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Hindi News ›   Entertainment ›   Movie Reviews ›   Safed Movie review debutant director Sandeep Singh Meera Chopra Abhay Verma Barkha Bisht Zameel Khan

Safed Review: मसाला फिल्मों के रंग झटक संदीप ने बनाई फिल्म 'सफेद', अभय और मीरा के अभिनय की शोरील

Fri, 29 Dec 2023 09:46 AM IST
ज्योति राघव अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई Published by: ज्योति राघव Updated Fri, 29 Dec 2023 09:46 AM IST
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Safed Movie review debutant director Sandeep Singh Meera Chopra Abhay Verma Barkha Bisht Zameel Khan
'सफेद' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
सफेद
कलाकार
मीरा चोपड़ा , अभय वर्मा , बरखा बिष्ट , छाया कदम और जमील खान आदि
लेखक
संदीप सिंह
निर्देशक
संदीप सिंह
निर्माता
संदीप सिंह , विशाल गुरनानी , जूही पारेख मेहता और जफर मेहदी
ओटीटी:
जी5
रिलीज:
29 दिसंबर 2023
रेटिंग
2/5

किन्नर समुदाय को लेकर भले ही सुप्रीम कोर्ट ने लिंग के तीसरे वर्ग के रूप में मान्यता दे दी, लेकिन समाज में इस समुदाय को अभी भी सम्मानित नजरिए से नहीं देखा जाता है। किसी के घर बेटा पैदा हो या बेटी किन्नर समुदाय के लोग खुशी से नाचते गाते है, आशीर्वाद देते हैं। लेकिन उनके जीवन में खुशी नहीं है। उनकी दुआ जितनी असरदार होती हैं, बददुआ भी उतनी ही लगती है। आम इंसान के मन में किन्नर को लेकर बस यही भाव है। जाने माने निर्माता - निर्देशक संजय लीला भंसाली के शागिर्द रहे संदीप सिंह ने बतौर निर्देशक अपनी पहली फिल्म 'सफेद' के माध्यम से समाज की उपेक्षित किन्नर समुदाय और विधवाओं को लेकर एक अतरंगी फिल्म बनाई है, जिसका नाम उन्होंने 'सफेद' दिया है। 

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Safed Movie review debutant director Sandeep Singh Meera Chopra Abhay Verma Barkha Bisht Zameel Khan
'सफेद' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म 'सफेद' की कहानी एक विधवा और एक 'किन्नर के बीच अपरंपरागत प्रेम कहानी है। काली एक विधवा स्त्री है, जो किन्नर चंडी के वास्तविक जीवन से अनजान है। कहते हैं कि अगर पति का साथ छूट जाए तो एक स्त्री की जिंदगी वीरान हो जाती है। उसे लगता है कि जिंदगी जीने का कोई मतलब नहीं, यही सोचकर गंगा में डूबकर काली अपनी जीवन लीला समाप्त करना चाहती है, लेकिन चंडी उसे बचा लेता है। काली, चंडी के विचार और व्यवहार से उसकी तरफ आकर्षित होती हैं और मन ही मन उससे प्यार करने लगती हैं। चंडी के भी मन में काली के प्रति प्रेम है, लेकिन वह अपने प्रेम का इसलिए इजहार नहीं कर पाता क्योंकि वह किन्नर है। जब काली को चंडी के असलियत के बारे में पता चलता है, तो एक बार उसके सपने टूटकर बिखर जाते हैं।

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Safed Movie review debutant director Sandeep Singh Meera Chopra Abhay Verma Barkha Bisht Zameel Khan
'सफेद' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

कहानी का सार ये है कि एक विधवा स्त्री किसी से प्यार नहीं कर सकती। और, जब बात किन्नर और विधवा स्त्री के बीच प्रेम प्रसंग की बात हो तो यह कल्पना से भी परे लगता है। 'राम लीला', 'राउडी राठौर',  'अलीगढ़' और 'सरबजीत' जैसी फिल्मों के निर्माण में सहयोगी रह चुके संदीप सिंह ने पहली बार फिल्म 'सफेद' का निर्देशन किया है और फिल्म की कहानी उन्होंने खुद ही लिखी है। फिल्म में उन्होंने दिखाया है कि तमाम विधवा औरतें एक ही साथ रहती हैं, जहां अचानक काली भी उन विधवा औरतों के पास रहने चली आती है, उसकी  पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है?  वह कहां से आई है, इसपर उन्होंने प्रकाश डालने की कोशिश नहीं की। चंडी, काली से कहता है कि भगवान शिव भी तो आधा स्त्री और पुरुष है। उसके बाद दिखाया गया है कि कुछ पंडित लोग महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण करते हुए उसे दूध से नहला रहे हैं, इस दृश्य का फिल्म में औचित्य स्पष्ट नहीं हो सका।

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Safed Movie review debutant director Sandeep Singh Meera Chopra Abhay Verma Barkha Bisht Zameel Khan
'सफेद' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

फिल्म 'सफेद' की शूटिंग बनारस में हुई है, लेकिन बनारस का कोई भी रंग इस फिल्म में नजर नहीं आता। हो सकता है फिल्म के नाम के साथ जुगलबंदी बनाए रखने के लिए संदीप ने ऐसा किया हो लेकिन लोकेशन किसी भी फिल्म का एक बहुत ही महत्वपूर्ण किरदार होता है जिसके जरिए फिल्म की कहानी आगे बढ़ती हैं। फिल्म में संवाद के नाम पर गालियों की भरमार है। किन्नर समुदाय के लोग अक्सर गलियों की ही भाषा में बात करते हैं, लिहाजा उसकी लिबर्टी लेते हुए उन्होंने गालियों की भरमार कर दी। जबकि फिल्म का ही एक संवाद है, 'इंसान हूं, गाली नहीं'। निर्देशक रवि जाधव की सुष्मिता सेन अभिनीत वेब सीरीज 'ताली' संदीप के लिए अच्छा संदर्भ हो सकती थी।

Safed Movie review debutant director Sandeep Singh Meera Chopra Abhay Verma Barkha Bisht Zameel Khan
'सफेद' रिव्यू - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

चंडी की भूमिका में अभय वर्मा ने फिल्म 'सफेद' में अच्छा अभिनय किया है। वहीं काली की भूमिका में मीरा चोपड़ा की मासूमियत देखने लायक है। अपने किरदार को जिस सादगी के साथ उन्होंने निभाया है, वह काबिलेतारीफ है। हां, किन्नरों के मुखिया की भूमिका में जमील खान का अभिनय थोड़ा लाउड है। वेब सीरीज 'गुल्लक' में संतोष मिश्रा का किरदार निभा चुके अभिनेता जमाल खान को बड़े परदे पर ये अच्छा मौका मिला है। बाकी कलाकारों का अभिनय सामान्य हैं। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है, अगर फिल्म का गीत 'घर आए रंग रसिया' को अच्छी तरह से प्रमोट किया जाए तो यह गीत लोगों की जुबान पर चढ़ सकता है।   

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