2026 07:35 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र राज कुमार भगत
राज कुमार भगत Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 01 Oct 2026 07:35 PM IST
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Uttar Pradesh Food Culture from Lucknow To Varanasi and Kannauj to Agra Tradition Promotion Opinion Article
आपका शहर किस स्वाद के लिए मशहूर? - फोटो : AI
शिलालेख घिस जाते हैं, इमारतें जर्जर हो जाती हैं, पर स्वाद पीढ़ियों के हाथों से होकर आगे बढ़ता रहता है। उत्तर प्रदेश के पास स्वाद भरे व्यंजनों की विरासत का अकूत खजाना है। बनारस की मलाईयो, लखनऊ की चाट, आगरा का पेठा, मथुरा का पेड़ा, कन्नौज का गुलाब जल, हाथरस की हींग, ये व्यंजन नहीं, इतिहास के जीवित दस्तावेज हैं। अब तक ये गली-मोहल्लों, मेलों और यात्रियों की स्मृतियों तक सिमटे रहे। पहली बार इन्हें वैश्विक व्यापार की मेज पर पूरी गंभीरता के साथ रखा गया है। यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो में 'वन डिस्ट्रिक्ट-वन कुजीन' (ODOC) को केंद्र में रखकर योगी सरकार ने एक स्पष्ट संदेश दिया है-‘विरासत बोझ नहीं, पूंजी है और परंपरा पिछड़ेपन की निशानी नहीं, आत्मनिर्भरता की नींव है।’
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यह संदेश उस बड़ी सोच का विस्तार है, जिसकी शुरुआत वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) से हुई थी। सरकार का मूल तर्क सीधा है। जब किसी जिले की पहचान को ब्रांड, बाजार और नीतिगत सहारा मिलता है, तो कारीगर का हुनर उद्योग बन जाता है और स्थानीय उत्पाद वैश्विक वस्तु। 'वोकल फॉर लोकल' का नारा यहां 75 जिलों के उद्यमियों के लिए व्यावहारिक कार्ययोजना का रूप ले लेता है। ट्रेड शो में 90 देशों से पहुंचे 600 से अधिक खरीदारों ने यूपी के ‘वोकल फार लोकल’ की इसी ताकत को देखा।
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ओडीओसी में व्यापार की असीम संभावनाएं हैं। पूरी दुनिया में प्रामाणिक और  प्राकृतिक खाद्य उत्पादों की मांग बढ़ रही है। प्रवासी भारतीयों की विशाल आबादी, भारतीय खान-पान की बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता और प्रीमियम व ऑर्गेनिक उत्पादों के प्रति उपभोक्ताओं का रुझान, ये तीनों कारक ओडीओसी के पक्ष में खड़े हैं। खाड़ी देशों से लेकर यूरोप और उत्तरी अमेरिका तक, खरीदार अब केवल स्वाद नहीं, प्रामाणिकता और भरोसा खरीदना चाहता है। उत्तर प्रदेश के व्यंजनों के पास ये दोनों हैं और वे अब मानकीकरण, बेहतर पैकेजिंग और कुशल लॉजिस्टिक्स की ओर बढ़ रहे हैं। जेवर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे और एक्सप्रेसवे नेटवर्क जैसा बुनियादी ढांचा इसमें रीढ़ साबित होगा। ओडीओसी में व्यापार की संभावनाओं को इस नजरिए से भी देखा जा सकता है कि ओडीओपी में जिन उत्पादों को जीआई टैग मिला है, उनमें बड़ी संख्या खाद्य पदार्थों की भी है।

जैसे कि ओडीओपी ने पारंपरिक पहचान को संगठित रूप और बाजार दिया है, ताले, कालीन, चिकनकारी और मृद्भांड जैसे शिल्पों को नई सांस मिली है, ओडीओसी उसी सूत्र को खान-पान की दुनिया में लागू करने का प्रयास है। अभी तक ओडीओसी की पहुंच स्थानीय मेलों, पर्यटकों और क्षेत्रीय बाजारों तक सीमित थी। यूपीआइटीएस ने इस दायरे को तोड़ने की कोशिश की है।
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वैश्विक बाजार में केवल बेहतरीन स्वाद के भरोसे टिका नहीं जा सकता। वहां मानकीकरण, सुरक्षा और निरंतरता की कसौटी पर हर उत्पाद परखा जाता है। इसी को ध्यान में रखकर उत्तर प्रदेश सरकार और एमएसएमई विभाग एक समग्र सहायता ढांचा तैयार कर रहे हैं, जो चार स्तंभों पर टिका है। इनमें पहला स्तंभ पैकेजिंग और शेल्फ-लाइफ का है। पारंपरिक मिठाइयों की लंबी यात्रा में सबसे बड़ी बाधा उनका जल्दी खराब होना है। सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजी रिसर्च इंस्टीट्यूट (CFTRI)  के सहयोग से ऐसी तकनीकें उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिनसे उत्पाद बिना हानिकारक प्रिजर्वेटिव के महीनों तक ताज़ा रह सकते हैं। दूसरा स्तंभ वैश्विक मानक और प्रमाणन का है। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रवेश के लिए भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक (एफएसएसएआई) के साथ HACCP (हेजार्ड एनालिसिस क्रिटिकल कंट्रोल प्वाइंट), आईएसओ प्रमाणन और ऑर्गेनिक या जीआई टैगिंग जरूरी है। स्थानीय कारीगरों, हलवाइयों और प्रसंस्करण इकाइयों को इसके लिए वित्तीय और तकनीकी मार्गदर्शन दिया जा रहा है, क्योंकि विदेशी खरीदार भरोसे पर नहीं, प्रमाणपत्र पर सौदा करता है।
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तीसरा स्तंभ ब्रांडिंग और डिजिटल मार्केटिंग का है। आज का उपभोक्ता वस्तु के साथ उसके पीछे की कहानी भी खरीदता है। क्यूआर कोड-आधारित पैकेजिंग से वह उत्पाद के स्रोत, सामग्री और प्रामाणिकता की जानकारी सीधे पा सकेगा। चौथा और सबसे निर्णायक स्तंभ निर्यात सहायता और लॉजिस्टिक्स का है। निर्यात प्रक्रियाओं का सरलीकरण, एक्सपोर्ट क्रेडिट सब्सिडी और कोल्ड-चेन ढांचे का सुदृढ़ीकरण इसके मुख्य अंग हैं। 

इसमें चुनौतियां भी कम नहीं हैं। ऋण, सब्सिडी और प्रशिक्षण का सरल होना अनिवार्य है। प्रामाणिकता, मानकीकरण और निरंतरता पर भी ध्यान देना होगा। एक बार का निर्यात ऑर्डर उपलब्धि है, पर नियमित आपूर्ति ही विश्वसनीयता बनाती है, जिसके लिए कच्चे माल की स्थिर उपलब्धता, गुणवत्ता नियंत्रण और मजबूत कोल्ड-चेन जरूरी है। इन चुनौतियों के बावजूद ओडीओसी की सामाजिक-आर्थिक क्षमता को कम नहीं आंका जा सकता। 

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक राज कुमार भगत, चैंबर ऑफ फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज (सीएफपीआईए) के अध्यक्ष हैं।)
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