Sardar Ka Grandson Review: युवा निर्देशक ने दिग्गजों को दिखाया रिश्तों का आईना, ‘सरदार’ फिर चैंपियन
- फिल्म ‘सरदार का ग्रांडसन’ की हीरोइन नीना गुप्ता ही हैं। 62 साल की नीना गुप्ता ने 90 साल की एक ऐसी बुजुर्ग का किरदार फिल्म में किया है जिसका नाम है सरदार कौर।
- अदिति ने युवा सरदार कौर के रोल में बेहतरीन अभिनय किया है। यूं लगता है कि जैसे किसी ठेठ पंजाबन युवती ने ही ये किरदार निभाया है।
विस्तार
Movie Review: सरदार का ग्रांडसन
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लेखक: अनुजा चौहान, अमितोष नागपाल, काशवी नायर
कलाकार: नीना गुप्ता, अर्जुन कपूर, रकुल प्रीत सिंह, कंवलजीत सिंह, कुमुद मिश्रा और जॉन अब्राहम व अदिति राव हैदरी (विशेष भूमिकाओं में)
निर्देशक: काशवी नायर
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: ***
नीना गुप्ता खुश हैं कि आखिरकार किसी निर्देशक ने तो उन्हें टाइटल रोल में लेकर फिल्म बनाई। युवाओं से भरे देश भारत में बुजुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। पिछली जनगणना में ही इनकी तादाद 10 करोड़ से ऊपर थी। अब नई जनगणना के आंकड़े आएंगे तो इनमें उल्लेखनीय और सुखद वृद्धि दिखनी है। हमारे आसपास आशीर्वाद देने के लिए इतने बुजुर्ग देश में पहले कभी नहीं थे। काशवी को भी अपनी फिल्म का विचार उस वृत्तचित्र से मिला जिसमें एक शख़्स आज़ादी की 70वीं सालगिरह पर सरहद पार जाकर अपनी पुरानी यादों की उस पार छूट गई गठरी टटोलना चाहता है। वह खुद अपने दादाजी को लेकर मुंबई से जामनगर स्थित उनके गांव गईं तो वे एहसास इस फिल्म की नींव बने। मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री के अगुवा इन दिनों देसी रिश्तों की डोर छोड़कर ना जाने कौन कौन सी दास्तान्स बना रहे हैं तो ऐसे में विदेश में पढ़ी लिखी एक लड़की ‘सरदार का ग्रांडसन’ बना रही है, यही नया भारत है।
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लेखक: अनुजा चौहान, अमितोष नागपाल, काशवी नायर
कलाकार: नीना गुप्ता, अर्जुन कपूर, रकुल प्रीत सिंह, कंवलजीत सिंह, कुमुद मिश्रा और जॉन अब्राहम व अदिति राव हैदरी (विशेष भूमिकाओं में)
निर्देशक: काशवी नायर
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: ***
नीना गुप्ता खुश हैं कि आखिरकार किसी निर्देशक ने तो उन्हें टाइटल रोल में लेकर फिल्म बनाई। युवाओं से भरे देश भारत में बुजुर्गों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। पिछली जनगणना में ही इनकी तादाद 10 करोड़ से ऊपर थी। अब नई जनगणना के आंकड़े आएंगे तो इनमें उल्लेखनीय और सुखद वृद्धि दिखनी है। हमारे आसपास आशीर्वाद देने के लिए इतने बुजुर्ग देश में पहले कभी नहीं थे। काशवी को भी अपनी फिल्म का विचार उस वृत्तचित्र से मिला जिसमें एक शख़्स आज़ादी की 70वीं सालगिरह पर सरहद पार जाकर अपनी पुरानी यादों की उस पार छूट गई गठरी टटोलना चाहता है। वह खुद अपने दादाजी को लेकर मुंबई से जामनगर स्थित उनके गांव गईं तो वे एहसास इस फिल्म की नींव बने। मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री के अगुवा इन दिनों देसी रिश्तों की डोर छोड़कर ना जाने कौन कौन सी दास्तान्स बना रहे हैं तो ऐसे में विदेश में पढ़ी लिखी एक लड़की ‘सरदार का ग्रांडसन’ बना रही है, यही नया भारत है।
फिल्म ‘सरदार का ग्रांडसन’ की पहली पहली खबरें जिन दिनों आईं थी तो कोरोना का प्रकोप महामारी बनकर फैलने की किसी ने सोच भी नहीं रखी थी। फिर बीते डेढ़ साल से दुनिया को परिवार का मतलब समझ आया है। समझ आया है कि दफ्तर से घर आकर घंटा आधा घंटा परिवार के साथ टीवी देख लेना, साथ बैठकर खाना खा लेना या संडे के संडे साथ में पिक्चर देख लेना ही फैमिली फीलिंग नहीं है। परिवार को लेकर लोगों की जो सोच पिछले महीनों में बदली है, उसकी टॉपिंग है फिल्म ‘सरदार का ग्रांडसन’। ये सच है कि किसी अनुभवी निर्देशक के हाथों में जाकर ये फिल्म एक ऑल टाइम क्लासिक बन सकती थी, लेकिन तारीफ काशवी की करनी होगी कि उन्होंने एक जटिल विषय को बहुत ही सहजता के साथ दर्शकों के सामने रखा। उनकी अनुभवहीनता ही इस फिल्म को असली बनाए रखती है, एहसासों का नकलीपन यहां नहीं है और ना ही भावनाओं का सैलाब इसीलिए यहां आता है। काशवी ने बतौर निर्देशक अपना लिटमस टेस्ट पास कर लिया है। आगे जैसे जैसे उनका बोलियों, कहानियों, किस्सों के बीच और समय बीतेगा, वह बेहतर हिंदी भी बोलने लगेंगी और बेहतर सिनेमा भी बनाने लगेंगी।
जैसा कि मैंने शुरू में ही लिखा, फिल्म ‘सरदार का ग्रांडसन’ की हीरोइन नीना गुप्ता ही हैं। 62 साल की नीना गुप्ता ने 90 साल की एक ऐसी बुजुर्ग का किरदार फिल्म में किया है जिसका नाम है सरदार कौर। अपने पति के साथ मिलकर लाहौर में उन्होंने बहुत सपने बुने। लेकिन, दंगा उनके अरमानों का क़ातिल निकला। अपने दुधमुंहे बच्चे को सीने से बांधकर और एक साइकिल लेकर वह लाहौर से भागती है। सरहद के इस पार अमृतसर को वह अपना ठिकाना बनाती है और शुरू करती है एक साइकिल कंपनी। इतनी बड़ी कंपनी कि जिसका एक रत्ती भर हिस्सा भी अब सरदार की वसीयत में होना किसी को मालामाल कर सकता है। सरदार की बस एक ही ख्वाहिश है कि मरने से पहले उसे लाहौर वाला अपना घर देखना है। अमेरिका में पोते का दिल टूटता है तो वह दादी के दिल की बात पूरी करने हिंदुस्तान लौट आता है और फिर शुरू होती है भारत-पाकिस्तान की कहानी, जिसमें कुछ लोग तो बुरे हैं लेकिन ज्यादातर लोग अब भी झप्पी पाने को बाहें पसारे मिलते हैं।
फिल्म ‘सरदार का ग्रांडसन’ में नीना गुप्ता ने कमाल का काम किया है। फिल्म ‘बधाई हो’ से हिंदी सिनेमा में दोबारा धमाकेदार एंट्री करने वाली नीना गुप्ता को मलाल रहा है कि उनके समय के निर्देशकों ने उन्हें किसी फिल्म में हीरोइन तक नहीं बनाया। यहां उनसे दो पीढ़ी के अंतर पर खड़ी एक नई निर्देशक ने उन्हें फिल्म का टाइटल रोल दे दिया है। 90 साल का दिखने के लिए नीना गुप्ता को प्रोस्थेटिक मेकअप भी कराना पड़ा है, पर वह उसमें भी सुंदर ही दिखती हैं। पूरे परिवार के साथ उनका रिश्ता निभाना कहानी की असली कड़ी है। असली बेटे और सौतेले बेटे की अगली पीढ़ियों के साथ सरदार कौर का एक सा नाता गौर करने वाली बातें हैं। सोते हुए पोते की नाक दबाकर मसखरी करने वाली दादी बड़े दिल वाली दादी भी है जिसे 74 साल बाद पता चलता है कि जिसे वह पाकिस्तान की सबसे बढ़िया वाली व्हिस्की समझती रही, वह असल में पाकिस्तान का देसी ठर्रा है।
उनके बाद फिल्म में किसी का काम दमदार है तो वह हैं अदिति राव हैदरी। सरदार कौर कोई 74 साल पहले की। अदिति ने युवा सरदार कौर के रोल में बेहतरीन अभिनय किया है। यूं लगता है कि जैसे किसी ठेठ पंजाबन युवती ने ही ये किरदार निभाया है। फिल्म का सबसे हिट गाना ‘मैं तेरी हो गइयां, मैंनूं दूर न करीं’ उन पर और जॉन पर फिल्माया गया है। मिलिंद गाबा के चार साल पुराने इस गाने को फिल्म में शामिल करके टी सीरीज ने नेक काम किया है। पहले से ही हिट हो चुके स्वतंत्र गीतकारों व गायकों को ऐसे ही बड़े मौके और मिलने चाहिए। पाकिस्तानी गीतों के मुखड़ों पर हिंदी के नकली से गीत लिखने वाले ऐसे ही इस इंडस्ट्री से बाहर होंगे। अदिति के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कुछ निजी दिक्कतें रही हैं लेकिन जो निर्देशक इन बड़े सितारों के आभामंडल से दूर हैं, उन्हें अदिति को लेकर कुछ लीक से इतर जरूर गढ़ना चाहिए।
फिल्म का पूरी पृष्ठभूमि पंजाबी है। अर्जुन कपूर और रकुल प्रीत दोनों को इसमें अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि से काफी मदद भी मिलती है। फिल्म के संवादों में बोलियों और स्थानीय लहजे की कितनी अहम भूमिका होती है, इस फिल्म से सीखा जा सकता है। ये सच है कि काशवी ने कलाकारों के उच्चारण पर नज़र रखने और जहां ज़रूरत पड़े वहां उन्हें सिखाने के लिए अलग से टीम रखी, लेकिन फिल्म का समग्र असर प्रभावी है। सिर्फ कंवलजीत सिंह पूरी फिल्म में कायम चूर्ण का विज्ञापन सा करते दिखते हैं, वह फिल्म की कास्ट में मिसफिट भी हैं। कुमुद मिश्रा ने काइयां पाकिस्तानी पुलिस अफसर बनने की कोशिश पूरी की है लेकिन लोगों से इतना प्यार वह पहले पा चुके हैं कि ऐसे किरदारों के लिए नफ़रत पाने में भी थोड़ा वक़्त तो लगेगा। मसूद अख़्तर, रवजीत सिंह और आकाशदीप साबिर ने सहयोगी भूमिकाएं अच्छे से निभाई हैं। चायवाले छोकरे का किरदार करने वाला कलाकार असर छोड़ जाता है। खासतौर से उसका संवाद, ‘आपके देश में लोग चायवालों को अंडरएस्टिमेट बहुत करते हैं।’
तकनीकी तौर से भी फिल्म अच्छी बन पड़ी है। माहिर झावेरी ने संपादन में थोड़ी रियायत कम बरती होती तो ओटीटी के हिसाब से ये फिल्म थोड़ी और चुस्त की जा सकती है। सिनेमाहार के लिए इसकी लंबाई भले ठीक हो लेकिन ओटीटी पर अगर फिल्म में क्षेपक कथाएं न हों तो फिर उसको दो घंटे के करीब ही रहना चाहिए। इस लिहाज से फिल्म करीब 20 मिनट कम की जा सकती है। महेंद्र शेट्टी का कैमरा लोकेशन्स को भी जीवंत करने में कामयाब रहा। आउटडोर लोकेशंस में उनकी टीम ने अच्छे से लाइटिंग वगैरह में मदद की है। विजय घोडके ने यहां कला निर्देशन में और शीतल शर्मा ने वेशभूषाएं चुनने में काबिले तारीफ काम किया है। कविश सिन्हा की कास्टिंग कहानी के हिसाब से उम्दा दिखी। अरसे बाद नेटफ्लिक्स पर कोई फिल्म ऐसी आई है जिसे आप पूरे परिवार के साथ ड्राईंग रूम वाले बड़े से स्मार्ट टीवी पर देख सकते हैं।