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विचार: दक्षता एवं प्रबंधन का बेमिसाल संगम है दीपोत्सव

Sat, 31 Oct 2026 12:48 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र हरि शंकर मिश्र
हरि शंकर मिश्र Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 31 Oct 2026 12:48 PM IST
सार

2017 में पहले दीपोत्सव में इक्यावन हजार दीये जले थे। इसके बाद वर्ष प्रतिवर्ष यह संख्या बढ़ती गई और विश्व कीर्तिमान बनाने के साथ लोगों में मन में रचती-बसती चली गई। 

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Ayodhya Deepotsav Yogi Govt Uttar Pradesh Diwali Opinion Article
दीपोत्सव में राम की पैड़ी पर जले दीप के बीच लेजर शो का दृश्य- फाइल फोटो

विस्तार

अयोध्या में मनाए जाने वाले का यह 10वां संस्करण है। इस बार लक्ष्य तीस लाख दीयों का है। जिस नगरी की मिट्टी में रामराज की स्मृति रची-बसी है, वहां जलने वाला हर दीपक उसी आदर्श का प्रतीक है। इसे देखकर कहा जा सकता है कि जहां प्रशासनिक इच्छाशक्ति और कुशल प्रबंधन साथ चलते हैं, जहां आस्था को व्यवस्था की साधना मिलती है, वहां रामराज की कल्पना केवल कथा नहीं रहती, कार्यपद्धति बनने लगती है, कार्यशैली बनने लगती है।
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2017 में पहले दीपोत्सव में इक्यावन हजार दीये जले थे। इसके बाद वर्ष प्रतिवर्ष यह संख्या बढ़ती गई और विश्व कीर्तिमान बनाने के साथ लोगों में मन में रचती-बसती चली गई। सरयू तट और राम की पैड़ी में जलते दीपों की छवि आंखों में बसाने के लिए हर साल लाखों श्रद्धालु यहां आते हैं। दीपों का बढ़ता ग्राफ संयोग नहीं है। यह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राम के प्रति आस्था और उनके कुशल नेतृत्व का परिणाम है। प्रशासनिक दक्षता और कुशल प्रबंधन का जीवंत रूप यहां देखने को मिलता है। 
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वस्तुतः रामराज की सबसे पहली कसौटी ही सुव्यवस्था है। रामकथा में अयोध्या का वर्णन ऐसे नगर के रूप में आता है जहां प्रजा निश्चिंत है, क्योंकि राज्य अपना दायित्व जानता है। इसी कसौटी पर दीपोत्सव की तैयारियों को देखिए। इस बार दीयों की व्यवस्था छप्पन घाटों पर होगी, जबकि पहले यह पचपन घाटों तक सीमित थी। दीयों को एक समान पंक्तियों में सजाने के लिए ब्लॉक आधारित लेआउट अपनाया जाता है और मार्किंग का काम तीन-चार दिन में पूरा करने का लक्ष्य है। तीस लाख दीये किसी मैदान में ढेर नहीं लगाए जाते। उन्हें सीढ़ी-दर-सीढ़ी, पंक्ति-दर-पंक्ति इस तरह रखना होता है कि संध्या को वे एक अखंड ज्योति-रेखा बन जाएं। यह ज्यामिति, तालमेल और समय-प्रबंधन की साधना है।

इस पूरे आयोजन में दूरदर्शिता का एक सबल पक्ष है। लक्ष्य तीस लाख का है, पर तैंतीस लाख दीये मंगवाए गए हैं, ताकि परिवहन में टूटने वाले दीयों की भरपाई हो सके। यह संकट के बाद उसे सुलझाने वाली नहीं, संकट से पहले उसका हिसाब लगा लेने वाली सोच है। रामराज का एक सूत्र यही है कि शासन वही श्रेष्ठ, जो प्रजा को कठिनाई आने से पहले उसकी चिंता कर ले। सुशासन की पहचान अक्सर ऐसे ही अदृश्य निर्णयों में छिपी होती है, जिनके कारण कुछ गड़बड़ होती ही नहीं।
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रामराज की दूसरी कसौटी सहभागिता है। राम का राज्य वह था, जिसमें निषादराज, शबरी, वानर और रीछ सब अपने को उसका भागीदार समझते थे। इस आयोजन में भी वही भाव दिखता है। तीस डिग्री कॉलेजों, चालीस इंटरमीडिएट कॉलेजों और विश्वविद्यालय परिसर से लगभग पैंतीस हजार स्वयंसेवक तैनात होंगे। उन्हें घाटवार जिम्मेदारियां दी जाएंगी, प्रशिक्षण के साथ पहचान पत्र मिलेंगे। विश्वविद्यालय और जिला प्रशासन मिलकर दीयों, घाट प्रबंधन, स्वयंसेवकों की तैनाती और सुरक्षा मानकों की व्यवस्था संभाल रहे हैं। जो विद्यार्थी आज घाट पर दीपक सजाता है, वह इस उत्सव का दर्शक नहीं, रचयिता है। शिक्षा संस्थान, प्रशासन और समाज का यह त्रिकोण बताता है कि शासन यहां ऊपर से आदेश देने वाली मशीन नहीं, सबको साथ लेकर चलने वाला संयोजक है। नई पीढ़ी के हाथों में दीपक रखना, यानी उसे यह सिखाना कि समाज की रोशनी सबके साझे प्रयास से जलती है, रामराज की सबसे सुंदर शिक्षा है।
 
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इसके पीछे का आध्यात्मिक भाव दीपक की लौ में ही है। दीपावली का मूल संदेश अंधकार पर प्रकाश की विजय है, उस प्रार्थना का साकार रूप जिसमें साधक अंधकार से ज्योति की ओर ले जाने की याचना करता है। अयोध्या में यह भाव दोहरी गहराई पा लेता है। यही वह भूमि है जहां चौदह वर्ष के वनवास के बाद राम लौटे थे और नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर अपना हर्ष प्रकट किया था। उस दिन का उजाला केवल राजा के लौटने का उत्सव नहीं था। वह इस विश्वास का उत्सव था कि अब धर्म, न्याय और मर्यादा का शासन लौटेगा। सदियों की प्रतीक्षा के बाद रामलला जब अपने भव्य मंदिर में विराजे, तब वह स्मृति जीवित वर्तमान बन गई। तुलसीदास ने रामराज का जो चित्र खींचा है, वहां दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं सताते। वह आदर्श आज भी प्रासंगिक है और उच्चस्तरीय शासकीय व्यवस्था का पैमाना भी है।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई जानकारी और तथ्यों के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। लेखक हरि शंकर मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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