The Great Indian Murder Review: सियासी अपराध कथा को तिग्मांशु ने दिए दिलचस्प तेवर, अदाकारी का दिखा अनोखा इंद्रधनुष
डिज्नी प्लस हॉटस्टार की नई वेब सीरीज ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ की कहानी इतनी सी है कि एक बड़े नेता के बेटे की उस वक्त गोली मारकर हत्या कर दी जाती है जब वह दो युवतियों की बलात्कार के बाद हुई हत्या के मामले में जमानत पर छूटकर बाहर आ जाता है और इसका जश्न मना रहा होता है। लेकिन, कहानी इतनी सी है भी नहीं क्योंकि इस कहानी के जब पेंच खुलने होते हैं तो ये कहानी पूरे भारत भ्रमण पर निकल जाती है। विकास स्वरूप के उपन्यास ‘द सिक्स सस्पेक्ट्स’ पर बनी इस सीरीज के पहले सीजन में अभी सारे छह के छह संदिग्ध हत्यारे दिखे भी नहीं है लेकिन पहली सीरीज के नौ एपीसोड में जितनी कहानी तिग्मांशु और उनकी टीम ने खोली है, वह अच्छी बन पड़ी है। और, इसकी वजह है इसकी पटकथा और इसका एपीसोड विभाजन। कहानी किसी किताब की तरह की अध्याय दर अध्याय खुलती है और हर अध्याय के बाद अगला अध्याय जानने की दिलचस्पी आखिर तक बनी रहती है।
वेब सीरीज ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ की कहानी के दो सूत्रधार हैं सीबीआई के डीसीपी सूरज यादव और दिल्ली पुलिस की डीसीपी सुधा भारद्वाज। ये दोनों किरदार किताब में नहीं है। ये किरदार पूरे मामले को सूत्रधार की तरह किरदार दर किरदार उधेड़ते हैं। विकी राय, जगन्नाथ राय, मुन्ना और एकेती, इंगेताई और काला बैग, लाल सलाम और बिल्लू बिरयानी, मोहन कुमार, राजनीति और प्यार, असली नकली, धोखा, ये सीरीज के अलग अलग अध्यायों के नाम हैं। सीरीज की शुरुआत बहुत ही दिलचस्प तरीके से होती है। पहले के तीन एपीसोड पूरी कहानी का समां बांधते हैं। पता चलता है कि दिग्गज नेताओं के बिगड़ैल बेटे कितने बिगड़े हो सकते हैं। उनका इतना असर भी होता है कि वे फिल्म पुरस्कारों में विजेताओं के नाम तक तय कर सकते हैं। पिता एक राज्य का गृहमंत्री है। उसकी भी अपनी तिकड़में हैं। मुख्यमंत्री को मरोड़ना उसे आता है। बेटा खिलाफ जाता है तो उसको उसकी पैदाइश की बूंद समझाना भी आता है।
लेकिन, कहानी रफ्तार पकड़ती है मुन्ना और एकेती की एंट्री से। मुन्ना का किरदार इस सीरीज का असल तड़का है। वह तीखी लाल मिर्च सा चटखारा इस धीमी आंच पर पकती दाल में लगाता है। और, एकेती कहानी के कैनवस का स्याह रंग है। न हिंदी आती है और न अंग्रेजी। समझ में ये भी आता है कि तफ्तीश कितनी तकलीफदेह होती है जब मुलजिम आपकी भाषा ही न समझता हो। और, फिर अंडमान में काम करने वाला एक सोशल वेलफेयर अफसर है। नक्सलियों का लाल सलाम है। दिल्ली की छोटी छोटी गलियों से चलने वाली जरायम की दुनिया में बिरयानी की तरह किलो के भाव बिकने वाले किरदार हैं। और, कहानी पहुंचती है मोहन कुमार तक। यह एक साथ दो जिंदगियां जी रहा किरदार है। कभी वह गांधी है तो कभी अय्य़ाश प्रसाद। ये ड्रामा ही वेब सीरीज ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’
की जान है।
किसी किताब पर फिल्म या सीरीज बनाना आसान नहीं होता। किताब में जो नहीं लिखा होता, उसे परदे पर ला पाना ही ऐसे मामलों में निर्देशक की असली चुनौती होती है और चुनौती इस बात की भी होती है कि किताब में जो लिखा है, उसमें से कितना रखना है और कितना दर्शकों की कल्पना पर छोड़ देना है। इस मामले में तिग्मांशु धूलिया ने सीरीज को बिल्कुल सही आयाम दिए हैं। उनकी लेखन टीम ने उन्हें अच्छा सहारा दिया है और बीच के एक दो एपीसोड को छोड़ दें तो सीरीज आखिर तक इसे देखने की वजह बनाए रखती है। सीरीज का आखिरी एपीसोड खत्म भी ऐसी जगह पर हुआ है कि इसका दूसरा सीजन देखने की वजह बनी रहती है। वेब सीरीज ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ का कैनवस बहुत विशाल है। नौ अलग अलग भौगोलिक भूखंडों पर फिल्माई गई इस सीरीज को इतने अलग अलग तरह के रंग देने में इसके सिनेमैटोग्राफर ऋषि पंजाबी की मेहनत साफ दिखती है। काम भी उनका बहुत अच्छा है। रघु दीक्षित और केतन सोढा ने संगीत की संगत भी ठीक बिठाई। हां, संपादन थोड़ा और चुस्त हो सकता था।
वेब सीरीज ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ की जान इसके वे कलाकार हैं जिन्हें इसके प्रचार में ज्यादा फोकस में नहीं रखा गया है। विकी राय का किरदार कर रहे जतिन गोस्वामी इस सीरीज का असली खंजर हैं। जान जाती भी नहीं है और खून रिसना बंद भी नहीं होता। ऐसा ही है कुछ उनका अभिनय। और, मुन्ना के किरदार में शशांक अरोड़ा ने अपने करियर का बेस्ट परफॉर्मेंस यहां दिया। गृहमंत्री की बेटी से पूछताछ की बारी आने पर जो बेबसी और लाचारी मुन्ना के चेहरे पर दिखती है, वह शशांक अरोड़ा के अभिनय का रिपोर्ट कार्ड है। पत्रकार बने अमेय वाघ का पहले ही एपीसोड का संवाद, ‘सवाल थोड़ा टेढ़ा जरूर है लेकिन पूछा तो मैंने पूरी तमीज से है’, उनका किरदार पूरी तरह स्थापित कर देता है।
सीरीज के मूल किरदारों में प्रतीक गांधी ने उत्तर भारत का युवा बनने की कोशिश पूरी की है। वाराणसी और इलाहाबाद के आसपास लोगों को पुकारने के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द ‘गुरु’ के सहारे वह वहां का लहजा पकड़ने की कोशिश तो पूरी करते हैं, लेकिन वहां का भौकाल कॉपी कर पाना इतना आसान नहीं है। आशुतोष राणा शुरू के कुछ एपीसोड में सोशल मीडिया पर मेरा ही प्रचलित किया अभिवादन ‘जै जै’ भी इस्तेमाल करते दिखते हैं, लेकिन आगे चलकर वह इस मैनरिज्म को साध नहीं पाते हैं। किरदारों को आधा अधूरा गढ़कर छोड़ देने की ये इस सीरीज की बड़ी गलती है। ऋचा चड्ढा के अभिनय में सरलता का बहाव कम ही देखने को मिलता है। वह कोई भी किरदार करें, ऋचा चड्ढा ही दिखती हैं। ये बात किसी न किसी को तो उन्हें जरूर बतानी चाहिए।
वेब सीरीज ‘द ग्रेट इंडियन मर्डर’ के दूसरे महिला किरदारों में पाओली डैम ने ढलती उम्र की बेकरार हीरोइन का किरदार अच्छा निभाया है। अंबिका प्रसाद के किरदार में विनीत कुमार अव्वल नंबर हैं। हिमांशी चौधरी ने अपने हुस्न का जादू सूरज यादव पर जहां चलाया है, वह उनके अभिनय की बढ़िया बानगी है। रघुबीर यादव इतने मंजे हुए अभिनेता हैं कि उनके अभिनय की समीक्षा तो अब क्या ही कोई कर सकता है। रुचा इनामदार को इस सीरीज में अपना अभिनय दिखाने का अच्छा मौका मिला और उन्हें खुद को साबित भी किया है। शारिब हाशमी को जो काम मिला, वह उन्हें काम समझकर ही निभा दिया। बतौर अभिनेता वह न खुद को चैलेंज कर रहे हैं और न ही उनको किरदार ही ऐसे मिल रहे हैं जो उन्हें उनकी आरामतलबी से बाहर ला सकें। कुमार कंचन घोष और दीपराज राणा ने उनसे बेहतर काम इस सीरीज में किया है। आप अपराध कथाओं के शौकीन हैं तो बिंज वॉच के लिए ये सीरीज इस वीकएंड पर आपकी पसंद हो सकती है।