Leo Review: फूट गया लोकेश कनगराज के सिनेमैटिक यूनिवर्स का बुलबुला, दर्शकों ने पूरी तरह नकार दी विजय की फिल्म
फिल्म ‘लियो’ की कहानी पार्थिबन से शुरू होती है जो अपनी पत्नी सत्या और दो बच्चों के साथ हिमाचल प्रदेश में शांति से एक कॉफी शॉप चला रहा है। एक दिन कुछ गुंडे पार्थिबन के कैफे पर हमला करते हैं और उसकी बेटी और वहां काम करने वाले एक कर्मचारी को जान से मारने की धमकी देते हैं। पार्थिबन जब गैंगस्टरों को मरता है तो एंटनी और हेरोल्ड की नजर में आ जाता है। एंटनी दास और हेरोल्ड दास को लगता है कि पार्थिबन उसका बिछड़ा हुआ रिश्तेदार लियो दास है। यह लियो दास कौन है? जिसकी वजह से पार्थिबन की सीधी साधी जिंदगी में उथल-पुथल मच जाता है और इससे वह कैसे बाहर निकलता है। फिल्म की कहानी यही है, इस फिल्म को पूरी तरह से समझने के लिए लोकेश कनगराज की पहले की फिल्में 'कैथी' और 'विक्रम' देखनी कितनी जरूरी है, ये इस फिल्म को देखे बिना ही समझा जा सकता है।
फिल्म ‘लियो’ शुरुआत बहुत धीमी गति से होती है। लेकिन जब फिल्म की कहानी में लियो दास की एंट्री होती है तो कहानी की गति तेज हो जाती है। एक सामान्य व्यक्ति पार्थिबन अपने परिवार को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इस किरदार के जरिए लोकेश कनगराज ने एक आम आदमी की आवाज को उठाया है जो अपने परिवार की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता है, भले ही इसके लिए उन्हें अपनी जान जोखिम में डालनी पड़े। वहीं, लियो दास के किरदार के साथ अपना एलसीयू भी स्थापित कर लिया। लेकिन अगर लोकेश की पहले की फिल्में देखे तो उसमे एक जबरदस्त कहानी होती थी। इस फिल्म में लोकेश ने चालाकी यह दिखाई कि जहां कहानी थोड़ी कमजोर पड़ती दिखी वहां उन्होंने एक्शन सीन डाल कर उसी कमी को पूरी करने की कोशिश की।
कहते हैं कि अति सर्वदा वर्जयेत। वही, इस फिल्म में दिखा। जरूरत से ज्यादा एक्शन सीन कहानी को कमजोर ही बनाते है जिसकी वजह से संजय दत्त और अर्जुन के किरदार ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाते हैं। इंटरवल के बाद फिल्म की गति एक बार फिर से धीमी हो जाती है और कमजोर कहानी को फ्लैशबैक दृश्यों के साथ आगे बढ़ाने की कोशिश की गई है। इस फिल्म की कहानी निर्देशक लोकेश कनगराज ने रत्न कुमार और धीरज वैद्य के साथ मिलकर लिखी है। फिल्म के बाकी पहलुओं पर जितना ध्यान दिया गया है अगर कहानी को थोड़ा सा और सशक्त बनाने के लिए मेहनत की गई होती तो इस फिल्म को एक्शन के साथ देखने का कुछ और ही रोमांच होता।
फिल्म में अनिरुद्ध रविचंद्रन का बैकग्राउंड स्कोर कुछ हिस्सों में अच्छा है। लेकिन अगर उनकी पिछली फिल्म 'विक्रम' से तुलना करे तो उस मामले में इस फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर थोड़ा कमजोर है। फिल्म के गानों का हिंदी में सही अनुवाद होता तो शायद फिल्म के गाने सुनने में थोड़े से अच्छे लगते। हां, मनोज परमहंस की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। लकड़बग्घे वाले सीन में वीएफएक्स का अच्छा प्रयोग हुआ है। पूरी तरह से एक्शन मसाला फिल्म में ‘लियो’ अगर कहानी पर थोड़ा और काम किया गया होता तो यह एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी।