The Buckingham Murders Review: केट विंस्लेट के करिश्मे का करीना ने साधा प्रतिबिंब, हंसल की एक और दर्शनीय फिल्म
सिनेमा देखने का मजा तब तक नहीं आता है, जब तक कि इसमें कुछ चौंकाने वाला न हो। हालांकि, फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ देखने से ज्यादा चौंकाने वाली बात रही इसे देखकर थियेटर से बाहर निकलने के दौरान हुआ एहसास। गुरुवार रात फिल्म का प्रेस शो खत्म होने के बाद बताया गया कि इसके रिव्यू पर शुक्रवार दोपहर 12 बजे तक एम्बार्गो है। लेकिन, जैसे ही सिनेपोलिस से गाड़ी लेकर मैं मुख्य सड़क पर बाएं मुड़ा, सामने दर्जनभर से ज्यादा स्टार रेटिंग्स के साथ फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ का विशालकाय होर्डिंग जैसे मुझे चौंकाने के लिए ही हाजिर था। सिनेमा और सियासत दोनों इन दिनों एक जैसे संवेदनशील होते जा रहे हैं। दोनों पर लिखना रस्सी पर करतब दिखाने वाले नट जैसा हो गया है। और, सिनेमा तो है ही एक तरह के नाटक को कैमरे के जरिये दर्शकों तक पहुंचाना।
थियेटर तक पहुंचने की मशक्कत
फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ मुंबई में पहले पहल बीते साल अक्तूबर में एक फेस्टिवल में दिखाई गई थी। फिल्म के सेंसर सर्टिफिकेट पर इस साल जनवरी की तारीख है। मुंबई में फिल्म के प्रीमियर से पहले इसका आगाज लंदन में उससे कोई दो हफ्ता पहले और हो चुका था। सिनेमा के सुधी दर्शकों के लिए ये एक चिर प्रतीक्षित फिल्म रही है। फेस्टिवल फिल्म जैसा आभास देसी है। 80 फीसदी संवाद इसके अंग्रेजी में हैं, हालांकि फिल्म के निर्माताओं के इन्हें डब करके इसका एक ठेठ हिंदी संस्करण भी रिलीज करने की बात कही जा रही है। लेकिन, ये फिल्म अंग्रेजों की धरती पर हिंदुस्तानी सिनेमा की धमक है। कहानी कुछ कुछ वैसी जगह पर घटती है, जैसी जगह भारत के किसी भी शहर की मिश्रित आबादी वाले इलाकों में हो सकती है। धार्मिक तनाव कोहरे की तरह छाया रहता है। और, सबके सीने में एक आग है, जो बोतल बम बनकर कब बाहर आ जाए, कोई नहीं जानता!
कहानी परदेस में बसे देसियों की
करीना कपूर खान ने कहीं तो ये कहा कि फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ केट विन्स्लेट की सीरीज ‘मेर ऑफ ईस्टटाउन’ से प्रेरित है। बस, हत्या के रहस्य सुलझाने वाली फिल्मों के शौकीनों के बीच इसे लेकर बेताबी बढ़ गई। कहानी कुछ कुछ वैसी ही है। अपनी निजी समस्याओं से परेशान एक महिला पुलिस अफसर का सामाजिक समस्याओं के टूटते ताने-बाने के बीच एक हत्या की तफ्तीश करना। यहां जिसका बालक मरा है, उसका दोस्त ही निशाने पर है। दोस्त का बेटा गुनहगार मान भी लिया जाता है, लेकिन सार्जेंट जसमीत भामरा को ये सही नहीं लगता। अपने सीनियर का साथ पाकर वह इसकी नए सिरे से तफ्तीश करती है। घरेलू हिंसा, गरीब बच्चों को गोद लेने के पीछे की वजहों, पति की उपेक्षा की शिकार पत्नियों में पल पल बढ़ते अवसाद और इन तमाम वजहों से पनपने वाली मानसिक बीमारियों के बीच फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ अपने अंजाम तक पहुंचती है। फिल्म नेटफ्लिक्स पर प्रसारित होनी है सो एक कड़ी इस कहानी में समलैंगिक रिश्तों की भी है।
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दुरुस्त कहानी का इतिहास और भूगोल भी चुस्त
असीम अरोड़ा, राघव राज कक्कड़, कश्यप कपूर ने फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ का ताना-बाना अच्छा बुना है। हत्या के रहस्य पर आधारित कहानियों में वातावरण की बड़ी भूमिका होती है और इस लिहाज से फिल्म का भौगोलिक विस्तार पहले फ्रेम से ही दर्शकों को अपने साथ लेकर चलने लगता है। कहानी चूंकि विदेशी धरती पर घट रही है लिहाजा पुलिस की कार्यप्रणाली, अफसरों के पदनाम और उनकी प्रक्रिया के साथ ढलने में दर्शकों को थोड़ा समय लगता है पर एक बार जब सब सम पर आता है तो फिर खटकता नहीं है। फिल्म को ब्रिटेन में शूट करने के पीछे वहां मिलने वाली सब्सिडी भी एक वजह हो सकती है। एक बार माहौल सेट होने के बाद फिल्म के लेखक कहानी के गियर धीरे धीरे बदलते जाते हैं और क्लाइमेक्स तक आते आते फिल्म का ग्राफ ऊपर ही चढ़ता जाता है। बीच में एक दो बार फिल्म पिता और बेटी के रिश्तों को टटोलने के चक्कर में हिचकोले खाती है लेकिन निर्देशन की चतुराई से ये कमी छुप जाती है।
हंसल के सिनेमा की नई छाप
निर्देशक हंसल मेहता की कोई फिल्म बड़े परदे तक अरसे बाद पहुंची हैं। मसाला फिल्मों का मोह छोड़ बीते एक दशक से वह लगातार सामाजिक रूप से ज्वलंत मुद्दों पर ही फिल्म बनाते रहे हैं। और, इसके लिए कलाकार दूसरी कतार के ही वह पाते रहे हैं। पहली कतार की हीरोइन करीना का साथ उन्हें पहली बार मिला है। फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ में उनका हत्या के रहस्यों पर बनी फिल्म के रचयिता का नया रूप सामने आता है। बतौर फिल्मकार चुनौतीपूर्ण कहानियां चुनना हंसल की आदत है। हालांकि, तब्बू और मनोज बाजपेयी जैसे अपने समय के चर्चित कलाकारों के साथ हंसल पहले भी काम कर चुके हैं, लेकिन करीना कपूर खान जैसी अभिनेत्री का हंसल की सोच पर भरोसा करना और अपनी फीस कम करके इस फिल्म में बतौर निर्माता शामिल हो जाना, ही उन पर जताया गया पहला भरोसा है। हंसल ने अपने सिनेमा पर नजर रखने वाले दर्शकों को निराश भी नहीं किया है। हंसल की सीरीज या फिल्म देखने वाले जानते हैं कि यहां किस्सा रफ्तार का नहीं बल्कि एक ऐसे संसार का होगा, जिसे बसने में समय लगता है और जिसका असली रूप सामने आने तक दर्शकों के एहसासों का उफान धीरे धीरे बढ़ते ताप के साथ चढ़ता रहता है।
करीना ने साधा केट विंस्लेट का करिश्मा
फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ एक तरह से करीना कपूर खान की फिल्म है। केट विंस्लेट ने अपनी बढ़ती उम्र के हिसाब से जब ‘मेर ऑफ ईस्टटाउन’ जैसी सीरीज की थी तो मैंने इसके रिव्यू में लिखा था, ‘वेब सीरीज ‘मेर ऑफ ईस्टटाउन’ प्रेशर कुकर में बनी दाल की बजाय चूल्हे की आंच पर बटलोई में पकती दाल जैसी है। ऊपर कटोरे में भरा रखा पानी अदहन की भाप से खौल रहा है।’ बस वैसा ही कुछ अभिनय यहां करीना कपूर का है। हाल ही में फिल्म ‘क्रू’ में दिखी करीना कपूर की अदाकारी की गहराई हिंदी सिनेमा के कम निर्देशक ही समझ पाएं हैं। हवा में तैरते किसी चिड़िया के पंख सी कोमल उनकी शख्सियत में रेगिस्तान से सूखे एहसास और पत्थरों से पटी धरती की हकीकत एक किरदार की असलियत तरह कैसे घुल जाती है, ये देखने लायक है। करीना कपूर ने अपनी अभिनय यात्रा में तमाम किरदार पहले भी तारीफ करने लायक किए हैं। फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ की जसमीत उसमें एक नया इजाफा है।
एक नंबर रहा एम्मा का कैमरा, केतन का बीजीएम
फिल्म ‘द बकिंघम मर्डर्स’ में हंसल मेहता को अपनी फिल्म का माहौल रचने में जिन दो तकनीशियनों से सबसे ज्यादा मदद मिली है, उनमें सिनेमैटोग्राफर एम्मा डेल्समैन का उल्लेख करना बहुत जरूरी है। कैमरा कैसे किरदारों की जासूसी करके खुद दर्शक को एक मर्डर मिस्ट्री में एक जासूस होने की तपिश महसूस कराने लगता है, इसे समझना हो तो हंसल की ये फिल्म जरूर देखिए। फिल्म में मारधाड़ भी है, नाटकीयता भी है और इंसानी एहसास भी भर भरके हैं, लेकिन हिंदी सिनेमा के सेट टेम्पलेट के सारे तत्व होने के बावजूद हंसल ने इन्हें पेश करने का तरीका बिल्कुल कच्चा रखा है। केतन सोढा और नाइट सॉन्ग रिकॉर्ड्स का बैकग्राउंड म्यूजिक इसे पकाने की कोशिश लगातार करता रहता है और इस आंच में फिल्म का रंग भी खूब निखरता है। गाने एक दो ठीक बन पड़े हैं। डिस्क्लेमर यहां ये देना बहुत जरूरी है कि ठेठ हिंदी भाषी दर्शकों के लिए फिल्म का असली संस्करण देखना दिक्कत भरा हो सकता है। ऊपर से फिल्म के क्रेडिट्स में कलाकारों और तकनीशियनों के नामों का अंग्रेजी से जिस तरह की हिंदी मे ट्रांसलिटरेशन किया गया है, वह परेशान करने वाला है।