Mrs Hindi Movie Review: रीमेक के जाल में इस बार फंसी सान्या मल्होत्रा, जेन जी के जमाने में बीती सदी की फिल्म
एक और हफ्ता, एक और रीमेक, और, एक और फिल्म का अपने समय के दर्शकों से सीधा तारतम्य न बिठा पाने की कमजोरी। हिंदी सिनेमा अपनी अलग काल्पनिक दुनिया में खोता दिख रहा है। वह कहानियां साउथ से पहले भी उठाता रहा है। लेकिन, तब के सिनेकार वहां के मनोविज्ञान को समझकर उसे हिंदी सिनेमा के दर्शक के हालात के मुताबिक नए रूप में ढाल लेते थे। अबके सिनेमा के सूरमाओं की समस्या दूसरी ही है। इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल भारत में हो तो वहां शो खत्म होते ही बता देंगे कि इसका रिव्यू इसके सिनेमाघरों या ओटीटी, जहां पर भी पहले हो, वहां रिलीज होने से पहले लिखना मना है। लेकिन, यही चौधराहट इनकी विदेशी फिल्म फेस्टिवल में नहीं चलती। फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जाने वाली फिल्मों की समीक्षाएं लिखने की पाबंदी गोवा फिल्म फेस्टिवल के अलावा भी दुनिया के किसी दूसरे फिल्म फेस्टिवल में होती होगी, लगता तो नहीं है।
फिल्म जियो की, ओटीटी जी का!
फिल्म ‘मिसेज’ जैसा कि नाम से जाहिर है, एक ब्याहता की कहानी है। फिल्म को गोवा फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया तो शो हाउसफुल था। फेस्टिवल में मुख्य धारा की कोई फिल्म चलकर आ जाए तो इतना उत्साहित होना तो बनता है। संकेत इसका ये है कि लोग सिनेमाघरों में फिल्में देखने के लिए दांत चियारे बैठे रहते हैं। फिल्म तो कोई बनाए जो उनको बुक्का फाड़कर रोने या फिर ठहाका लगाकर हंसने का मौका दे। जियो स्टूडियोज इस फिल्म की निर्माता कंपनी है। अभिनेता से निर्माता बने हरमन बावेजा ने उसी के सहयोग से फिल्म बनाई। जियो का अपना ओटीटी एप भी है, लेकिन ये फिल्म रिलीज हो रही है जी के ओटीटी जी5 पर। कौटिल्य का अर्थशास्त्र भी ये समझने में फेल है कि नेटवर्क18 के पास जब वूट ओटीटी हुआ करता था, तब उसकी सीरीज नेटफ्लिक्स पर आती थी। अब जियो सिनेमा है तो मामला जी5 तक पहुंच रहा है। जियो सिनेमा भी अपने ग्राहकों से पैसे लेता है, वूट भी लेता था, लेकिन जरा सा भी बेहतर फिल्म या सीरीज जियो स्टूडियोज की दिखे तो वह इस ओटीटी पर नहीं आती।
फिर सीधे थर्ड गियर में सान्या का गाड़ी
सान्या मल्होत्रा की गाड़ी ऐसे किरदारों में स्टार्टिंग प्वाइंट से ही थर्ड गियर में आ जाती है जहां पूरा का पूरा फोकस उनके किरदार पर ही हो। ‘दंगल’बाला इसके पहले ‘पगलैट’ और ‘कटहल’ में भी ऐसा कर चुकी हैं। ये तीनों की तीनों फिल्में डार्क ह्यूमर श्रेणी की फिल्में मानी जा सकती हैं। और, इन तीनों फिल्मों में सान्या मल्होत्रा के कंधे पर पूरी फिल्म को खींचने की जिम्मेदारी रही। निर्देशक आरती कडव की चर्चा इसके पहले फिल्म ‘कार्गो’ को लेकर खूब हुई। इस बार उन्होंने एक मलयालम फिल्म ‘द ग्रेट इंडियन किचन’ का रीमेक बनाया है। नृत्य में महारत हासिल कर चुकी एक युवती शादी होकर डॉक्टरों के एक ऐसे परिवार में आ जाती है, जिसके मर्दों को कैसरॉल में रखी गर्म रोटी खाना भी अपनी तौहीन लगती है। उन्हें सीधे चूल्हे से उतरी हुई रोटी यानी फुल्के अपनी प्लेट में चाहिए। बाप-बेटा दोनों एक ही रोग से ग्रसित दिखते हैं और वह हैं खामखां की मर्दों वाली चौधराहट। मसलन पिताजी को मिक्सी और सिलबट्टे में पिसी गई चटनियों की इतनी परख है, कि चखते ही बता देते हैं। बिरयानी उन्हें दम लगाकर पकाई हुई चाहिए। कुकर में बने तो वह इसे पुलाव कहते हैं। लप्पड़ क्यों नहीं मारता इन दोनों को कोई।
लकड़ी जल कोयला भई, कोयला जल भई राख
देखा, सिर्फ तीन लाइनें पढ़ने में आपको झुंझलाहट हो गई, सोचिए उस नवब्याहता को जिसे ये रोज झेलना पड़ रहा है। कहानी की अंतर्धारा सा बहता घर की किचन का एक पाइप है। ये बूंद बूंद टपकना शुरू होता है। उधर बहू का मानसिक त्रास बढ़ता जाता है। इधर पाइप से रिसने वाले पानी की रफ्तार बढ़ती जाती है। पति महिलाओं का डॉक्टर है। उसे इस बात की गिनती करनी आती है कि मासिक धर्म के कितने दिन बाद संभोग करो तो पत्नी शर्तिया गर्भवती होगी! उसे अपनी पत्नी की और कोई परवाह नहीं। घड़ा तो नहीं लेकिन किचन में रिसते पाइप के नीचे रखी बाल्टी जरूर भरने लगती है। और, जैसे पाप का घड़ा फूटे तो सत्यानाश तय है, वैसे ही यहां खिचखिच की बाल्टी भरती है और सवा सत्यानाश कर देती है। कहानी सपाट है। बहुत ज्यादा सिनेमाई प्रयोगों की यहां गुंजाइश नहीं है। मलयालम सिनेमा अधिकतर ऐसा ही होता है। वहां पिक्चर बनाने वाले ग्लैमर पर नहीं कहानी पर खेलते हैं। उन्हें अपना दर्शक वर्ग बहुत सटीक पता है। आरती कडव को पता ही नहीं कि ये फिल्म उन्होंने किसके लिए बनाई, सिनेमा हॉल जाने वाले दर्शकों के लिए या फिर मोबाइल, लैपटॉप या कहीं भी फिल्म देख लेने वालों के लिए!
कास्टिंग में भी करिश्मा दिखाने से चूकी
अपनी निर्देशक जैसी ही कन्फ्यूज ये फिल्म भी है और फिल्म के कलाकार भी। पति का किरदार कर रहे निशांत दहिया का अभिनय ऐसा ही कि जैसे उन्हें पता ही नहीं कि उनका किरदार काला है या सफेद या फिर स्याह जैसा है? वह इन तीनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश वाला तनाव शुरू से आखिर तक अपने चेहरे पर लादे रहते हैं। कंवलजीत सिंह का इन दिनों ओटीटी काल चल रहा है। ‘आईसी 814’ में वह अपने तटस्थ भाव के साथ दिखे थे। पेट साफ न होने पर चेहरे पर रहने वाला तनाव जैसा अभिनय उनका यहां भी है। अभी सोनी लिव पर आई एक सीरीज ‘बड़ा नाम करेंगे’ में भी वह कुछ ऐसा ही रूप लिए दिख रहे हैं। वरुण बडोला का रोल छोटा है लेकिन वह इस स्पेशल अपीयरेंस में भी अपना असर छोड़ जाते हैं।
‘मैं चुप नहीं रहूंगी’ वाले दौर की फिल्म
और, अब बात फिल्म की हीरोइन सान्या मल्होत्रा की। ये सच है कि नितेश तिवारी की ‘दंगल’ से शुरू हुए सफर में वह अपने साथ दिखीं फातिमा सना शेख से मीलों आगे निकल आई हैं। फातिमा की परेशानियां दूसरी रही हैं। सान्या अच्छी डांसर हैं। रील्स वगैरह भी खूब बनाती हैं और लोग उनकी रील्स देखते भी खूब हैं। और, उनके अभिनय पर भी उनका असर दिखता है। वह तीन मिनट लंबे सीन में बहुत मुश्किल से दर्शकों को बांधे रख पाती हैं। उनकी निर्देशक आरती कडव उनके साथ दर्शकों की संवेदनाएं जोड़ने में ही आधी फिल्म खर्च कर देती हैं। फिल्म के उत्तरार्ध में दोनों की जुगलबंदी असरदार होती दिखती है लेकिन कहानी में कुछ खास हो न रहा हो तो दर्शक ओटीटी पर तुरंत फिल्म बदल देते हैं। गीत-संगीत के लिहाज से भी फिल्म में कुछ खास मनोरंजन जैसा है नहीं। पति-पत्नी के बीच जेन जी के दौर में बदलते समीकरणों से पूरी तरह अनजान ये फिल्म ‘मैं चुप नहीं रहूंगी’ के दौर की फिल्म जान पड़ती है। और, इतना बासी स्वाद भला आज के दौर में किसे ही पसंद आएगा!