Pyaar Hai Toh Hai Review: डेब्यू फिल्म में ही अटक गए हरिहरन के बेटे करण, पाणि कश्यप ने किया सबसे ज्यादा निराश
गायक हरिहरन के बेटे करण हरिहरन अपने पिता की तरह गायक में करियर न बनाकर बतौर अभिनेता हिंदी फिल्म 'प्यार है तो है' के जरिए हिंदी सिनेमा के कदम रख रहे हैं। त्रिकोणीय प्रेम पर आधरित इस फिल्म इस फिल्म के जरिए पाणि कश्यप भी बतौर अभिनेत्री अपने कैरियर की शुरुआत कर रही हैं। नितिन मुकेश और उदित नारायण के बाद हरिहरन ने भी अपने बेटे को एक्टिंग में किस्मत आजमाने की छूट दी है। बतौर अभिनेता करण में आत्मविश्वास भी है और वह नील और आदित्य से बेहतर कलाकार भी मालूम होते हैं, लेकिन अपनी पहली फिल्म के रूप में उन्होंने टीम सही नहीं चुनी है।
फिल्म 'प्यार है तो है' की कहानी अरमान और निम्मो की है। दोनों बचपन से बहुत ही करीबी दोस्त हैं। निम्मो हर बात अरमान से साझा करती है। धीर-धीरे दोनों के बीच एक मजबूत रिश्ता बन जाता है। अरमान के मन में निम्मो के प्रति प्रेम की भावनाएं विकसित होने लगती हैं, लेकिन अरमान कभी भी अपने दिल की बात निम्मो से नहीं कह पाता है। निम्मी अपने नए पड़ोसी विकास के प्यार में पड़ जाती है। लेकिन विकास का प्यार सिर्फ एक छलावा है। विकास उसे धोखा देता है, लेकिन निम्मो हर हाल में विकास से ही शादी करना चाहती है। इसी ताने बाने के साथ फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है।
आमतौर देखा गया है कि फिल्मों में डेब्यू के लिए प्रेम कहानी पर आधरित ही फिल्मों का चयन किया जाता है। इस फिल्म में प्रेम से ज्यादा दोस्ती के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। प्रेम की अपनी एक मर्यादा और सीमा होती है, लेकिन दोस्ती की कोई भी सीमा नहीं होती है। दोस्ती निभाने के लिए पीछे नहीं हटना चाहिए, इसी सोच के तहत अरमान, निम्मो की शादी विकास से करवा देता है। लेकिन ऐसी फिल्मों का कलाइमेक्स क्या होता है, ये सबको पता है, बस वहां तक का सफर निर्देशक कैसे पूरा करेगा, असल खेल इस तरह की प्रेम कहानियों का यही होता है।
फिल्म 'प्यार है तो है' में प्रेम के प्रति त्याग, समर्पण की भावना के साथ इस बात पर भी जोर दिया गया है कि मां बाप को दुखी करके कोई भी बच्चा खुश नहीं रह सकता है। लेकिन मां बाप की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चे की समस्याओं को समझे। पड़ोसियों की शिकायत पर अपने बच्चे के लिए घर के दरवाजे बंद कर देना कोई समस्या का समाघान नहीं होता है, बल्कि इससे समस्या और भी बढ़ जाती है। फिल्म के निर्देशक प्रदीप आर के चौधरी ने प्रेम कहानी के साथ- साथ दोस्ती और पारिवारिक मूल्यों की बात कही है। मुकुल शर्मा की जैसी कहानी घिसी पिटी है, वैसा ही निर्देशन प्रदीप आर के चौधरी ने कर दिया है।
नवोदित अभिनेता करण हरिहरन ने पहली फिल्म के हिसाब से अभिनय ठीक किया है। अगर उन्होंने सीखना जारी रखा और अगली फिल्मों का चयन बेहतर किया तो उनकी गाड़ी चल निकलेगी। पाणि कश्यप के लिए इस फिल्म के बाद आगे की राह कठिन होने वाली है। भावनात्मक सीन में वह काफी कमजोर दिखी हैं, और दर्शकों की उम्मीदों पर भी खरी नहीं उतर सकी हैं। विकास की भूमिका में अभिषेक दुहान ने भी कोशिश तो अच्छी की, लेकिन नकरात्मक भूमिका में चेहरे के जो हाव भाव होने चाहिए वह प्रकट नहीं कर पाए।
तकनीकी कौशल के हिसाब से सुनीता राडिया की सिनेमैटोग्राफी अच्छी है। इस फिल्म की शूटिंग ऋषिकेश और मसूरी में हुई है, वहां की सुंदर लोकेशन को सुनीता राडिया ने फिल्म में अच्छे से पेश किया है। फिल्म के कुछ ऐसे भी दृश्य से हैं, जिसका मूल कहानी से कुछ खास मतलब नहीं था लेकिन दो घंटे दो मिनट की फिल्म में एडिटर विकास ने उन दृश्यों पर कैंची इसलिए नहीं चलाई होगी, क्योंकि फिल्म छोटी हो सकती थी। अनिक और बॉबी-इमरान का संगीत कर्णप्रिय हैं, अगर फिल्म के गानों को सही तरीके से प्रमोट किया गया होता तो इसका फायदा फिल्म को मिल सकता था।