Turning Red Review: पिक्सार ने माताओं तक पहुंचाई दुनियाभर की बच्चियों के ‘मन की बात’, इसलिए ये फिल्म शानदार है...
सच पूछें तो फिल्म ‘टर्निंग रेड’ का पोस्टर और इसकी डिजाइन मुझे देर तक फिल्म ‘एंग्री बर्ड’ की याद दिलाते रहे, पहली झलक में लगा यही कि ये उसी तरह की कोई फिल्म होगी लेकिन फिल्म ‘टर्निंग रेड’ सिर्फ एक एनीमेशन फिल्म नहीं है। ये बच्चियों के किशोरियां बनने के दौरान होने वाले मानसिक, शारीरिक और सामाजिक बदलाव की एक बेहतरीन कहानी है। फिल्म के नाम का असल मतलब भी ये फिल्म देखने के बाद ही समझ आता है। अगर आपको लगता है कि मासिक धर्म के बारे में बातें करना सिर्फ भारत में ही एक वर्जित विषय है तो ये आंखें खोल देने वाली फिल्म है। यहां इस विषय को एक बहुत ही सहज, सरल और दिलचस्प तरीके से परदे पर इस तरह पेश किया गया है कि इसे आप पूरे परिवार के साथ बैठकर भी देखें तो भी बगलें नहीं झांकनी पड़ेंगी। फिल्म डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर 11 मार्च को रिलीज होने वाली है लेकिन महिला दिवस पर इसका जिक्र करना इसलिए भी सामयिक है कि इस तरह के संदेश देने वाली फिल्में बनती ही बहुत कम हैं।
जिन लोगों ने भी पिक्सार की शॉर्ट एनीमेशन फिल्म ‘बाओ’ देखी है, उन्हें इसकी निर्देशक डोमी शी की काबिलियत का अंदाजा है। पिक्सर ने उन्हें इस फीचर फिल्म की कमान सौंपकर अच्छा ही किया है। अपनी पहली ही फीचर फिल्म में डोमी शी ने मनोरंजन का नया कैनवस रंग दिया है। ये सच है कि इसमें ‘लाल रंग’ शुरू में तमाम नकारात्मक विचारों के साथ ही फैलता दिखता है लेकिन जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, इसके लेखक और निर्देशक मिलकर इस रंग के मायने ही बदल देते हैं। ये बातें हैं एक बच्ची के किशोरी बनने की खुशी की जो इस बात से अनजान है कि मां जब उससे ‘खिलने’ के बारे में सवाल करेगी तो उसे जवाब क्या देना है? या कि मां जब ढेर सारे पैड्स उसके सामने ढेर करने के लिए उतावली होगी, तो उसका मतलब क्या है? यहां बच्ची 13 साल की हुई ही है। उसे लगता है अब वह बड़ी हो गई है। माता-पिता की इच्छाओं से अलग अपनी मनोकामनाओं का भी संसार बना सकती है। अपनी सहेलियों के साथ घर से बाहर घूमने जा सकती है और अपने पसंदीदा ब्यॉज बैंड की कंसर्ट देखने जा सकती है। ये कहानी स्त्रियों की तरफ से स्त्रियों की आजादी पर लगाई जाने वाली पाबंदियों की बहुत गंभीर बात बिना बहुत गंभीर किए कह जाती है।
फिल्म ‘टर्निंग रेड’ महिला विषयों पर हाल फिलहाल के सिनेमा का सबसे बड़ा हस्तक्षेप है। रजस्वला स्त्री को घर परिवार के बुजुर्ग कैसे एक त्याज्य के रूप में देखते रहे हैं, खासतौर से घर की महिलाएं। और, कैसे बदलते समय में मांओं से ज्यादा अपनी बेटियों के करीब नए दौर के पिता आते जा रहे है, इस पर भी फिल्म एक सार्थक टिप्पणी करती है। फिल्म ‘टर्निंग रेड’ का रूपक है इसका एक खास ट्विस्ट, जिससे गुजरने के बाद बच्ची भी चीखती है, दूर रहो मुझसे, मैं एक राक्षस हूं। ये उसका नजरिया है जो उसने समाज से पाया है। लेकिन, फिर उसकी सहेलियां हैं। जो उससे बहुत प्यार करती हैं। ये सब मिलकर इस नई स्थिति को समझती हैं तो समझ आता है कि इसके तो तमाम अच्छे पहलू भी हैं। जिसे अभी तक श्राप के रूप में दुत्कारा जा रहा था, वह तो आशीर्वाद भी बनता दिखता है। समाज की रूढ़ियों के श्रापों को नए जमाने की सोच के साथ कैसे आशीर्वादों के रूप में देखने की जरूरत है, फिल्म ‘टर्निंग रेड’ से इसे समझने में बहुत आसानी होती है।
एक प्रोडक्शन कंपनी के तौर पर भी पिक्सार के लिए ये एक तरह से अपनी ब्रांडिंग दुरुस्त करने का मौका है। किसी एक एनीमेशन फिल्म का पूरा दारोमदार महिलाओं को सौंप देना पिक्सार के लिए एक बड़ा कदम है। डोमी शी फिल्म की पूरी कमान अपने हाथों में रखती हैं और फिल्म में अपनी सह लेखक जूलिया के साथ मिलकर करीब डेढ़ घंटे में ऐसा ताना बाना रचती हैं कि आपका मूड फिल्म शुरू होते समय कैसा भी रहा हो, टोरंटो में बंसी एक चीनी परिवार की इस कहानी को देखते देखते ‘खिल’ ही जाता है। फिल्म की यही असली जीत है। लेखन और निर्देशन के साथ ही फिल्म ‘टर्निंग रेड’ एनीमेशन का भी एक पारंपरिक उत्साह है। इसमें नए दौर की नई थ्रीडी एनीमेशन तकनीक की बजाय टूडी पर ही फोकस रखा गया है यही वजह है कि विहंगम दृश्यों में खोने की बजाय फिल्म देखते समय दर्शक का ध्यान इसके कथ्य पर बना रहता है। और, यही इस फिल्म को देखने की सबसे बड़ी वजह भी है।