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Leo Review: फूट गया लोकेश कनगराज के सिनेमैटिक यूनिवर्स का बुलबुला, दर्शकों ने पूरी तरह नकार दी विजय की फिल्म

Thu, 19 Oct 2023 08:42 PM IST
पलक शुक्ला अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई Published by: पलक शुक्ला Updated Thu, 19 Oct 2023 08:42 PM IST
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Leo Review Public rejected Lokesh Kanagraj Thalapathy Vijay Sanjay Dutt Movie know full review in hindi
लियो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
Movie Review
लियो
कलाकार
विजय , संजय दत्त , तृषा , प्रिया आनंद , अर्जुन , मैडोना सेबस्टियन और गौतम वासुदेव मेनन आदि
लेखक
लोकेश कनगराज , रत्न कुमार और धीरज वैद्य
निर्देशक
लोकेश कनगराज
निर्माता
एसएस ललित कुमार और जगदीश पलानीसामी
रिलीज
19 अक्टूबर 2023
रेटिंग
2/5
फिल्म 'मास्टर' के बाद निर्देशक लोकेश कनगराज और अभिनेता विजय की जोड़ी फिल्म 'लियो'  में नजर आई है। फिल्म 'कैथी' और 'विक्रम' के बाद यह फिल्म लोकेश कनगराज सिनेमैटिक यूनिवर्स की तीसरी किस्त है। लेकिन, इस यूनिवर्स के नाम पर लोकेश ने अपने ही प्रशंसकों के साथ धोखा किया है। विक्रम और रॉलेक्स का पूरी फिल्म दर्शक इंतजार ही करते रहे और जो हाथ आया वह धोखे के सिवा कुछ नहीं है। फिल्म पूरी तरह से एक्शन मसाला है। और, मसाले लोकेश ने फिल्म में भरपूर डाले हैं। बस कहानी उनके हाथ से छिटक गई।
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Leo Review Public rejected Lokesh Kanagraj Thalapathy Vijay Sanjay Dutt Movie know full review in hindi
लियो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म ‘लियो’ की कहानी पार्थिबन से शुरू होती है जो अपनी पत्नी सत्या और दो बच्चों के साथ हिमाचल प्रदेश में शांति से एक कॉफी शॉप चला रहा है। एक दिन कुछ गुंडे पार्थिबन के कैफे पर हमला करते हैं और उसकी बेटी और वहां काम करने वाले एक कर्मचारी को जान से मारने की धमकी देते हैं। पार्थिबन जब गैंगस्टरों को मरता है तो एंटनी और हेरोल्ड की नजर में आ जाता है। एंटनी दास और हेरोल्ड दास को लगता है कि पार्थिबन उसका बिछड़ा हुआ रिश्तेदार लियो दास है। यह लियो दास कौन है? जिसकी वजह से पार्थिबन की सीधी साधी जिंदगी में उथल-पुथल मच जाता है और इससे वह कैसे बाहर निकलता है। फिल्म की कहानी यही है, इस फिल्म को पूरी तरह से  समझने के लिए लोकेश कनगराज की पहले की फिल्में 'कैथी' और 'विक्रम' देखनी कितनी जरूरी है, ये इस फिल्म को देखे बिना ही समझा जा सकता है।  

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Leo Review Public rejected Lokesh Kanagraj Thalapathy Vijay Sanjay Dutt Movie know full review in hindi
लियो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म ‘लियो’ शुरुआत बहुत धीमी गति से होती है। लेकिन जब फिल्म की कहानी में लियो दास की एंट्री होती है तो कहानी की गति तेज हो जाती है। एक सामान्य व्यक्ति पार्थिबन अपने परिवार को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इस किरदार के जरिए लोकेश कनगराज ने एक आम आदमी की आवाज को उठाया है जो अपने परिवार की रक्षा के लिए कुछ भी कर सकता है, भले ही इसके लिए उन्हें अपनी जान जोखिम में डालनी पड़े। वहीं, लियो दास के किरदार  के साथ अपना एलसीयू भी स्थापित कर लिया। लेकिन अगर लोकेश की पहले की फिल्में देखे तो उसमे एक जबरदस्त कहानी होती थी। इस फिल्म में लोकेश ने चालाकी यह दिखाई कि जहां कहानी थोड़ी कमजोर पड़ती दिखी वहां उन्होंने एक्शन सीन डाल कर उसी कमी को पूरी करने की कोशिश की। 

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लियो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

कहते हैं कि अति सर्वदा वर्जयेत। वही, इस फिल्म में दिखा। जरूरत से ज्यादा एक्शन सीन कहानी को कमजोर ही बनाते है जिसकी वजह से  संजय दत्त और अर्जुन के किरदार ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाते हैं। इंटरवल के बाद फिल्म की गति एक बार फिर से धीमी हो जाती है और कमजोर कहानी को फ्लैशबैक दृश्यों के साथ आगे बढ़ाने की कोशिश की गई है। इस फिल्म की कहानी निर्देशक लोकेश कनगराज ने रत्न कुमार और धीरज वैद्य के साथ मिलकर लिखी है।  फिल्म के बाकी पहलुओं पर जितना ध्यान दिया गया है अगर कहानी को थोड़ा सा और सशक्त बनाने के लिए मेहनत की गई होती तो इस फिल्म को एक्शन के साथ देखने का कुछ और ही रोमांच होता। 

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लियो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभिनेता विजय का एक्शन दृश्यों में  परफॉर्मेंस बहुत ही जबरदस्त है, लेकिन भावनात्मक दृश्यों में वह थोड़े से कमजोर दिखे। संजय दत्त और अर्जुन की  स्क्रीन पर मौजूदगी दमदार है लेकिन आधे अधूरे किरदारों से दोनों का असर नहीं हो पाया। तृषा का अभिनय भी एक दायरे तक ही सीमित रहा,  विजय के साथ उनके भी भावनात्मक सीन उभर कर नहीं आए। पुलिस अधिकारी की भूमिका में गौतम मेनन  सरप्राइज पैकेज हैं।  कॉन्स्टेबल नेपोलियन के रूप में जॉर्ज मैरीन ने अच्छा अभिनय किया है और अपने किरदार को वहीं से जारी रखा है जहां 'कैथी' का अंत हुआ था। फिल्म ‘लियो’ में विजय और गौतम मेनन की दोस्ती को अच्छे तरह से पेश किया गया है। प्रिया आनंद जैसे कलाकारों के पास फिल्म में करने के लिए कुछ भी नहीं है।

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लियो - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

फिल्म में अनिरुद्ध रविचंद्रन का बैकग्राउंड स्कोर कुछ हिस्सों में अच्छा है। लेकिन अगर उनकी पिछली फिल्म  'विक्रम'  से तुलना करे तो उस मामले में इस फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर थोड़ा कमजोर है। फिल्म के गानों का हिंदी में सही अनुवाद होता तो शायद फिल्म के गाने सुनने में थोड़े से अच्छे लगते। हां, मनोज परमहंस की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। लकड़बग्घे वाले सीन में वीएफएक्स का अच्छा प्रयोग हुआ है। पूरी तरह से एक्शन मसाला फिल्म में ‘लियो’  अगर कहानी पर थोड़ा और काम किया गया होता तो यह एक बेहतरीन फिल्म बन सकती थी।

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