'पंचायत' फेम सुनीता राजवार बोलीं- ‘औरतों को खुद को बेचारा समझना बंद करना होगा’, सिनेमा में बराबरी पर रखी बात
Womens Equality Day: आज 26 अगस्त को महिला समानता दिवस है। ऐसे में बात सिर्फ इस सवाल की नहीं कि महिलाओं को बराबरी मिली या नहीं, बल्कि यह भी है कि उन्हें किस तरह की जगह और सम्मान मिल रहा है। अमर उजाला से खास बातचीत में अभिनेत्री सुनीता राजवार ने भी अपने विचार रखे।
विस्तार
वेब सीरीज ‘पंचायत’ और ‘गुल्लक’ फेम अभिनेत्री सुनीता राजवार मानती हैं कि फिल्म इंडस्ट्री में बदलाव आया है, लेकिन महिलाओं के किरदारों को लेकर अभी भी काफी कुछ बदलना बाकी है। उन्होंने और क्या कहा? जानिए
‘महिलाओं का सम्मानजनक रोल होना चाहिए’
अमर उजाला से बातचीत के दौरान सुनीता कहती हैं, ‘देखिए, महिलाओं के किरदारों को लेकर अब बदलाव जरूर आया है। इसमें कोई दोराय नहीं है। अब सिनेरियो बहुत बदल गया है। ‘मर्दानी’, ‘पिंक’, ‘कहानी’ जैसी फिल्में बनी हैं, जिनमें औरतों का रोल मेजर रहा है। वो सिर्फ एक प्रोडक्ट की तरह यूज नहीं हुई हैं। ये अच्छा बदलाव है। लेकिन अभी भी फिल्मों में महिलाओं को बेहतर और सम्मानजनक किरदार मिलने चाहिए।’
वह आगे कहती हैं, ‘कुछ फिल्में थोड़ी और अच्छी बननी चाहिए। स्टोरी में एक सम्मानजनक रोल होना चाहिए। कुछ भी फालतू का गाना हो, आइटम सॉन्ग हो और उसमें दो-चार सीन हों, ऐसा नहीं होना चाहिए। महिलाओं का भी कहानी में कोई अच्छा रोल होना चाहिए।’
‘अभी भी ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो हमें नहीं मिलतीं..'
इंडस्ट्री में मिलने वाली सुविधाओं को लेकर सुनीता कहती हैं, 'सच्चाई ये है कि कोई भी एक्टर जब बेसिक से शुरू करता है, तो उसे वो सब नहीं मिलता जो एक बड़े या पॉपुलर एक्टर को मिलता है। जब आप थोड़ा बड़े या पॉपुलर हो जाते हैं तो आपको वो सारी चीजें मिलने लगती हैं। मेरे साथ भी यही हुआ है।
अभी भी ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो हमें नहीं मिलतीं, लेकिन थोड़ा और बड़े हो जाएंगे तो वो भी मिलने लगेंगी। ये सिर्फ फीमेल वाली बात नहीं है। कोई मेल एक्टर भी नया है तो उसे भी ये सब नहीं मिलेगा। जब आप किसी मुकाम पर पहुंच जाते हो, उसके बाद ही सब मिलता है।’
‘रिस्पेक्ट और पेमेंट में बराबरी होनी चाहिए’
महिलाओं के सम्मान और भुगतान पर सुनीता कहती हैं, ‘जिस तरह से आदमियों को रिस्पेक्ट मिलती है, जिस तरह से उनका सैलरी या पेमेंट होता है, वैसे ही होना चाहिए। लेकिन अगर उनका मार्केट होगा तो उनको मिलता है।
‘उदाहरण के तौर पर, सुना है श्रीदेवी जी को लड़कों से ज्यादा, आदमियों से ज्यादा मिलता था। तो मुझे लगता है, आप कहां पर हैं, उस हिसाब से सारी चीजें होती हैं।’
‘औरतों को खुद को बेचारा समझना बंद करना पड़ेगा’
महिलाओं की बराबरी को लेकर सुनीता कहती हैं, 'मुझे लगता है औरतों को अपने आप को बेचारा समझना बंद करना पड़ेगा। समाज तो हम बनाते हैं न। औरतों को खुद को सक्षम समझना होगा और अपना नजरिया बदलना होगा।
‘नए कलाकार के साथ व्यवहार में फर्क दिखता है’
अपने शुरुआती दिनों का उदाहरण देते हुए वह कहती हैं, 'जब मैं छोटे किरदार करती थी, दो-तीन दिन के लिए काम होता था, तो मेरा ध्यान इस बात पर नहीं जाता था कि मेरे साथ कौन कैसा व्यवहार कर रहा है या क्या कह रहा है। लेकिन जो अंतर होता है, वह तो दिखाई देता ही है। जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते हैं, आपको समझ आने लगता है कि ये चीजें क्यों होती हैं।
शुरुआत में लगता है कि हम तो दो दिन के कलाकार हैं, हमें अच्छा कमरा नहीं दिया। लेकिन जब उसी फिल्म में लगातार काम करने लगते हैं तो समझ आता है कि ऐसा सिर्फ मेरे साथ नहीं हो रहा था। जो भी नया कलाकार आएगा और एक-दो दिन के लिए काम करेगा, उसके साथ ऐसा ही व्यवहार होगा।’
‘बराबरी अपनी मानसिकता में लानी होगी’
वह आगे कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि बराबरी हमें अपनी मानसिकता में लानी है। बराबरी तो है ही। दो हाथ-पैर सबके होते हैं, शरीर से सब एक जैसे हैं। प्रकृति ने तो सभी को बराबर बनाया है। अब हम अपनी मानसिकता से ही अपने आपको कम या ज्यादा आंकते हैं। मुझे लगता है कि हमें सबको समान नजर से देखना होगा, सबको बराबर समझना होगा।’
मुझे लगता है कि बराबरी हमें अपनी मानसिकता में लानी है। बराबरी तो है ही। दो हाथ-पैर सबके होते हैं, शरीर से सब एक जैसे हैं। प्रकृति ने तो सभी को बराबर बनाया है। अब हम अपनी मानसिकता से ही अपने आपको कम या ज्यादा आंकते हैं। मुझे लगता है कि हमें सबको समान नजर से देखना होगा, सबको बराबर समझना होगा।’