{"_id":"6ae4378bca479487a5043602","slug":"ritwik-bhowmik-and-ayesha-raza-mishra-starrer-meethe-me-kya-hai-film-review-2026-10-30","type":"wiki","status":"publish","title_hn":"Meethe Mein Kya Hai Movie Review: दिवाली पर जुटा परिवार, रिश्तों का ड्रामा दिलचस्प; मगर कहानी जानी-पहचानी","category":{"title":"Movie Reviews","title_hn":"मूवी रिव्यूज","slug":"movie-review"}}
Meethe Mein Kya Hai Movie Review: दिवाली पर जुटा परिवार, रिश्तों का ड्रामा दिलचस्प; मगर कहानी जानी-पहचानी
सार
- Meethe Me Kya Hai Review: ऋत्विक भौमिक की अदाकारी वाली फिल्म 'मीठे में क्या है' आज ओटीटी पर रिलीज हो गई है।
- इसमें पारिवारिक ड्रामा दिखाया गया है।
- इस खबर में पढ़िए कि इस फिल्म की कहानी कैसी है।
विज्ञापन
मीठे में क्या है रिव्यू
- फोटो : अमर उजाला
Movie Review
मीठे में क्या है
कलाकार
ऋत्विक भौमिक
,
रोहिणी हट्टंगड़ी
,
आयशा रजा मिश्रा
,
अभय कॉल
,
तराना राजा
,
दलाइ
,
विक्रम बख्शी
,
शिविका ऋषि
और
गौरव के. शर्मा
लेखक
राधिका बंसल
निर्देशक
राधिका बंसल
निर्माता
अजित मोहन
और
सिद्धार्थ स्वरूप
रिलीज डेट
30 अक्तूबर
रेटिंग
3/5
विस्तार
परिवार की दिवाली हो और किसी की जिंदगी का फैसला परिवार की पंचायत में न पहुंचे, ऐसा कम ही होता है। यहां प्यार भी है, फिक्र भी और अपनों की जिंदगी अपने हिसाब से चलाने की चाह भी।
नेटफ्लिक्स की फिल्म 'मीठे में क्या है' इसी पारिवारिक दुनिया की कहानी है, जहां हर कोई दूसरों का भला चाहता है, लेकिन यह समझना भूल जाता है कि आखिर सामने वाला चाहता क्या है।
विज्ञापन
नेटफ्लिक्स की फिल्म 'मीठे में क्या है' इसी पारिवारिक दुनिया की कहानी है, जहां हर कोई दूसरों का भला चाहता है, लेकिन यह समझना भूल जाता है कि आखिर सामने वाला चाहता क्या है।
विज्ञापन
मीठे में क्या है रिव्यू
- फोटो : यूट्यूब
कहानी: दिवाली पर जुटा परिवार, मिठाई के साथ खुलेंगे कई राज
दिवाली पर पूरा परिवार एक छत के नीचे जुटे और कोई पुराना किस्सा न निकले, ऐसा कैसे हो सकता है! फिल्म की कहानी लखनऊ के एक ऐसे ही परिवार की है, जहां त्योहार की खुशियों के बीच रिश्तों की उलझनें सिर उठाने लगती हैं।
जय (ऋत्विक भौमिक) पत्नी को खोने के दुख से अब तक उबर नहीं पाया है। वह इस माहौल से दूर जॉर्जिया जाकर नई जिंदगी शुरू करना चाहता है। लेकिन दिवाली मनाने नानी (रोहिणी हट्टंगड़ी) के घर पहुंचते ही परिवार की एक ऐसी खबर सामने आती है, जो त्योहार का माहौल बदल देती है। जय की बहन बताती है कि उसने चुपके से शादी कर ली है और अब अपने पार्टनर के साथ दिवाली मनाने आई है। उसके इस फैसले से पूरे परिवार में हंगामा मच जाता है।
एक तरफ बहन की गुपचुप शादी परिवार के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है.... तो दूसरी तरफ मां अमृता (आयशा रजा मिश्रा) बेटे की दूसरी शादी कराने पर तुली हैं। वह चाहती हैं कि जय अपना घर फिर से बसा ले, लेकिन पत्नी को खोने के दुख से जूझ रहा जय इसके लिए तैयार नहीं है।
फिल्म एक ऐसे भारतीय परिवार की तस्वीर दिखाती है.... जहां रिश्तेदारों को दूसरों की निजी जिंदगी में दखल देने की आदत है। नई पीढ़ी अपने फैसले खुद लेना चाहती है, जबकि पुरानी पीढ़ी को बच्चों की बदलती सोच आसानी से समझ नहीं आती। ऐसे में दिवाली का मिलन सिर्फ त्योहार मनाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार की सोच, उम्मीदों और आपसी मतभेदों की परीक्षा भी बन जाता है।
दिवाली पर पूरा परिवार एक छत के नीचे जुटे और कोई पुराना किस्सा न निकले, ऐसा कैसे हो सकता है! फिल्म की कहानी लखनऊ के एक ऐसे ही परिवार की है, जहां त्योहार की खुशियों के बीच रिश्तों की उलझनें सिर उठाने लगती हैं।
जय (ऋत्विक भौमिक) पत्नी को खोने के दुख से अब तक उबर नहीं पाया है। वह इस माहौल से दूर जॉर्जिया जाकर नई जिंदगी शुरू करना चाहता है। लेकिन दिवाली मनाने नानी (रोहिणी हट्टंगड़ी) के घर पहुंचते ही परिवार की एक ऐसी खबर सामने आती है, जो त्योहार का माहौल बदल देती है। जय की बहन बताती है कि उसने चुपके से शादी कर ली है और अब अपने पार्टनर के साथ दिवाली मनाने आई है। उसके इस फैसले से पूरे परिवार में हंगामा मच जाता है।
एक तरफ बहन की गुपचुप शादी परिवार के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है.... तो दूसरी तरफ मां अमृता (आयशा रजा मिश्रा) बेटे की दूसरी शादी कराने पर तुली हैं। वह चाहती हैं कि जय अपना घर फिर से बसा ले, लेकिन पत्नी को खोने के दुख से जूझ रहा जय इसके लिए तैयार नहीं है।
फिल्म एक ऐसे भारतीय परिवार की तस्वीर दिखाती है.... जहां रिश्तेदारों को दूसरों की निजी जिंदगी में दखल देने की आदत है। नई पीढ़ी अपने फैसले खुद लेना चाहती है, जबकि पुरानी पीढ़ी को बच्चों की बदलती सोच आसानी से समझ नहीं आती। ऐसे में दिवाली का मिलन सिर्फ त्योहार मनाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार की सोच, उम्मीदों और आपसी मतभेदों की परीक्षा भी बन जाता है।
विज्ञापन
मीठे में क्या है रिव्यू
- फोटो : यूट्यूब
अभिनय: रोहिणी हट्टंगड़ी के सामने सबकी बोलती बंद
फिल्म की सबसे दिलचस्प बात इसका जाना-पहचाना पारिवारिक माहौल है। रोहिणी हट्टंगड़ी नानी के किरदार में घर की ऐसी मुखिया लगती हैं, जिनके सामने बड़े-बड़े फैसले लेने वाले भी सोच में पड़ जाएं। उनके अभिनय में सख्ती है.. अपनापन है और बिना ज्यादा बोले अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का हुनर भी।
ऋत्विक भौमिक जय के किरदार में सहज हैं। पत्नी को खोने का दुख और परिवार के बीच अपनी जिंदगी के फैसलों को लेकर उनकी उलझन, दोनों उनके अभिनय में नजर आते हैं। 'बंदिश बैंडिट्स' और 'खाकी: द बंगाल चैप्टर' के बाद यहां भी उनका स्क्रीन प्रेजेंस आकर्षक है।
आयशा रजा मिश्रा अमृता के किरदार में जंचती हैं। वह उस भारतीय मां की तरह लगती हैं, जो बच्चों के लिए अच्छा ही चाहती है, लेकिन कई बार अपनी सोच को ही सही मान बैठती है।
तराना राजा, अभय कौल और गौरव के. शर्मा समेत बाकी कलाकार भी परिवार की इस तस्वीर को विश्वसनीय बनाते हैं। सहायक कलाकारों का तालमेल अच्छा है....सभी मिलकर बड़े परिवार का माहौल रचते हैं।
फिल्म की सबसे दिलचस्प बात इसका जाना-पहचाना पारिवारिक माहौल है। रोहिणी हट्टंगड़ी नानी के किरदार में घर की ऐसी मुखिया लगती हैं, जिनके सामने बड़े-बड़े फैसले लेने वाले भी सोच में पड़ जाएं। उनके अभिनय में सख्ती है.. अपनापन है और बिना ज्यादा बोले अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का हुनर भी।
ऋत्विक भौमिक जय के किरदार में सहज हैं। पत्नी को खोने का दुख और परिवार के बीच अपनी जिंदगी के फैसलों को लेकर उनकी उलझन, दोनों उनके अभिनय में नजर आते हैं। 'बंदिश बैंडिट्स' और 'खाकी: द बंगाल चैप्टर' के बाद यहां भी उनका स्क्रीन प्रेजेंस आकर्षक है।
आयशा रजा मिश्रा अमृता के किरदार में जंचती हैं। वह उस भारतीय मां की तरह लगती हैं, जो बच्चों के लिए अच्छा ही चाहती है, लेकिन कई बार अपनी सोच को ही सही मान बैठती है।
तराना राजा, अभय कौल और गौरव के. शर्मा समेत बाकी कलाकार भी परिवार की इस तस्वीर को विश्वसनीय बनाते हैं। सहायक कलाकारों का तालमेल अच्छा है....सभी मिलकर बड़े परिवार का माहौल रचते हैं।
मीठे में क्या है रिव्यू
- फोटो : यूट्यूब
निर्देशन: घर की नोकझोंक में है फिल्म की मिठास
राधिका बंसल ने बड़े एक्शन या लाउड मेलोड्रामा के बजाय संवादों और किरदारों के आपसी रिश्तों पर भरोसा किया है। लखनऊ का घर, दिवाली की तैयारियां, रिश्तेदारों की दखलअंदाजी और परिवार के भीतर की खामोशियां फिल्म को घरेलू रंग देती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि राधिका के पास पहले फिल्म सेट पर काम करने का अनुभव नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने इस मल्टी-जेनरेशनल कहानी को लिखा और इतने सारे मंझे हुए कलाकारों को निर्देशित किया। एक नए निर्देशक के लिए यह कोशिश तारीफ के काबिल है। अमित त्रिवेदी का संगीत भी फिल्म के त्योहार वाले माहौल का हिस्सा है।
राधिका बंसल ने बड़े एक्शन या लाउड मेलोड्रामा के बजाय संवादों और किरदारों के आपसी रिश्तों पर भरोसा किया है। लखनऊ का घर, दिवाली की तैयारियां, रिश्तेदारों की दखलअंदाजी और परिवार के भीतर की खामोशियां फिल्म को घरेलू रंग देती हैं।
दिलचस्प बात यह है कि राधिका के पास पहले फिल्म सेट पर काम करने का अनुभव नहीं था। इसके बावजूद उन्होंने इस मल्टी-जेनरेशनल कहानी को लिखा और इतने सारे मंझे हुए कलाकारों को निर्देशित किया। एक नए निर्देशक के लिए यह कोशिश तारीफ के काबिल है। अमित त्रिवेदी का संगीत भी फिल्म के त्योहार वाले माहौल का हिस्सा है।
मीठे में क्या है रिव्यू
- फोटो : यूट्यूब
फिल्म की कमियां
कहानी में नयापन कम: परिवार का त्योहार पर जुटना, पुरानी शिकायतों पर बहस और आखिर में रिश्तों का सुधरना। हिंदी सिनेमा में यह फॉर्मूला पहले भी कई बार आजमाया जा चुका है। ऐसे में 'मीठे में क्या है' की कहानी कई जगह जानी-पहचानी लगती है। इसमें कुछ ऐसे मोड़ नहीं हैं, जो दर्शकों को चौंकाएं।
वही पुराना पारिवारिक ड्रामा: बच्चों की शादी की चिंता, रिश्तेदारों की बेवजह दखलअंदाजी और पुरानी-नई पीढ़ी के बीच सोच का टकराव। फिल्म इन मुद्दों को तो उठाती है, लेकिन इन्हें पेश करने का अंदाज बहुत अलग नहीं है। कुछ प्रसंग पहले देखे हुए लगते हैं।
रफ्तार पड़ती है धीमी: करीब दो घंटे की इस फिल्म में संवादों और पारिवारिक बातचीत पर ज्यादा जोर है। यही वजह है कि कुछ दृश्य लंबे खिंचते हैं। कहानी में थोड़ी और कसावट होती, तो इसका असर ज्यादा गहरा हो सकता था।
कहानी में नयापन कम: परिवार का त्योहार पर जुटना, पुरानी शिकायतों पर बहस और आखिर में रिश्तों का सुधरना। हिंदी सिनेमा में यह फॉर्मूला पहले भी कई बार आजमाया जा चुका है। ऐसे में 'मीठे में क्या है' की कहानी कई जगह जानी-पहचानी लगती है। इसमें कुछ ऐसे मोड़ नहीं हैं, जो दर्शकों को चौंकाएं।
वही पुराना पारिवारिक ड्रामा: बच्चों की शादी की चिंता, रिश्तेदारों की बेवजह दखलअंदाजी और पुरानी-नई पीढ़ी के बीच सोच का टकराव। फिल्म इन मुद्दों को तो उठाती है, लेकिन इन्हें पेश करने का अंदाज बहुत अलग नहीं है। कुछ प्रसंग पहले देखे हुए लगते हैं।
रफ्तार पड़ती है धीमी: करीब दो घंटे की इस फिल्म में संवादों और पारिवारिक बातचीत पर ज्यादा जोर है। यही वजह है कि कुछ दृश्य लंबे खिंचते हैं। कहानी में थोड़ी और कसावट होती, तो इसका असर ज्यादा गहरा हो सकता था।
मीठे में क्या है ट्रेलर
- फोटो : वीडियो ग्रैब
देखें या नहीं?
'मीठे में क्या है' देखते हुए कई बार अपने ही परिवार के किसी सदस्य की याद आ सकती है। कोई नानी की तरह अपनी बात मनवाता है,...तो कोई अमृता की तरह बच्चों की जिंदगी को लेकर जरूरत से ज्यादा परेशान रहता है। यही पहचान फिल्म को देखने लायक बनाती है। हालांकि, करीब दो घंटे की कहानी में कुछ नया देखने को नहीं मिलता। फिल्म रिश्तों की अहमियत तो समझाती है, लेकिन अपनी कहानी से लंबे समय तक याद रहने वाला असर नहीं छोड़ पाती।
'मीठे में क्या है' देखते हुए कई बार अपने ही परिवार के किसी सदस्य की याद आ सकती है। कोई नानी की तरह अपनी बात मनवाता है,...तो कोई अमृता की तरह बच्चों की जिंदगी को लेकर जरूरत से ज्यादा परेशान रहता है। यही पहचान फिल्म को देखने लायक बनाती है। हालांकि, करीब दो घंटे की कहानी में कुछ नया देखने को नहीं मिलता। फिल्म रिश्तों की अहमियत तो समझाती है, लेकिन अपनी कहानी से लंबे समय तक याद रहने वाला असर नहीं छोड़ पाती।