{"_id":"5c8aa1fcbdec22145f538a97","slug":"movie-review-of-photograph","type":"story","status":"publish","title_hn":"Film Review: सेल्फी के दौर में आउटडेटेड फिल्म है 'फोटोग्राफ'","category":{"title":"Movie Review","title_hn":"फिल्म समीक्षा","slug":"movie-review"}}
Film Review: सेल्फी के दौर में आउटडेटेड फिल्म है 'फोटोग्राफ'
Fri, 15 Mar 2019 12:18 AM IST
Mishra Mishra
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
मुंबई डेस्क, अमर उजाला
Published by: Mishra Mishra
Updated Fri, 15 Mar 2019 12:18 AM IST
विज्ञापन
Photograph Movie
- फोटो : social media
फिल्म रिव्यू: फोटोग्राफ
कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सान्या मल्होत्रा, विजय राज, जिम सर्भ
निर्देशक: रितेश बत्रा
रेटिंग: **
हिंदुस्तान से दूर रहने वालों को अपने वतन की मिट्टी का एक अनोखा खाका दुनिया वालों के सामने पेश करने की हमेशा पिनक सी चढ़ी रहती है। रितेश बत्रा अमेरिका में रहते हैं। हिंदुस्तान की खुशबू कभी 'लंच बॉक्स' जैसी फिल्म से दुनिया में फैलाते हैं तो कभी फोटोग्राफ जैसी फिल्म से सारा किए धरे का ब्लैक एंड व्हाइट कर देते हैं। मुंबई को एक अलग रोशनी में देखने की कोशिश रितेश बत्रा करते तो हैं लेकिन ये कोशिश उनको कहां ले जा रही है, वह खुद नहीं जानते।
रफीक मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया के आसपास लोगों की फोटो खींचकर गुजारा करता है। मिलोनी एक्टर बनना चाहती थी पर बन नहीं पाई। मां-बाप के सपने पूरे करने के लिए सीए की पढ़ाई कर रही है। रफीक और मिलोनी की मुलाकात दिलचस्प है। कहानी मोड़ तब लेती है जब रफीक की दादी उससे शादी की जिद करने लगती हैं।
रफीक उन्हें मिलोनी की फोटो दिखाकर कहता है, लड़की मिल गई है। अब दादी हैं। रफीक है। मिलोनी है। और है एक अनोखा तरह का प्यार, जो कहता है कि प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो। दोनों के बीच प्यार का दीया धीरे धीरे जलता तो है, लेकिन उसकी रोशनी इस प्यार को उजागर करने में थोड़ा समय लेती है। और, सेल्फी के दौर में फोटोग्राफ के लिए समय किसके पास है।
विज्ञापन
नवाजुद्दीन अच्छे अभिनेता हैं। 'मंटो' और 'ठाकरे' जैसी फिल्मों में वह वही लगे जो किरदार उनके काबू में था। लेकिन, आम आदमी का किरदार करने में उनके भीतर का नवाजुद्दीन जाग जाता है। उनके सामने चुनौती ना हो तो वह खुद को ढीला छोड़ देते हैं। शाहरुख खान, मनोज बाजपेयी से लेकर नवाजुद्दीन तक तीनों की यही सबसे बड़ी कमजोरी है।
निर्देशक ढीला पड़ा नहीं कि फिर किरदार गायब हो जाता है, कलाकार ही पूरी फिल्म में हावी हो जाता है।सान्या मल्होत्रा से एक्टिंग होती नहीं, वह बस कैमरे पर एहसान सा करती दिखती हैं। हां, दादी के रोल में फारूख जफर का काम जरूर याद रह जाता है।
रितेश बत्रा ने 'लंच बॉक्स' से हिंदी सिनेमा में एक उम्मीद जताई थी। उम्मीद फिल्म फोटोग्राफ में भी दिखती है लेकिन ये उम्मीद इस बार रितेश बत्रा को अपन प्रशंसकों से भी रही कि वह जो कुछ परदे पर चल घट रहा है, उसे वह निर्देशक के हिसाब से खुद ही समझ लेंगे। लेकिन, सिनेमा का यही सबक है कि दर्शक कितना ही बुद्धिमान हो, समझना वह हर बात निर्देशक के नजरिए से ही चाहता है।
फिल्म के म्यूजिक के लिए रितेश ने ओल्डी गोल्डीज का सहारा लिया है, लेकिन ये गाने यहां फिल्म को सहारा इसलिए नहीं दे पाता क्योंकि न तो नवाजुद्दीन और ना ही सान्या में इन गानों के दौर के कलाकारों सा लार्जर दैन लाइफ आकर्षण है। फिल्म तकनीकी रुप से भी उतनी परफेक्ट नहीं है जितनी कि लंचबॉक्स थी।
मनोज बाजपेयी वाली राह पर चल निकले नवाजुद्दीन की ये फिल्म दिल पे मत ले यार के दोराहे पर है। और गलती वही हुई जो एक अच्छा अभिनेता सुपरस्टार बनने की चाहत में हर दौर में करता रहा है। अमर उजाला डॉट कॉम के वीकली रिव्यू में फिल्म फोटोग्राफ को मिलते हैं दो स्टार।
विज्ञापन
कलाकार: नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सान्या मल्होत्रा, विजय राज, जिम सर्भ
निर्देशक: रितेश बत्रा
रेटिंग: **
हिंदुस्तान से दूर रहने वालों को अपने वतन की मिट्टी का एक अनोखा खाका दुनिया वालों के सामने पेश करने की हमेशा पिनक सी चढ़ी रहती है। रितेश बत्रा अमेरिका में रहते हैं। हिंदुस्तान की खुशबू कभी 'लंच बॉक्स' जैसी फिल्म से दुनिया में फैलाते हैं तो कभी फोटोग्राफ जैसी फिल्म से सारा किए धरे का ब्लैक एंड व्हाइट कर देते हैं। मुंबई को एक अलग रोशनी में देखने की कोशिश रितेश बत्रा करते तो हैं लेकिन ये कोशिश उनको कहां ले जा रही है, वह खुद नहीं जानते।
रफीक मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया के आसपास लोगों की फोटो खींचकर गुजारा करता है। मिलोनी एक्टर बनना चाहती थी पर बन नहीं पाई। मां-बाप के सपने पूरे करने के लिए सीए की पढ़ाई कर रही है। रफीक और मिलोनी की मुलाकात दिलचस्प है। कहानी मोड़ तब लेती है जब रफीक की दादी उससे शादी की जिद करने लगती हैं।
विज्ञापन
रफीक उन्हें मिलोनी की फोटो दिखाकर कहता है, लड़की मिल गई है। अब दादी हैं। रफीक है। मिलोनी है। और है एक अनोखा तरह का प्यार, जो कहता है कि प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम ना दो। दोनों के बीच प्यार का दीया धीरे धीरे जलता तो है, लेकिन उसकी रोशनी इस प्यार को उजागर करने में थोड़ा समय लेती है। और, सेल्फी के दौर में फोटोग्राफ के लिए समय किसके पास है।
विज्ञापन
नवाजुद्दीन अच्छे अभिनेता हैं। 'मंटो' और 'ठाकरे' जैसी फिल्मों में वह वही लगे जो किरदार उनके काबू में था। लेकिन, आम आदमी का किरदार करने में उनके भीतर का नवाजुद्दीन जाग जाता है। उनके सामने चुनौती ना हो तो वह खुद को ढीला छोड़ देते हैं। शाहरुख खान, मनोज बाजपेयी से लेकर नवाजुद्दीन तक तीनों की यही सबसे बड़ी कमजोरी है।
निर्देशक ढीला पड़ा नहीं कि फिर किरदार गायब हो जाता है, कलाकार ही पूरी फिल्म में हावी हो जाता है।सान्या मल्होत्रा से एक्टिंग होती नहीं, वह बस कैमरे पर एहसान सा करती दिखती हैं। हां, दादी के रोल में फारूख जफर का काम जरूर याद रह जाता है।
रितेश बत्रा ने 'लंच बॉक्स' से हिंदी सिनेमा में एक उम्मीद जताई थी। उम्मीद फिल्म फोटोग्राफ में भी दिखती है लेकिन ये उम्मीद इस बार रितेश बत्रा को अपन प्रशंसकों से भी रही कि वह जो कुछ परदे पर चल घट रहा है, उसे वह निर्देशक के हिसाब से खुद ही समझ लेंगे। लेकिन, सिनेमा का यही सबक है कि दर्शक कितना ही बुद्धिमान हो, समझना वह हर बात निर्देशक के नजरिए से ही चाहता है।
फिल्म के म्यूजिक के लिए रितेश ने ओल्डी गोल्डीज का सहारा लिया है, लेकिन ये गाने यहां फिल्म को सहारा इसलिए नहीं दे पाता क्योंकि न तो नवाजुद्दीन और ना ही सान्या में इन गानों के दौर के कलाकारों सा लार्जर दैन लाइफ आकर्षण है। फिल्म तकनीकी रुप से भी उतनी परफेक्ट नहीं है जितनी कि लंचबॉक्स थी।
मनोज बाजपेयी वाली राह पर चल निकले नवाजुद्दीन की ये फिल्म दिल पे मत ले यार के दोराहे पर है। और गलती वही हुई जो एक अच्छा अभिनेता सुपरस्टार बनने की चाहत में हर दौर में करता रहा है। अमर उजाला डॉट कॉम के वीकली रिव्यू में फिल्म फोटोग्राफ को मिलते हैं दो स्टार।