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Samwad 2025: डायलॉग सर के हिसाब से होगा या किरदार के? संवाद में दिव्य प्रकाश दुबे ने सुनाया मजेदार किस्सा

Sat, 19 Apr 2025 12:50 PM IST
सुवेश शुक्ला एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: सुवेश शुक्ला Updated Sat, 19 Apr 2025 12:50 PM IST
सार

Divya Prakash Dubey: 17 अप्रैल  को अमर उजाला संवाद के मंच पर  ‘छोरी 2’ की अभिनेत्री नुसरत भरूचा, निर्देशक विशाल फुरिया और फिल्म के डायलॉग राइटर दिव्य प्रकाश दुबे ने शिरकत की। इस दौरान फिल्म के डायलॉग राइटर दिव्य प्रकाश दुबे ने फिल्मों में एक्टर के हिसाब से डायलॉग लिखने को लेकर अपने विचार रखें। पढ़ते हैं उन्होंने क्या कहा…
 

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दिव्य प्रकाश दुबे - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

साल 2025 के दो दिवसीय अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में हालिया रिलीज फिल्म ‘छोरी 2’ की अभिनेत्री नुसरत भरूचा, निर्देशक विशाल फुरिया और फिल्म के डायलॉग राइटर दिव्य प्रकाश दुबे ने शिरकत की। 17-18 अप्रैल तक चले इस संवाद कार्यक्रम में उन्होंने अपनी फिल्म ‘छोरी 2’ पर चर्चा की। इस दौरान फिल्म के डायलॉग राइटर दिव्य प्रकाश दुबे ने फिल्म के डायलॉग लिखने को लेकर अपने विचार रखें। पढ़ते हैं उन्होंने क्या कहा…

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दिव्य प्रकाश दुबे और विशाल फुरिया - फोटो : इंस्टाग्राम @authordivyaprakash

‘सर के हिसाब से डायलॉग होगा?'
फिल्म के डायलॉग राइटर से जब पूछा गया कि कितना मुश्किल हो जाता है जब आप किसी एक्टर के लिए सोच कर डायलॉग लिखें, जो पहले से किसी फ्रेम में फिट है? इसके जवाब में दिव्य प्रकाश दुबे ने एक किस्सा सुनाते हुए कहा, ‘मैं प्रोजेक्ट का नाम नहीं ले सकता। मैंने एक स्क्रिप्ट लिखी हुई थी। उसके हिसाब से कैरेक्टर की पूरी दुनिया बनी हुई थी। फिर अचानक से एक दिन फीडबैक आया कि सर के हिसाब डायलॉग कर दिजिए। मैंने कहा सर के हिसाब से डायलॉग होगा कि कैरेक्टर के हिसाब से होगा? एक लेखक के तौर पर मुझे लगता है कि जो कैरेक्टर आपने बनाया है। उसके लिए लड़ना चाहिए कि वो किरदार किस तरह बोलेगा।’

दिव्य ने आगे कहा, ‘कई बार ऐसा होता है कि हम उसे लेकर सही नहीं होते, क्योंकि जब कोई पहली बार उस किरदार को जी रहा होता है, जब वह उसमें ढल जाता है तो उसे मालूम होने लगता है कि मैं यहां ये बोल सकता हूं और ये नहीं। तो ये अच्छी बात है कि आप उनकी बात भी सुनें। फिर प्रोजेक्ट के लिए एक रास्ता निकालें। कई बार इससे सीखने को भी मिलता है। कई बार वह फीडबैक बहुत सही होते हैं। कई लोगों को पता होता है कि वह कैसे डायलॉग बोलेंगे तो तालियां बजेंगी। वो एक खास तरीके से एंट्री लेंगे तो लोगों को पसंद आएगा।
जैसे एक बार मैंने एक फिल्म की थी ‘पोन्नियन सेल्वन’। मणिरत्नम सर के साथ। उसमें चियां विक्रम सर का एक एंट्री सीन था, जिसमें उनकी घोड़े से एंट्री होती है। डबिंग के दौरान उन्होंने कहा कि ये बेस्ट एंट्री सीन है, क्योंकि मणिरत्नम सर की फिल्मों में हीरो अचानक आ जाते हैं, आम आदमी की तरह और आपको लगता है कि अरे ये हीरो है।’ 

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दिव्य प्रकाश दुबे - फोटो : अमर उजाला

‘काम उनके साथ करें, जिनके साथ मजा आए’
दिव्य प्रकाश दुबे ने अपने काम करने के तरीके के बारे में बात करते हुए कहा, ‘मुझे लगता है कि काम उनके साथ करना चाहिए जिनके साथ मजा आए। आप जब सेट पर लिखने की प्रक्रिया में मजा लेते हैं,  तो जब ऑडियंस उसे देखेगी पांच साल, दस साल बाद तो उसे भी मजा आएगा।’

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विशाल फुरिया, दिव्य प्रकाश दुबे और नुसरत भरुचा - फोटो : इंस्टाग्राम @authordivyaprakash

क्या बदलते दौर के साथ सिनेमा में गालियों की जरूरत है?
संवाद के कार्यक्रम में जब दिव्य प्रकाश दुबे से पूछा गया कि समय के साथ स्क्रिप्ट लेखन में क्या बदलाव आए हैं? अब गालियां भी कहानी का हिस्सा बन गई हैं। क्या इसकी जरूरत है? तो इस पर दिव्य प्रकाश दुबे ने कहा, 'टीवी सीरियल लिमिटिड तरीके से लिखे जाते थे। फिर जब हमें ओटीटी पर दस घंटे मिले और समय की पाबंदी नहीं रही तो हम फ्री हो गए। यह हम राइटर्स के लिए बहुत बड़ा मौका है। यह सवाल अक्सर आता है कि क्या गाली डालने से कोई चीज चलती है? तो कहूंगा कि बिल्कुल नहीं चलती।'
दिव्य ने आगे कहा, 'कोई चीज तब चलती है, जब कोई बात किसी को टच करती है। फिर उसमें गाली है या नहीं है। अगर 17 और 18 साल का कोई लड़का है, ऐसा हो नहीं सकता कि उसके जीवन में गाली न हो। पान सिंह तोमर फिल्म को ही देखिए कि डकैत के जीवन पर फिल्म है और उसमें एक भी गाली नहीं है। गली बॉय में एक भी गाली नहीं है, जबकि यहां होनी चाहिए थी। मेरा मानना है कि जबरदस्ती गाली शामिल करना और जहां जरूरत है वहां से हटाना दोनों ही ठीक नहीं है। ऐसे में बैलेंस बनाना पड़ता है।'
दिव्य प्रकाश दुबे ने कई किताबें लिखी हैं, जिसमें से ‘मुसाफिर कैफे’, ‘अक्टूबर जंक्शन’, और ‘आको बाको’ काफी चर्चित हैं।

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