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इडियट बॉक्स पर विज्ञापनों में अश्लीलता की होड़
अनुराधा गोयल
Updated Tue, 06 Nov 2012 12:35 PM IST
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एक समय था जब बुद्घू बक्से पर परिवार नियोजन जैसे विज्ञापन आते ही व्यक्ति असहज हो जाया करता था। लेकिन आज के समय में खुलेपन की आंधी ने दुनिया को बहुत बदल दिया है।
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अब टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में अभद्रता, अश्लील भाषा, महिलाओं का अश्लील चित्रण, सेक्स उत्तेजना और नग्नता इत्यादि को भरपूर भुनाया जा रहा है। यही कारण है कि आए दिन इडियट बॉक्स पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों का ना सिर्फ आमजन विरोध करने लगा है बल्कि विज्ञापन बनाने वाली कंपनियां भी कटघरे में खड़ी दिखाई पड़ रही है।
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हाल ही में प्रसारित महिलाओं के निजी अंगों को गोरा और तरोताजा बनाए रखने का दावा करने वाले विज्ञापन ने नई बहस छेड़ दी है। इस एड की भरपूर निंदा की गई। यहां तक कि इस विज्ञापन को लेकर संसद तक में बवाल भी मचा। लेकिन सोचने वाली बात है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। क्यों एड एजेंसियां एडवर्टाइज़मेंट स्टेंडर्ड काउंसिल ऑफ़ इंडिया (एएससीआई) के नियमों का पालन करने में चूक कर जाती है।
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भारत और विदेशों में प्रतिबंधित विज्ञापन
एक्स इफेक्ट, ज़टाक डेंटिस्ट, सेट वेट डियोडरेंट, टफ शू, अमूल माचो और लक्स कोजी अंडरवियर, फ्लाइंग मशीन जींस, द वाइल्ड स्टोन डियोडरेन्ट, टॉम फोर्ड, डोल्स एंड गबाना, द रिनॉल्ट ट्विन्गो और बियोंस का परफ्यूम हीट।
भारत में विज्ञापनों के प्रतिबंध का कारण
जूते के विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने का कारण नायक और नायिका का बिना कपड़ों के केवल जूते पहनना और एक सांप के साथ पोज देने के कारण इस विज्ञापन को बंद किया गया। ठीक इसी तरह से अंडरवियर के विज्ञापनों को बहुत ही अश्लील और उत्तेजक दिखाया गया था। जिससे इन विज्ञापनों को बंद करने का नोटिस भी दिया गया।
जींस का विज्ञापन इसीलिए बंद कर दिया गया क्योंकि टाइट जींस पहने महिला के बैक पर लिखा था व्हाट एन एस! जो कि महिलाओं के लिए एक बेहद आपत्तिजनक विज्ञापन माना गया।
डियोड्रेंट के विज्ञापनों को बेहद उतेजक दिखाया जाता है और एक विज्ञापन में तो एक महिला एक डियोड्रेंट उपयोगकर्ता के लिए अपने कपड़ों को उतारने लगती है। इसी कारण से इन विज्ञापनों पर बैन लगा दिया गया।
भारत में नवयुवकों को तंबाकू, सिगरेट और शराब की लत से बचाने के लिए सिगरेट और शराब इत्यादि के विज्ञापनों पर पहले ही प्रतिबंध लग चुका है।
कहने का अर्थ है कि जिन विज्ञापनों से बहुत अधिक अश्लीलता, उत्तेजना और महिलाओं के लिए अपमानजनक स्थिति होती है, ऐसे विज्ञापनों पर ही मुख्य रूप से प्रतिबंध लगता है। हालांकि कई बार इन विज्ञापनों में दृश्य अश्लील नहीं होते लेकिन उनका अर्थ अपमानजनक होता है।
क्या कहते हैं सेलिब्रिटी
कई मशहूर विज्ञापन बना चुके प्रह्लाद कक्कड़ की माने तो डियोड्रेंट जैसे विज्ञापनों में अगर मजाक या नटखटपन दिखाई देता है तो ये बुरा नहीं है।
वहीं अभिनेत्री पूजा बेदी के मुताबिक विज्ञापनों में सिर्फ महिलाओं की ही नहीं बल्कि पुरूषों की सेक्स अपील को भी इस्तेमाल किया जाता है।
पिछले दो सालों के आंकड़े
एडवर्टाइजमेंट स्टेंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया के सेक्रेटरी के मुताबिक 2011-2012 में लगभग 180 विज्ञापनों को लेकर लगभग 2000 शिकायतें दर्ज हुई है। इतना ही नहीं सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 2011 में मनोरंजन चैनलों को 25 नोटिस जारी किए थे। जबकि 2010 में केवल 13 नोटिस ही जारी किए गए थे।
बच्चों पर पड़ने वाला बुरा असर
एसोचैम के एक सोशल डेवलपमेंट फाउंडेशन में एक सर्वेक्षण किया गया जिसमें पाया गया कि 6-17 साल के युवा सप्ताह भर में लगभग 35 घंटे टीवी देखते है। जिससे टीवी में दिखाए जा रहे एडल्ट कंटेंट से बच्चों पर नकारात्मक असर पड़ता है। लेकिन कई बार ऐसा भी होता है कि विज्ञापनों में अश्लीलता ना होने के बाद भी विज्ञापनों का विरोध शुरू हो जाता है।
ऐसा ही वोडाफोन के दो बच्चों वाले विज्ञापन का भी विरोध हुआ। इस एड का विरोध इसीलिए नहीं हुआ कि इसमें कुछ अश्लीलता है बल्कि एड में दिखाए जा रहे बच्चे किशोर भी नहीं है। अभिनेत्री शबाना आजमी ने ट्विटर पर इस विज्ञापन पर विरोध जताया था। जिसमें उन्होंने लिखा था, जितनी यह बात तो सच है कि प्यार की कोई उम्र नहीं होती उतनी ही यह बात भी सच है कि रोमांस की उम्र वह नहीं।
ये बात सच है कि भारतीय समाज बड़ी तेजी से बदल रहा है और उसमें खुलापन आ रहा है। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सच है कि छोटे परदे पर परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर इस तरीके के विज्ञापन देखना कहीं ना कहीं हमारी संस्कृति के खिलाफ दिखाई पड़ता है। इसीलिए इस तरह के विज्ञापन या इस तरह की फिल्मों को छोटे परदे पर दिखाए जाने का विरोध होता है।