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फैंटम समीक्षाः सिनेमाघर में घुसोगे तो पछताओगे

Fri, 18 Sep 2015 06:44 PM IST
Updated Fri, 18 Sep 2015 06:44 PM IST
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Phantom movie review in hindi

-निर्माताः यूटीवी

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-निर्देशकः कबीर खान
-सितारेः सैफ अली खान, कैटरीना कैफ
-रेटिंग *1/2

फैंटम का प्रचार कुछ यूं किया गया मानो इसे पाकिस्तान में रिलीज करने के लिए बनाया गया है! वहां रिलीज पर रोक लगने के बाद निर्माता-निर्देशक द्वारा मचाई गई हायतौबा पब्लिसिटी स्टंट से ज्यादा नहीं है।

फैंटम देखते हुए यह समझना रॉकेट साइंस नहीं है कि वहां क्यों इसे दिखाने की अनुमति नहीं मिलेगी? पाकिस्तान कभी नहीं मानता कि उसकी जमीन का इस्तेमाल आतंकी भारत पर हमलों के लिए कर रहे हैं और उसकी खुफिया एजेंसियां/सैन्य अधिकारी इसमें उन्हें मदद दे रहे हैं। फैंटम यही दिखाती है। परंतु सवाल यह है कि कैसे?
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एस हुसैन जैदी अपराध बीट के शानदार पत्रकार-लेखक हैं। उनकी किताब ब्लैक फ्राइडे पर निर्देशक अनुराग कश्यप इसी नाम की बेहतरीन फिल्म हमें दे चुके हैं। अब जैदी की ही एक अन्य पुस्तक को आधार बना कर कबीर ने फैंटम बनाई है। मगर....

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इसको छोड़ दें फिल्म में कुछ भी उत्तेजित करने जैसा नहीं

Phantom movie review in hindi

सीरिया के युद्धग्रस्त लोकेशन छोड़ दें फिल्म में कुछ भी उत्तेजित करने जैसा नहीं है। भारतीय सेना से निकाल दिया गया एक अफसर (सैफ अली खान) 26/11 के मुंबई हमलों की योजना बनाने और अंजाम देने वालों को एक-एक कर ठिकाने लगा देता है। ...और यह सब काल्पनिक है।

उल्लेखनीय है कि अजमल कसाब जैसे प्यादे को छोड़ मुंबई हमलों के जिंदा गुनहगारों को आज तक कोई सजा नहीं मिली है। यह फिल्म एक बोर फंतासी की तरह सामने आती है।

हर भारतीय चाहता है कि पाकिस्तान में छुपे आतंकियों को पकड़ कर भारत लाया जाए या उन्हें सजा मिले। परंतु फिल्म इस भावना को पर्दे पर उतार पाने में नाकाम है। बचकानी और अतार्किक घटनाओं के साथ हीरो अपने मिशन को अंजाम देते चलता है।

जबकि भारत सरकार इस पर अंधेरे में है। अतः आखिर में हीरो की शहादत गुमनाम रह जाती है। अंतिम दृश्य में ताज होटल के सामने खड़ी हीरोइन हीरो के नाम के चाय का प्याला पीते हुए उसे भावनात्मक रूप से याद करती है।

कैटरीना के होने से रोमांस का अंदाजा मत लगाइएगा

Phantom movie review in hindi

फैंटम की सबसे बड़ी समस्या उसका सपाट होना है। कहानी में रोमांच, सस्पेंस या उतार-चढ़ाव नहीं है। कैटरीना के होने से रोमांस का अंदाजा मत लगाइएगा। 26/11 के गुनहगारों के चरित्र और गुनाह भी ठीक से नहीं उभरते। ऐक्शन के नाम पर बंदूकें और मशीनगनें चलती हैं। जीप या कारें तेज रफ्तार से भागती हैं। हीरो ग्लोबल नागरिक की तरह सरहदों को पार करता हुआ कभी इंग्लैंड, कभी अमेरिका, कभी सीरिया और अंततः पाकिस्तान पहुंचता है।

हर जगह उसे बिना खास मशक्कत और मुश्किल के फतह मिलती है। हीरो की बहादुरी और समझदारी को टक्कर देने वाला यहां कोई नहीं है। लेकिन यह हीरो न तो रॉकी है और न रैंबो। सैफ अली खान पूरी फिल्म में चिड़चिड़े-से नजर आते हैं। बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी के लिए उन्हें और इंतजार करना होगा। कैटरीना दो-एक दृश्यों को छोड़ अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं करा पातीं। फिल्म की स्क्रिप्ट कमजोर है।

भावनाओं का ज्वार यहां गायब है

Phantom movie review in hindi

बजरंगी भाईजान में कबीर खान ने भारत-पाक के आम जनों के बीच मैत्री और भाईचारे का संदेश दिया था, इस बार वह अंदर घुस कर पाकिस्तानी आतंकियों को ठिकाने लगाने की बात कर रहे हैं। यूं तो यह बात भी लोगों को ठीक लगती है क्योंकि अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को ऐसे ही मारा था।

परंतु कबीर फैंटम में प्रभाव नहीं छोड़ते क्योंकि भावनाओं का ज्वार यहां गायब है। गीत-संगीत नजरअंदाज करने जैसा। फिल्म न मनोरंजन करती है और न ठोस संदेश देती है। बजरंगी भाईजान के विपरीत यह फंतासी गले नहीं उतरती। बिना सोचे-समझे सिनेमाहॉल में घुसेंगे तो पछताएंगे।

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